
नई दिल्ली। भारतीय वित्तीय जगत और बैंकिंग गलियारों में जब भी किसी बड़ी दिवालिया कंपनी के समाधान (Resolution) की खबर आती है, तो एक शब्द सबसे ज्यादा सुर्खियों और विवादों में रहता है—‘हेयरकट’ (Haircut)। अक्सर अखबारों के पहले पन्ने और टीवी चैनलों पर ऐसी सुर्खियां देखने को मिलती हैं कि ‘बैंकों ने 80% या 90% हेयरकट स्वीकार किया’, ‘₹10,000 करोड़ के कर्ज पर बैंकों को मिले केवल ₹1,500 करोड़’। इस तरह के आंकड़ों को देखकर आम जनता और निवेशकों में यह धारणा बनती है कि बैंकों ने अपने हजारों करोड़ रुपये आसानी से माफ कर दिए या यह व्यवस्था पूरी तरह विफल हो गई है। लेकिन इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC, 2016) की कानूनी और आर्थिक संरचना के भीतर ‘हेयरकट’ का गणित केवल एक साधारण नफा-नुकसान नहीं है, बल्कि यह डूबी हुई पूंजी (Stressed Assets) में से अधिकतम संभव मूल्य बचाने की एक जटिल वित्तीय प्रक्रिया है।
इनसॉल्वेंसी प्रक्रिया की बारीकियों को समझने वाले अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस पूरे मामले में शोर ज्यादा और जमीनी समझ कम है। IBC से पहले के दौर (जैसे BIFR, SICA, या DRT) में कर्ज समाधान की प्रक्रिया दशकों तक खिंचती थी और अंत में बैंकों के हाथ में जंग लगी मशीनें और खाली जमीनें ही बचती थीं, जिनकी कीमत न के बराबर रह जाती थी। IBC ने कंपनियों के परिसमापन (Liquidation) के बजाय उनके पुनरुद्धार (Resolution) को प्राथमिकता दी है। ऐसे में हेयरकट को केवल ‘नुकसान’ के चश्मे से देखने के बजाय यह समझना जरूरी है कि यह कैलकुलेशन कैसे काम करता है, बैंक इसे क्यों स्वीकार करते हैं और इसका वैकल्पिक रास्ता क्या हो सकता था।
सरल और व्यावहारिक शब्दों में, वित्तीय शब्दावली में ‘हेयरकट’ का अर्थ है लेनदारों (Creditors/Banks) द्वारा अपने कुल बकाया दावे (Total Claimed Debt) में से स्वेच्छा से छोड़ी गई राशि का प्रतिशत। जब कोई कंपनी दिवालिया प्रक्रिया (CIRP – Corporate Insolvency Resolution Process) में जाती है, तो बैंक राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) के समक्ष अपने मूलधन और उस पर जुड़े बकाए ब्याज का पूरा दावा पेश करते हैं।
गणितीय रूप से हेयरकट की गणना इस फॉर्मूले से की जाती है:
$$\text{Haircut Percentage (\%)} = \left( \frac{\text{Total Admitted Debt Claim} – \text{Resolution Amount Received}}{\text{Total Admitted Debt Claim}} \right) \times 100$$
इसे एक व्यावहारिक और वास्तविक कॉर्पोरेट केस स्टडी के माध्यम से समझा जा सकता है:
| विवरण (Financial Metric) | राशि (काल्पनिक केस स्टडी) | प्रतिशत हिस्सा |
| कुल स्वीकृत क्लेम (Total Admitted Claims) | ₹10,000 करोड़ | 100% |
| रेजोल्यूशन बिड / वास्तविक भुगतान (Resolution Value) | ₹2,500 करोड़ | 25% (रिकवरी) |
| बैंकों द्वारा छोड़ा गया बकाया (Write-off / Haircut) | ₹7,500 करोड़ | 75% (हेयरकट) |
| परिसमापन मूल्य (Liquidation Value of Assets) | ₹1,200 करोड़ | 12% |
जब सफल बोलीदाता (Resolution Applicant) ₹2,500 करोड़ का प्लान देता है और क्रेडिटर्स की समिति (CoC) उसे मंजूरी देती है, तो मीडिया में इसे “75% का भारी हेयरकट” कहा जाएगा। लेकिन इसी गणित का दूसरा पहलू यह है कि यदि कंपनी को बंद (Liquidate) कर दिया जाता, तो उसकी संपत्तियों की नीलामी से बैंकों को केवल ₹1,200 करोड़ (12%) ही मिल पाते। यानी IBC की बदौलत बैंकों ने लिक्विडेशन वैल्यू की तुलना में ₹1,300 करोड़ अधिक (दोगुने से ज्यादा) रिकवर किए।
आम जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर कोई बैंक 80% से 90% तक का नुकसान सहने के लिए तैयार क्यों हो जाता है। इसके पीछे तीन बड़े बुनियादी कारण काम करते हैं, जिनकी अक्सर सार्वजनिक चर्चाओं में अनदेखी कर दी जाती है:
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सालों पुराना संचित ब्याज (Accumulated Interest & Penalties): जब कोई कंपनी 2012 या 2014 में डिफॉल्ट करती है और मामला 2018 या 2020 में IBC में पहुंचता है, तो बैंक अपने क्लेम में वर्षों का चक्रवृद्धि ब्याज और पेनाल्टी जोड़ते रहते हैं। उदाहरण के तौर पर, यदि वास्तविक मूलधन ₹2,000 करोड़ था, तो वर्षों बाद क्लेम बढ़कर ₹6,000 करोड़ दर्ज होता है। यदि रेजोल्यूशन में ₹1,800 करोड़ मिलते हैं, तो क्लेम के आधार पर हेयरकट 70% दिखता है, जबकि मूलधन की वसूली लगभग 90% हो चुकी होती है।
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विलंबित प्रवेश (Delayed Entry into IBC): भारत में अधिकांश प्रमोटर्स अपनी कंपनी को तब तक IBC में नहीं जाने देते जब तक कि उसका कैश फ्लो पूरी तरह सूख नहीं जाता और संपत्तियां कबाड़ नहीं बन जातीं। जब कोई कंपनी आईसीयू के अंतिम चरण में NCLT पहुंचती है, तो उसके संयंत्र बंद हो चुके होते हैं, कुशल कर्मचारी छोड़ चुके होते हैं और बाजार हिस्सेदारी शून्य हो चुकी होती है। ऐसी संपत्तियों के लिए कोई भी नया खरीदार भारी बोली नहीं लगा सकता।
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अमूर्त संपत्तियों का ह्रास (Loss of Goodwill & Intangibles): किसी भी चलती हुई कंपनी (Going Concern) की वैल्यू केवल उसकी जमीन और ईंट-पत्थर नहीं होते, बल्कि उसका ब्रांड, कॉन्ट्रैक्ट्स और क्लाइंट बेस होते हैं। कानूनी विवादों के दौरान जैसे ही ऑपरेशंस ठप होते हैं, कंपनी की मार्केट वैल्यू तेजी से गिरती है, जिससे रेजोल्यूशन आवेदक कम से कम बोली लगाते हैं।
इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड का प्राथमिक उद्देश्य बैंकों के हर एक रुपये की 100% वसूली (Debt Recovery) करना कभी था ही नहीं। इसका मुख्य उद्देश्य कानून की प्रस्तावना (Preamble) में ही दर्ज है: “कंपनी का पुनरुद्धार (Reorganization), गोइंग कंसर्न बनाए रखना और संपत्तियों का मूल्य अधिकतम (Maximization of Value of Assets) करना।”
इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी बोर्ड ऑफ इंडिया (IBBI) के ऐतिहासिक आंकड़ों पर नजर डालें, तो IBC के तहत समाधान किए गए मामलों में औसतन लिक्विडेशन वैल्यू की तुलना में बैंकों को लगभग 160% से 170% तक की रिकवरी मिली है। यदि देश में IBC नहीं होता, तो इन कंपनियों का अंतिम पड़ाव लिक्विडेशन ही होता। लिक्विडेशन का अर्थ है कारखानों पर ताला, लाखों प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष नौकरियों का खात्मा, टैक्स राजस्व का हमेशा के लिए बंद होना और बैंकों को कबाड़ के भाव चंद रुपये मिलना।
जब भूषण स्टील, एस्सार स्टील या आलोक इंडस्ट्रीज जैसी कंपनियों का समाधान हुआ, तो बैंकों ने निश्चित रूप से कुछ हेयरकट झेला, लेकिन वे विशाल स्टील और टेक्सटाइल प्लांट्स आज भी चालू हैं, लाखों लोगों को रोजगार दे रहे हैं और देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में योगदान दे रहे हैं। इसलिए हेयरकट की लागत को केवल वित्तीय बट्टे-खाते के तौर पर नहीं, बल्कि एक तनावग्रस्त पूंजी को अर्थव्यवस्था में दोबारा सक्रिय करने की आर्थिक कीमत के रूप में देखा जाना चाहिए।
हेयरकट के प्रतिशत को कम करने और बैंकों की रिकवरी को अधिकतम करने के लिए सरकार और IBBI लगातार विनियामक सुधारों पर काम कर रहे हैं। सबसे बड़ी चुनौती मुकदमों (Litigations) के कारण प्रक्रिया में होने वाली देरी है। कानून के अनुसार पूरी प्रक्रिया 330 दिनों के भीतर पूरी होनी चाहिए, लेकिन कई मामलों में प्रमोटर्स और असहमत लेनदारों की याचिकाओं के चलते यह समय 600 से 800 दिनों तक खिंच जाता है। समय बढ़ने के साथ-साथ कंपनी की परिसंपत्तियों का अवमूल्यन होता जाता है, जिससे हेयरकट का आकार स्वतः बढ़ जाता है।
इसे रोकने के लिए NCLT की नई बेंचों की स्थापना, डिजिटलीकरण, सख्त समयसीमा का अनुपालन और MSMEs के लिए प्री-पैकेज्ड इंसॉल्वेंसी (Pre-pack Scheme) को बड़े स्तर पर लागू किया जा रहा है। कुल मिलाकर, IBC में हेयरकट कोई ‘घोटाला’ या व्यवस्थागत विफलता नहीं है, बल्कि यह आर्थिक यथार्थ (Economic Reality) की वह कड़वी गोली है जिसे निगलकर बैंकिंग प्रणाली अपने एनपीए (NPA) के बोझ को हल्का करती है और फंसी हुई राष्ट्रीय संपत्तियों को नए, सक्षम प्रबंधन के हाथों में सौंपती है।
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