
सृष्टि का सबसे बड़ा और खूबसूरत चमत्कार एक नए जीवन का इस धरती पर आना है। चिकित्सा विज्ञान और जीव विज्ञान (Biology) के अनुसार, एक मानव शिशु को पूरी तरह विकसित होकर जन्म लेने में नौ महीने का समय लगता है। विज्ञान इस पूरी प्रक्रिया को भ्रूण के शारीरिक विकास, कोशिकाओं के विभाजन और अंगों के बनने के नजरिए से समझाता है। लेकिन क्या कभी आपके मन में यह जिज्ञासा जगी है कि आखिर यह समय ठीक नौ महीने का ही क्यों होता है? हमारे सनातन धर्म के प्राचीन शास्त्रों, पुराणों और उपनिषदों में इस नौ महीने की अवधि के पीछे के बेहद गहरे और चमत्कारी रहस्यों को उजागर किया गया है, जो हमारी सोच से भी परे हैं।
शास्त्रों में बताया गया है कि एक शिशु की मां के गर्भ में रहने की नौ महीने की यह यात्रा केवल मांस और हड्डियों के ढांचे के तैयार होने की कहानी नहीं है। असल में, यह यात्रा आत्मा के पूर्व जन्म की यादों को भुलाने, ब्रह्मांडीय चेतना से धरती की सीमाओं में आने और एक नए पुनर्जन्म के लिए खुद को तैयार करने की एक बेहद पवित्र और आध्यात्मिक यात्रा है। कई प्राचीन ग्रंथों में इस बात का विस्तार से वर्णन मिलता है कि किसी भी मनुष्य का जीवन चक्र उसके जन्म के दिन से शुरू नहीं होता, बल्कि जन्म तो सिर्फ इस नश्वर संसार में प्रवेश करने का एक अंतिम द्वार है।
गर्भ उपनिषद का सच: मां का गर्भ सिर्फ आश्रय नहीं, बल्कि आत्मा की दहलीज है
हमारे प्राचीन और प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार, मां का गर्भ केवल एक बच्चे को पालने या आश्रय देने का स्थान नहीं है, बल्कि इसे एक दिव्य दहलीज के रूप में दर्ज किया गया है। सनातन धर्म के ‘गर्भ उपनिषद’ में इस रहस्य पर से पर्दा उठाया गया है कि जब एक आत्मा मां के गर्भ में प्रवेश करती है, तो वह बिल्कुल खाली हाथ नहीं होती। उस आत्मा के ऊपर उसके पिछले कई जन्मों के अच्छे और बुरे कर्मों का भारी-भरकम बोझ होता है।
पुराणों के अनुसार, गर्भ एक ऐसा रहस्यमयी और शांत स्थान है, जहां प्रवेश करने के बाद आत्मा धीरे-धीरे अपनी ब्रह्मांडीय चेतना (Cosmic Consciousness) यानी भगवान से अपना जुड़ाव खोने लगती है। गर्भ के भीतर ही आत्मा का सांसारिक मायाजाल से पहला परिचय होता है, जहां वह अपनी पुरानी पहचान को भूलकर एक नए रूप में ढलने की तैयारी करती है।
क्यों 9 महीने ही गर्भ में रहता है शिशु? जानिए इस खास अंक का गणित
आध्यात्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, गर्भ में रहने के दौरान हर महीने आत्मा को उसकी पुरानी यादों से धीरे-धीरे मुक्त किया जाता है। इसके साथ ही, उस अमूर्त आत्मा को इस भौतिक संसार की सीमाओं, समय के चक्र, हाड़-मांस के शरीर, भूख-प्यास और इंसानी भावनाओं का सामना करने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में ‘नौ’ का अंक सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारतीय ब्रह्मांड विज्ञान और अंक ज्योतिष में 9 के अंक को पूर्णता (Completeness) का प्रतीक माना गया है। हमारा पूरा ब्रह्मांड नौ मुख्य ग्रहों और नौ विशेष चक्रों से संचालित होता है, जो किसी भी जीव के भाग्य और जीवन को नियंत्रित करते हैं। जब शिशु पूरे नौ महीने गर्भ में बिता लेता है, तभी उसका शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास पूरी तरह संपन्न माना जाता है।
गर्भ के भीतर 1 से 9 महीने तक का सफर: किस महीने किस ग्रह का होता है पहरा?
ज्योतिष शास्त्र और प्राचीन संहिताओं में बताया गया है कि मां के गर्भ में पल रहे शिशु पर हर महीने एक विशेष ग्रह का कड़ा प्रभाव होता है। यही ग्रह बच्चे के अंगों और उसकी मानसिक चेतना का निर्माण करते हैं।
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पहला महीना: गर्भधारण के पहले महीने में ‘शुक्र ग्रह’ सबसे ज्यादा प्रभावी रहता है, जो जीवन की शुरुआत और बीज को मजबूती देता है।
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दूसरा महीना: दूसरे महीने में ‘मंगल ग्रह’ का प्रभाव बढ़ जाता है, जो भ्रूण को एक ठोस आकार देने में मदद करता है।
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तीसरा महीना: तीसरे महीने में बुद्धि और ज्ञान के देवता ‘गुरु ग्रह’ (बृहस्पति) का असर होता है, जिससे शिशु के भीतर चेतना जागती है।
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चौथा महीना: चौथे महीने में आत्मा और जीवन शक्ति के कारक ‘सूर्य ग्रह’ का प्रभाव होता है, जिससे बच्चे के दिल की धड़कनें शुरू होती हैं।
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पांचवां महीना: पांचवें महीने में मन के कारक ‘चंद्रमा’ का असर होता है, जिससे शिशु में संवेदनाएं पैदा होती हैं।
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छठा महीना: छठे महीने में न्याय और कठोरता के देवता ‘शनि ग्रह’ का पहरा होता है, जो बच्चे की हड्डियों और बालों का निर्माण करते हैं।
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सातवां महीना: सातवें महीने में बुद्धि और त्वचा के स्वामी ‘बुध ग्रह’ का प्रभाव होता है, जिससे शिशु गर्भ के भीतर हरकत करना और समझना शुरू करता है।
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आठवां महीना: आठवें महीने में एक बार फिर ‘चंद्रमा’ सक्रिय होता है, जो मां और बच्चे के बीच के भावनात्मक जुड़ाव को चरम पर ले जाता है।
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नौवां महीना: आखिरी और नौवें महीने में पुनः ‘सूर्य ग्रह’ और कुल देवता का पूर्ण प्रभाव होता है, जो शिशु को तेज प्रदान करते हैं और उसे इस बाहरी दुनिया में आने की पूरी शक्ति और ऊर्जा देते हैं।
यही कारण है कि जब यह नौ महीनों का चक्र और नौ ग्रहों की ऊर्जा का सफर पूरा हो जाता है, तभी एक पूर्ण और स्वस्थ मानव शिशु इस धरती पर अपनी नई पहचान के साथ जन्म लेता है।
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