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भारत की बढ़ी टेंशन: बांग्लादेश में चीनी पैसों से बनेंगे तीस्ता और पद्मा बैराज, PM तारिक रहमान का बड़ा ऐलान

पड़ोसी देश बांग्लादेश ने अपनी जल समस्याओं से निपटने और कृषि क्षेत्र को नया बूस्ट देने के लिए एक ऐसा बड़ा कदम उठाया है, जिसने नई दिल्ली के रणनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के चेयरमैन तारिक रहमान ने बुधवार को आधिकारिक तौर पर यह साफ कर दिया कि उनकी सरकार देश के बहुप्रतीक्षित और विवादित पद्मा और तीस्ता बैराज प्रोजेक्ट्स (Padma and Teesta Barrage Projects) पर बेहद जल्द काम शुरू करने जा रही है।

रहमान का यह बड़ा ऐलान उस वक्त सामने आया है, जब वे अगले महीने चीन के एक बेहद महत्वपूर्ण आधिकारिक दौरे पर जाने वाले हैं। ऐसे में अब इस पूरे प्रोजेक्ट में चीन की भारी-भरकम आर्थिक और तकनीकी भूमिका होने की पूरी संभावना बन गई है, जो सीधे तौर पर भारत के लिए एक बड़ा कूटनीतिक झटका माना जा रहा है।

गाजीपुर की जनसभा से प्रधानमंत्री रहमान ने की बड़ी घोषणा

बुधवार दोपहर ढाका के नजदीक गाजीपुर में ‘राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान’ की नई इमारत का शिलान्यास करने के बाद एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने इस बात पर जोर दिया।

उन्होंने तीखे तेवरों में कहा, “मैं यह पूरी तरह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि यह बीएनपी (BNP) सरकार ही पद्मा बैराज और तीस्ता बैराज दोनों का निर्माण कार्य शुरू करेगी। हमारी पार्टी ने तीस्ता के मुद्दे को लेकर जमीन पर कई बड़े आंदोलन और कार्यक्रम चलाए हैं। इसलिए, अगर किसी ने इस दिशा में वास्तव में ईमानदारी से काम किया है और जमीन तैयार की है, तो वह बीएनपी ही है।”

आपको बता दें कि बांग्लादेश सरकार पहले ही उत्तरी और दक्षिणी क्षेत्रों (विशेष रूप से राजशाही में पद्मा नदी पर) में पद्मा बैराज के निर्माण को मंजूरी दे चुकी थी, और अब प्रधानमंत्री ने तीस्ता बैराज को भी आधिकारिक रूप से हरी झंडी दिखाकर अपनी मंशा साफ कर दी है।

चीन दौरे पर टिकी नजरें, बीजिंग से मांगी 1 अरब डॉलर की मदद

तीस्ता बैराज को लेकर बांग्लादेश के इस कदम को बेहद रणनीतिक और कूटनीतिक रूप से सोची-समझी चाल माना जा रहा है। जून 2026 के अंत में प्रधानमंत्री रहमान चीन की यात्रा पर जाने वाले हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि उनकी इस यात्रा के दौरान तीस्ता बैराज सहित कई अन्य बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की फंडिंग को लेकर चीन के शीर्ष नेतृत्व के साथ विस्तार से समझौते होंगे।

ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने इसी महीने (मई 2026) बीजिंग में अपने चीनी समकक्ष वांग यी से मुलाकात कर इस करीब 1 अरब डॉलर के मेगा प्रोजेक्ट के लिए औपचारिक रूप से मदद मांग ली है। इस पूरे प्रोजेक्ट में अरबों डॉलर का चीनी निवेश शामिल होने का अनुमान है।

जल संकट पर भारत को घेरा, फरक्का बैराज पर मढ़ा दोष

देश के जल संकट का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री रहमान ने भारत पर परोक्ष रूप से निशाना साधा। उन्होंने कहा कि सूखे के मौसम में बांग्लादेश को नदियों से पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता है। उन्होंने सीमाओं के पार बन रहे बांधों और पानी मोड़े जाने की तरफ इशारा किया।

तारिक रहमान ने दावा किया कि भारत के फरक्का बैराज की वजह से बांग्लादेश के दक्षिणी क्षेत्र में समुद्र का खारा पानी तेजी से घुस रहा है। इसका सीधा और घातक असर विश्व प्रसिद्ध सुंदरबन समेत कई तटीय इलाकों पर पड़ रहा है। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा, “खारापन बढ़ने से हमारे सुंदरबन के कई दुर्लभ पेड़-पौधे नष्ट हो रहे हैं और जंगली जानवर विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं।” उन्होंने आगे बैराज का बचाव करते हुए कहा, “हमें यह बैराज बनाना ही होगा ताकि मॉनसून के अतिरिक्त पानी को जमा करके हम उसे सूखे के मौसम में अपने किसानों और आम लोगों को समय पर उपलब्ध करा सकें।”

भारत के साथ अटका हुआ तीस्ता समझौता और गंगा संधि की मियाद

बांग्लादेश और भारत के बीच नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर लंबे समय से असहमति और विवाद रहा है। साल 1996 में दोनों देशों के बीच गंगा नदी के जल बंटवारे पर एक ऐतिहासिक संधि हुई थी, जिसकी 30 साल की मियाद इसी साल दिसंबर 2026 में खत्म हो रही है। इस समझौते को आगे बढ़ाने या रिन्यू करने के लिए दोनों पक्षों के बीच फिलहाल उच्च स्तरीय बातचीत चल रही है।

दूसरी तरफ, तीस्ता नदी के जल बंटवारे को लेकर द्विपक्षीय सहमति तो बन गई थी, लेकिन भारत की आंतरिक राजनीति और पश्चिम बंगाल सरकार के कड़े विरोध के चलते इस पर अब तक हस्ताक्षर नहीं हो सके हैं। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस समझौते का पुरजोर विरोध किया था, जिसके कारण यह समझौता ठंडे बस्ते में चला गया।

चीन की इस एंट्री से भारत पर क्या होगा सीधा असर?

बांग्लादेश में हुए इस बड़े घटनाक्रम और तीस्ता प्रोजेक्ट के निर्माण के लिए चीन से फंडिंग मांगने की तैयारी ने नई दिल्ली की राष्ट्रीय सुरक्षा और कूटनीतिक चिंताओं को बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है। भारत पर इसके संभावित असर को इन तीन मुख्य बिंदुओं में आसानी से समझा जा सकता है:

‘चिकन नेक’ (सिलीगुड़ी कॉरिडोर) की सुरक्षा पर सीधा खतरा: भारत की सबसे बड़ी और गंभीर चिंता सुरक्षा को लेकर है। तीस्ता नदी का क्षेत्र भारत के रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के बिल्कुल करीब है। यह महज 60 किलोमीटर लंबा और 20 किलोमीटर चौड़ा एक संकरा जमीनी रास्ता है, जो पूरे पूर्वोत्तर (North-East) राज्यों को शेष भारत से जोड़ता है। इस प्रोजेक्ट के बहाने नदी प्रबंधन और इंजीनियरिंग के नाम पर चीन की सरकारी कंपनियों (जैसे- पावर कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन ऑफ चाइना) और चीनी इंजीनियरों की भारत की सीमा के इतने करीब मौजूदगी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा ‘रेड फ्लैग’ है।

कूटनीतिक मोर्चे पर भारत के लिए बड़ा झटका: यह कदम जल कूटनीति में भारत के लिए एक बड़ा सेटबैक है। भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता जल बंटवारा समझौता 2011 से ही अटका हुआ है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के दौरान भारत ने इस प्रोजेक्ट में खुद तकनीकी मदद की पेशकश कर चीन को इस संवेदनशील इलाके से दूर रखने की कोशिश की थी। लेकिन अब तारिक रहमान (BNP) की नई सरकार के सत्ता में आने के बाद, ढाका का बीजिंग की तरफ झुकाव स्पष्ट हो गया है। इससे यह संदेश जाता है कि अगर भारत अपनी आंतरिक राजनीति के कारण समय पर समझौते नहीं कर पाता है, तो पड़ोसी देश अन्य विकल्पों (चीन) की ओर रुख कर सकते हैं।

चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) का विस्तार: बांग्लादेश में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद से ही चीन वहां अपना प्रभाव तेजी से बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। चीन ने स्पष्ट किया है कि वह तीस्ता प्रोजेक्ट को अपने रणनीतिक ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) के तहत आगे बढ़ाना चाहता है। अगर चीन इस प्रोजेक्ट की पूरी फंडिंग करता है, तो ढाका के इंफ्रास्ट्रक्चर और राजनीतिक ईकोसिस्टम पर बीजिंग की पकड़ और ज्यादा मजबूत होगी, जो भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ (पड़ोसी पहले) की नीति को सीधी चुनौती देगा।