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Indira Ekadashi 2025: पितरों की मुक्ति और भगवान विष्णु की असीम कृपा के लिए ऐसे करें पूजा, जानें शुभ मुहूर्त, संपूर्ण व्रत कथा, अचूक उपाय और सिद्ध मंत्र

सनातन धर्म की परंपरा में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को ‘इंदिरा एकादशी’ के नाम से जाना जाता है। सामान्य दिनों में पड़ने वाली एकादशी का व्रत जहां व्रती को पुण्य और बैकुंठ लोक की प्राप्ति कराता है, वहीं पितृपक्ष यानी श्राद्ध पक्ष के दौरान आने वाली इंदिरा एकादशी का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। धार्मिक मान्यताओं और शास्त्रों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति के पूर्वज या पितर अपने पूर्व जन्मों के कर्मों के कारण यमलोक या किसी कष्टकारी योनि में भटक रहे हों, तो उनके निमित्त विधि-विधान से इंदिरा एकादशी का व्रत रखने और उसका पुण्य फल पितरों को समर्पित करने से उन्हें तत्काल यमलोक के कष्टों से मुक्ति मिलती है और वे सीधे मोक्ष को प्राप्त होते हैं। इस दिन भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप की पूजा, तर्पण और ब्राह्मण भोजन कराने का विशेष महत्व माना गया है।

शास्त्रों में एकादशी व्रत के लिए उदया तिथि और पारण के सटीक समय का बहुत बड़ा महत्व बताया गया है। इंदिरा एकादशी पर भगवान नारायण की पूजा और श्राद्ध तर्पण के लिए दिन का ‘कुतुप’ और ‘रौहिण’ मुहूर्त सबसे उत्तम माना जाता है, जो दोपहर 11:30 बजे से लेकर 1:30 बजे के बीच रहता है। सुबह स्नान-ध्यान के बाद शुभ चौघड़िया में पूजा करना अत्यंत फलदायी होता है। व्रत का पारण अगले दिन यानी द्वादशी तिथि के सूर्योदय के बाद और हरि वासर समाप्त होने के पश्चात ही किया जाना चाहिए। द्वादशी के दिन सुबह किसी जरूरतमंद या ब्राह्मण को भोजन कराकर और दान-दक्षिणा देकर ही स्वयं भोजन ग्रहण करने का नियम है।

इंदिरा एकादशी के दिन व्रती को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगाजल मिले शुद्ध जल से स्नान करना चाहिए और पीले वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर भगवान विष्णु के सम्मुख व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थल पर एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु अथवा शालिग्राम जी की प्रतिमा स्थापित करें। उन्हें पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल) से स्नान कराएं और पीले चंदन, अक्षत, पीले फूल, तुलसी दल व मौसमी फल अर्पित करें। ध्यान रहे कि भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल अनिवार्य माना गया है, किंतु एकादशी के दिन स्वयं तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए, इसलिए एक दिन पहले ही पत्ते तोड़कर रख लें। पूजा के समय घी का दीपक और धूप प्रज्वलित करें, व्रत कथा का श्रवण करें और अंत में भगवान की आरती गाकर प्रसाद वितरित करें।

पद्म पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, सतयुग में माहिष्मती नगरी में राजा इंद्रसेन नाम के एक प्रतापी और धर्मपरायण राजा राज्य करते थे। वे समस्त प्रजा का पुत्रवत पालन करते थे और भगवान विष्णु के परम भक्त थे। एक दिन देवर्षि नारद आकाश मार्ग से राजा इंद्रसेन की राजसभा में पहुंचे। राजा ने उनका भव्य स्वागत किया और आने का कारण पूछा। देवर्षि नारद ने बताया कि कुछ दिन पूर्व वे यमलोक गए थे, जहां उन्होंने राजा इंद्रसेन के पिता को देखा। राजा के पिता ने नारद जी के माध्यम से संदेश भिजवाया था कि पूर्व जन्म में व्रत में हुई किसी त्रुटि के कारण वे यमलोक में कष्ट भोग रहे हैं। यदि उनका पुत्र इंद्रसेन आश्विन कृष्ण पक्ष की इंदिरा एकादशी का व्रत रखे और उसका संपूर्ण पुण्य उन्हें दान कर दे, तो उन्हें यम यातना से मुक्ति मिल जाएगी और वे स्वर्ग लोक को प्राप्त होंगे। राजा इंद्रसेन ने नारद जी से व्रत की संपूर्ण विधि पूछी और आश्विन कृष्ण एकादशी को पूरे विधि-विधान से परिवार सहित उपवास रखा, दोपहर में श्राद्ध-तर्पण किया और द्वादशी को व्रत का पारण कर सारा पुण्य अपने पिता को अर्पित कर दिया। इस व्रत के प्रभाव से आकाश से पुष्प वर्षा हुई और राजा के पिता गरुड़ पर आरूढ़ होकर बैकुंठ धाम चले गए।

यदि आपकी कुंडली में पितृ दोष के कारण कार्यों में रुकावटें आ रही हों या परिवार में कलह का माहौल रहता हो, तो इंदिरा एकादशी के दिन कुछ विशेष उपायों को जरूर आजमाना चाहिए। इस दिन दोपहर के समय दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों के निमित्त काले तिल, कुश और जल से तर्पण करें। इसके बाद श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें या ग्यारहवें अध्याय का पाठ करें, क्योंकि इस पाठ से पितरों को असीम शांति मिलती है। शाम के समय पीपल के वृक्ष की जड़ में कच्चा दूध, जल और शक्कर अर्पित करें और सरसों के तेल का चौमुखा दीपक जलाएं। पीपल के वृक्ष में सभी देवी-देवताओं के साथ पितरों का भी वास माना जाता है। इसके अतिरिक्त, इस दिन गाय को हरा चारा व गुड़ खिलाएं, कौवे और कुत्तों को भोजन दें तथा किसी गरीब व्यक्ति को पीले अन्न या वस्त्र का दान करें। यह महादान घर के संकटों को दूर कर सुख, शांति और समृद्धि के द्वार खोलता है।

पूजा के दौरान मन की एकाग्रता और दिव्य कृपा पाने के लिए तुलसी की माला से भगवान विष्णु के शक्तिशाली मंत्रों का जप अवश्य करना चाहिए। साधक ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ महामंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें। इसके अतिरिक्त ‘शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥’ श्लोक का उच्चारण करते हुए ध्यान लगाने से अंतःकरण शुद्ध होता है और जीवन के सभी पापों का शमन होता है।