News India Live, Digital Desk: भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में धर्म और आस्था को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई भी व्यक्ति अपने धर्म को ‘एकमात्र सत्य’ या ‘सर्वश्रेष्ठ’ बताकर दूसरे धर्मों को नीचा नहीं दिखा सकता। एक पादरी द्वारा दी गई दलील को खारिज करते हुए कोर्ट ने दो टूक कहा कि इस तरह का आचरण भारतीय संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। अदालत ने चेतावनी दी है कि अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब दूसरे की आस्था को ठेस पहुंचाना या जबरन धर्मांतरण का आधार तैयार करना बिल्कुल नहीं है।
संविधान सर्वोपरि, धार्मिक कट्टरता के लिए कोई जगह नहीं
मामले की सुनवाई के दौरान माननीय न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि भारत का संविधान सभी नागरिकों को अपने धर्म को मानने और उसका प्रचार करने की आजादी देता है, लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है। कोर्ट ने पादरी को फटकार लगाते हुए कहा कि यह कहना कि “केवल मेरा ही मार्ग सत्य है”, न केवल अहंकार को दर्शाता है बल्कि समाज में वैमनस्य भी फैला सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 25 के तहत मिली धार्मिक स्वतंत्रता में दूसरों को अपने धर्म की ओर जबरन आकर्षित करना या उनके विश्वास को गलत बताना शामिल नहीं है।
क्या है पूरा मामला? कोर्ट में क्यों हुई तीखी बहस
यह पूरा विवाद एक प्रार्थना सभा और उसमें दिए गए बयानों के बाद शुरू हुआ, जिसमें कथित तौर पर अन्य धर्मों के प्रति अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया गया था। आरोपी पादरी ने कोर्ट में दलील दी थी कि वह केवल अपने धर्म की शिक्षाओं का प्रचार कर रहा था। हालांकि, अभियोजन पक्ष ने सबूत पेश किए कि प्रचार की आड़ में भोले-भाले लोगों के मन में दूसरे धर्मों के प्रति नफरत भरी जा रही थी। कोर्ट ने इन दलीलों को गंभीरता से लिया और कहा कि धर्म के नाम पर समाज का ध्रुवीकरण किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।
धर्मांतरण और सामाजिक सद्भाव पर कोर्ट की बड़ी लकीर
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया कि धार्मिक प्रचार और धर्मांतरण के प्रयास के बीच एक बहुत ही बारीक रेखा होती है। यदि कोई व्यक्ति यह दावा करता है कि मोक्ष या सत्य केवल उसके धर्म में है, तो यह अप्रत्यक्ष रूप से दूसरे धर्म के अनुयायियों को भ्रमित करने का प्रयास है। कानून विशेषज्ञों का मानना है कि हाई कोर्ट का यह फैसला भविष्य में आने वाले धर्मांतरण से जुड़े मामलों में एक नजीर (Precedent) साबित होगा। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय है, न कि सार्वजनिक रूप से दूसरों को नीचा दिखाने का जरिया।
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