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Hospital Overcharging: दवाओं की खरीद और मरीज से वसूली में 67 गुना तक का अंतर, निजी अस्पतालों की लूट पर अब सरकार की सख्त तैयारी

देशभर के कॉर्पोरेट और निजी अस्पतालों में भर्ती मरीजों के परिजनों को इलाज के दौरान जिस आर्थिक दोहन का सामना करना पड़ता है, उसकी परतें एक बार फिर सरकारी जांच रिपोर्टों और ऑडिट अध्ययनों में खुलकर सामने आई हैं। भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) और राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) द्वारा जुटाए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, निजी अस्पताल थोक में कौड़ियों के भाव खरीदे जाने वाले मेडिकल कंज्यूमेबल्स, जेनेरिक दवाओं और डिस्पोजेबल मेडिकल उपकरणों पर मरीजों से अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) की आड़ में लागत से 10 गुना से लेकर 67 गुना (लगभग 6,700%) तक अधिक कीमत वसूल रहे हैं। गंभीर बीमारी, सर्जरी या आईसीयू में भर्ती मरीज के असहाय तीमारदारों के पास इन बिलों को भरने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। इस बेलगाम मुनाफाखोरी पर अब केंद्र सरकार, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और ड्रग प्राइस रेगुलेटर सख्त कानूनी शिकंजा कसने की अंतिम तैयारी में हैं।

जांच रिपोर्टों में सामने आया है कि अस्पताल सबसे ज्यादा मुनाफा उन मेडिकल कंज्यूमेबल्स और जेनेरिक उत्पादों पर कमाते हैं जो किसी भी मरीज के दैनिक उपचार में अनिवार्य रूप से दर्जनों की संख्या में इस्तेमाल होते हैं। निर्माता कंपनियां अस्पतालों को आकर्षित करने के लिए इन उत्पादों के पैकेट पर कृत्रिम रूप से अत्यधिक एमआरपी प्रिंट करती हैं, जबकि अस्पतालों को ये भारी संस्थागत छूट (Bulk Institutional Discount) पर उपलब्ध कराए जाते हैं:

  • डिस्पोजेबल सिरिंज और नीडल्स: जिस 5ml या 10ml की सिरिंज को अस्पताल मात्र ₹1.80 से ₹3.50 में थोक सप्लायर से खरीदते हैं, मरीज के अंतिम डिस्चार्ज बिल में उसके लिए ₹35 से ₹75 तक वसूले जाते हैं।

  • आईवी कैन्युला और ड्रिप सेट्स: खरीद लागत मात्र ₹8 से ₹15 प्रति यूनिट होती है, लेकिन मरीज से ₹120 से ₹250 तक चार्ज किए जाते हैं, जो कि वास्तविक खरीद मूल्य से 15 से 20 गुना अधिक है।

  • सर्जिकल ग्लव्स और पीपीई गाउन: ₹9 से ₹12 में मिलने वाले जीवाणुरहित लेटेक्स दस्तानों के जोड़े का बिल मरीज के खाते में ₹80 से ₹150 तक जोड़ा जाता है।

  • आईसीयू दवाएं और एंटीबायोटिक्स: कैंसर की कीमोथेरेपी, हाई-एंड एंटीबायोटिक्स और एनेस्थीसिया के इंजेक्शनों में खरीद मूल्य और एमआरपी के बीच 500% से लेकर 1,200% तक का सीधा मार्जिन दर्ज किया गया है।

दवाओं व मेडिकल उपकरणों के खरीद मूल्य बनाम मरीज से वसूली का तुलनात्मक खाका

मेडिकल आइटम / सामग्री अस्पताल का औसत खरीद मूल्य (Bulk Procurement) मरीज से वसूला जाने वाला मूल्य (MRP / Bill) मुनाफे का अंतर (Markup Factor)
डिस्पोजेबल सिरिंज (5ml/10ml) ₹2.20 – ₹3.50 ₹45.00 – ₹75.00 15x से 25x तक
आईवी कैन्युला (IV Cannula) ₹9.00 – ₹14.00 ₹140.00 – ₹220.00 12x से 18x तक
ऑक्सीजन मास्क / नेबुलाइजर किट ₹18.00 – ₹25.00 ₹250.00 – ₹450.00 14x से 20x तक
सर्जिकल कॉटन व गॉज रोल ₹12.00 – ₹18.00 ₹120.00 – ₹200.00 10x तक
कैथेटर (Foley Catheter) ₹28.00 – ₹40.00 ₹350.00 – ₹650.00 12x से 16x तक
क्रिटिकल केयर जेनेरिक इंजेक्शन ₹45.00 – ₹80.00 ₹1,800.00 – ₹4,500.00 40x से 67x तक

अस्पतालों द्वारा इस विशाल मार्जिन को सुरक्षित रखने के लिए एक संगठित व्यवस्था लागू की जाती है, जिसके तहत मरीजों के अधिकारों का सीधा हनन होता है:

  1. बाहर से दवा खरीदने पर रोक: अधिकांश बड़े निजी अस्पतालों में भर्ती मरीज के तीमारदारों को अस्पताल परिसर के बाहर स्थित किसी भी जन औषधि केंद्र या रिटेल केमिस्ट शॉप से दवाइयां और सर्जिकल सामान खरीदने की अनुमति नहीं दी जाती।

  2. ब्रांडेड प्रिस्क्रिप्शन और कोड्स: डॉक्टर पर्चे पर जेनेरिक साल्ट नेम लिखने के बजाय उन विशिष्ट ब्रांड्स या इन-हाउस कोड्स को लिखते हैं जो केवल उसी अस्पताल की आंतरिक फार्मेसी पर उपलब्ध होते हैं।

  3. इलाज रोकने का अप्रत्यक्ष दबाव: यदि तीमारदार बाहर से सस्ती दवा लाने का प्रयास करते हैं, तो अस्पताल प्रबंधन संक्रमण के खतरे या अस्पताल की क्वालिटी पॉलिसी का हवाला देकर सामान स्वीकार करने से मना कर देता है।

इस संगठित मेडिकल शोषण को रोकने के लिए केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय, एनपीपा और नीति आयोग एक संयुक्त नियामक ढांचे पर काम कर रहे हैं, जिसे जल्द ही अधिसूचित किया जा सकता है:

  • प्राइस टू डिस्ट्रीब्यूटर (PTD) पर मार्जिन कैपिंग: सरकार सभी गैर-अनुसूचित मेडिकल डिवाइसेज और कंज्यूमेबल्स पर ट्रेड मार्जिन रेशनलाइजेशन (TMR) लागू करने की तैयारी में है। इसके तहत जिस कीमत पर निर्माता कंपनी डिस्ट्रीब्यूटर या अस्पताल को सामान बेचती है (PTD), उस पर अस्पताल अधिकतम 30% से 50% से अधिक का मुनाफा नहीं जोड़ सकेंगे।

  • जन औषधि केंद्रों की अनिवार्य उपलब्धता: बड़े अस्पतालों के परिसरों में या उनके प्रवेश द्वार पर प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि केंद्र (PMBJK) और अमृत (AMRIT) फार्मेसियों के लिए जगह आवंटित करने को अनिवार्य बनाने पर विचार किया जा रहा है।

  • जेनेरिक साल्ट लिखना अनिवार्य: नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के दिशा-निर्देशों के तहत यदि कोई चिकित्सक पर्चे पर जेनेरिक नाम नहीं लिखता है या किसी विशिष्ट फार्मेसी से ही खरीदारी के लिए बाध्य करता है, तो उसके खिलाफ लाइसेंस निलंबन जैसी अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान किया जा रहा है।

  • पारदर्शी आइटम-वाइज ऑडिट: अस्पतालों को डिस्चार्ज समरी के साथ दवाओं और कंज्यूमेबल्स का विस्तृत बैच नंबर, निर्माता का नाम और वास्तविक बिल विवरण देना अनिवार्य होगा।

नियामक सख्ती के साथ-साथ आम नागरिकों को भी अपने कानूनी अधिकारों के प्रति सतर्क रहने की आवश्यकता है:

  • दवाओं का जेनेरिक साल्ट पूछें: डॉक्टर द्वारा लिखी गई महंगी दवाओं का साल्ट नेम (मूल रासायनिक घटक) पूछें और अस्पताल प्रबंधन से स्पष्ट कहें कि वे दवाओं का न्यूनतम लागत वाला जेनेरिक विकल्प उपलब्ध कराएं।

  • शिकायत निवारण तंत्र (Pharma Sahi Daam): यदि कोई अस्पताल तय राष्ट्रीय आवश्यक दवा सूची (NLEM) की दवाओं पर सीलिंग प्राइस से अधिक वसूलता है, तो एनपीपीए के ‘फार्मा जन समाधान’ पोर्टल या ‘फार्मा सही दाम’ मोबाइल ऐप पर सीधे बिल की कॉपी के साथ ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।

  • उपभोक्ता फोरम (Consumer Forum) का सहारा: उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (CPA) के तहत किसी भी मरीज को अनुचित व्यापार प्रथा (Unfair Trade Practice) के तहत बंधक बनाकर केवल अस्पताल की फार्मेसी से दवाएं खरीदने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों में उपभोक्ता अदालतें अस्पतालों पर भारी जुर्माना और हर्जाना लगा रही हैं।