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IREF की पहल से इराक के लिए माल ढुलाई खर्च 74% घटा, बचेंगे ₹223 करोड़; जानें पूरा शिपिंग प्लान

लाल सागर (Red Sea) संकट, कंटेनरों की वैश्विक किल्लत और लगातार चढ़ते समुद्री माल भाड़े (Ocean Freight Rates) के दबाव से जूझ रहे भारतीय चावल निर्यातकों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। भारतीय चावल निर्यातक महासंघ (Indian Rice Exporters’ Federation – IREF) ने लॉजिस्टिक्स सॉल्यूशन प्रदाता ‘एग्जिमवाला’ (Eximwala) के साथ मिलकर इराक के लिए बासमती चावल की थोक शिपिंग (Bulk Shipping) की एक विशेष व्यवस्था तैयार की है। इस नई पहल के तहत इराक जाने वाले बासमती चावल की माल ढुलाई लागत में 74 प्रतिशत तक की भारी कटौती दर्ज की गई है।

कंटेनर आधारित ढुलाई के दौरान जो भाड़ा $350 (लगभग ₹29,400) प्रति मीट्रिक टन के उच्च स्तर पर पहुंच गया था, वह इस बल्क वेसल मॉडल के जरिए घटकर सीधे $90 (लगभग ₹7,560) प्रति मीट्रिक टन पर आ गया है। प्रति टन लगभग $260 (लगभग ₹21,840) की इस सीधी बचत से भारतीय निर्यातकों को कुल मिलाकर करीब 2.66 करोड़ डॉलर (लगभग ₹223 करोड़) की सकल राहत मिलने का अनुमान है।

पारंपरिक रूप से बासमती चावल को 20-फीट और 40-फीट के छोटे कंटेनरों में लोड करके भेजा जाता रहा है, जहां शिपिंग लाइनों द्वारा मनमाना सरचार्ज और टर्मिनल हैंडलिंग चार्ज वसूला जाता था। इस बाधा को तोड़ने के लिए IREF ने तीन विशाल ब्रेक-बल्क जहाजों (Bulk Vessels) के माध्यम से कुल 1,02,210 मीट्रिक टन बासमती चावल को सीधे इराक के सामरिक ‘उम्म कसर’ (Umm Qasr) बंदरगाह पर पहुंचाने का नेटवर्क तैयार किया है:

  • एमवी लामार एस (MV LAMAR S): इस पहले मालवाहक जहाज में 36,810 टन बासमती चावल लोड किया गया था। यह जहाज इराक के उम्म कसर पोर्ट के बर्थ नंबर 3 पर सुरक्षित पहुंच चुका है और वहां माल उतारने (Discharging) की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।

  • एमवी लोलो गेट (MV LOLO GATE): यह दूसरा पोत 25,500 टन बासमती चावल की खेप लेकर अपनी निर्धारित समुद्री यात्रा पूरी करेगा।

  • एमवी आउटलैंडर (MV OUTLANDER): इस तीसरे और सबसे बड़े जहाज के जरिए 39,900 टन चावल की तीसरी खेप इराक के लिए रवाना की जा रही है।

इन तीनों जहाजों के समन्वित संचालन से जहां कंटेनर की अनुपलब्धता का संकट पूरी तरह समाप्त हो गया है, वहीं बंदरगाह पर लगने वाले अतिरिक्त समय और डेमरेज चार्ज (Demurrage) में भी भारी कमी आई है।

भारत का कुल बासमती चावल निर्यात वैश्विक स्तर पर कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख आधार स्तंभ है। आधिकारिक व्यापार आंकड़ों के अनुसार, भारत अपने कुल बासमती निर्यात का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा अकेले पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) के देशों को भेजता है, जिसकी वार्षिक व्यापार वैल्यू लगभग ₹34,284 करोड़ ($4.1 अरब) के आसपास है।

वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान सऊदी अरब ₹8,324 करोड़ के आयात के साथ भारतीय बासमती का सबसे बड़ा खरीदार रहा था। इसके बाद ईरान (₹6,970 करोड़) दूसरे और इराक (₹5,583 करोड़) तीसरे स्थान पर रहा, जबकि संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ₹4,132 करोड़ के साथ चौथे स्थान पर था। इसी अवधि में इराक ने अकेले भारत से करीब 7.64 लाख टन बासमती चावल का आयात किया था। ऐसे में इराक जैसे बड़े खरीदार देश के लिए लॉजिस्टिक खर्चों का घटना भारतीय बासमती की वैश्विक प्रतिस्पर्धा को न केवल बरकरार रखेगा, बल्कि पड़ोसी प्रतिद्वंद्वी देशों (विशेषकर पाकिस्तान) के मुकाबले भारतीय बासमती को मूल्य के मोर्चे पर बढ़त दिलाएगा।

इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन (IREF) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष देव गर्ग के अनुसार, यह सफल मॉडल IREF के व्यापक विजन “एक राष्ट्र, एक व्यापार, एक नीति” (One Nation, One Trade, One Policy) का प्रत्यक्ष परिणाम है। जब शिपिंग लागत घटती है, तो इसका सीधा लाभ निर्यातकों के ऑपरेटिंग मार्जिन, विदेशी खरीदारों की क्रय क्षमता और अंततः देश के घरेलू किसानों को मिलने वाले धान (Paddy) के लाभकारी मूल्यों तक पहुंचता है।

यह रणनीतिक उपलब्धि 23 से 25 अक्टूबर 2026 के दौरान नई दिल्ली के प्रगति मैदान स्थित भारत मंडपम में आयोजित होने वाले बहुप्रतीक्षित ‘भारत अंतरराष्ट्रीय चावल सम्मेलन’ (Bharat International Rice Conference – BIRC 2026) से ठीक पहले हासिल हुई है। इस वैश्विक सम्मेलन में एक विशेष तकनीकी सत्र इसी विषय पर आयोजित किया जा रहा है—“शिपिंग: बल्क बनाम कंटेनर — मार्जिन की सुरक्षा और विवादों का समाधान”।

IREF अब इसी बल्क-शिपिंग मॉडल को सऊदी अरब, यूएई, यमन और ओमान जैसे अन्य खाड़ी देशों के लिए भी दोहराने की तैयारी में है। यदि यह व्यवस्था स्थाई रूप ले लेती है, तो लाल सागर और भू-राजनीतिक संकटों के बावजूद भारतीय चावल उद्योग अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अपने दबदबे को और अधिक मजबूती से स्थापित करने में पूरी तरह सक्षम होगा।