JPSC परीक्षा रद्द और सीबीआई जांच की मांग पर सोरेन सरकार क्यों है खामोश? क्या है तकनीकी अड़चन या छिपा है सिस्टम का डर

झारखंड की सियासत और युवाओं के भविष्य से जुड़ा एक बेहद संवेदनशील मामला इन दिनों लगातार तूल पकड़ता जा रहा है। झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की परीक्षाओं को रद्द करने और पूरे प्रकरण की सीबीआई (CBI) जांच कराने की मांग को लेकर राज्यभर में विरोध प्रदर्शनों का दौर जारी है, लेकिन हेमंत सोरेन सरकार इस गंभीर मांग पर सीधी कार्रवाई करने से लगातार बचती नजर आ रही है। विपक्षी दलों और आंदोलनकारी छात्रों के मन में उठ रहे इस सवाल ने अब विकराल रूप ले लिया है कि आखिर झारखंड सरकार सीबीआई जांच के आदेश देने से क्यों कतरा रही है, क्या इसके पीछे कोई गंभीर तकनीकी कानूनी अड़चन छिपी हुई है या फिर पूरा प्रशासनिक तंत्र किसी अंदरूनी भय के साए में जी रहा है।

छात्र आंदोलन और जेपीएससी परीक्षा रद्द करने की मांग का बढ़ता दबाव

राजधानी रांची से लेकर पूरे राज्य के विभिन्न जिलों तक जेपीएससी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों और अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों और बेरोजगार युवाओं का गुस्सा फूट पड़ा है। लगातार उठ रही आवाज के बीच यह मामला केवल एक प्रशासनिक लापरवाही तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह राज्य सरकार के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बन चुका है। युवा वर्ग का साफ कहना है कि जब तक इस पूरी भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच नहीं होती, तब तक राज्य के लाखों युवाओं के भविष्य के साथ हो रहे खिलवाड़ पर विराम नहीं लग सकता। सरकार की तरफ से ठोस कदम न उठाए जाने के कारण छात्र संगठनों और विपक्षी नेताओं के तेवर दिन-प्रतिदिन और अधिक आक्रामक होते जा रहे हैं।

सीबीआई जांच से क्यों हिचकिचा रही सोरेन सरकार, सिस्टम का भय या कानूनी पेंच

राजनीतिक गलियारों और कानूनी विशेषज्ञों के बीच इस बात की गहन चर्चा हो रही है कि हेमंत सोरेन सरकार सीबीआई जांच के रास्ते में क्यों रोड़े अटका रही है। जानकारों का मानना है कि इस तरह के मामलों में केंद्रीय एजेंसी की एंट्री होने से राज्य के भीतर की कई प्रशासनिक परतें और कथित तौर पर संलिप्त बड़े चेहरे बेनकाब हो सकते हैं, जिससे सरकार और सिस्टम की साख पर गहरा बट्टा लग सकता है। दूसरी तरफ, सत्ता पक्ष का तर्क है कि राज्य की जांच एजेंसियां खुद इस मामले की तह तक जाने के लिए सक्षम हैं और बेवजह इसे राजनीतिक रंग दिया जा रहा है। अब देखने वाली बात यह होगी कि लगातार बढ़ते दबाव के बीच सोरेन सरकार इस सियासी और प्रशासनिक पहेली को सुलझाने के लिए क्या नया कदम उठाती है।