
धर्मनगरी हरिद्वार और उससे सटे राजाजी नेशनल पार्क के घने जंगलों की तलहटी में कई ऐसे पौराणिक और रहस्यमयी स्थान मौजूद हैं, जिनका संबंध सीधे देवाधिदेव महादेव के अलौकिक स्वरूप से जुड़ा है। इन्हीं में से एक बेहद चर्चित और रहस्यमयी मान्यता उस प्राचीन वटवृक्ष और जंगल के कोने से जुड़ी है, जहां माना जाता है कि भगवान शिव के प्रिय गण, भूत-प्रेत और अदृश्य शक्तियां आज भी वास करती हैं। स्थानीय लोग और साधु-संत इस स्थान को केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष दैवीय ऊर्जा का केंद्र मानते हैं।
शिव की बारात और घने जंगलों में भूतों का डेरा
पौराणिक कथाओं और शिव महापुराण के अनुसार, जब भगवान शिव माता सती से विवाह करने के लिए कनखल (हरिद्वार) की ओर जा रहे थे, तब उनके साथ देवी-देवताओं के अलावा उनके प्रिय गण, भूत, प्रेत, पिशाच और डाकिनी-शाकिनी की पूरी बारात शामिल थी।
कहा जाता है कि कनखल में राजा दक्ष के महल में प्रवेश करने से पहले भगवान शिव ने अपने गणों और बारात के साथ जंगलों के बीच एक विशालकाय वृक्ष की छांव में विश्राम किया था। जब राजा दक्ष और वहां मौजूद लोगों ने शिव के इस भयानक और विचित्र गणों वाले रूप को देखा, तो वे भयभीत हो गए। मान्यता है कि उस विश्राम स्थल पर शिवजी ने अपने गणों को हमेशा के लिए उस वन क्षेत्र की रक्षा करने और वहां वास करने का वरदान दिया था।
कनखल और भूतनाथ धाम का रहस्यमयी वटवृक्ष
हरिद्वार के कनखल क्षेत्र स्थित दक्षेश्वर महादेव मंदिर और स्वर्गाश्रम-जंगल सीमा पर स्थित ‘भूतनाथ’ क्षेत्र में एक अत्यंत प्राचीन वृक्ष मौजूद है। यह पेड़ कई सौ साल पुराना बताया जाता है, जिसकी विशालकाय जटाएं जमीन से लेकर आसमान तक फैली हुई हैं।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, सूर्यास्त के बाद इस घने जंगली क्षेत्र में एक अजीब सी ऊर्जा और शांति महसूस होती है। मान्यता है कि शिव के गण आज भी सूक्ष्म रूप में इस वृक्ष की शाखाओं और आसपास की प्रकृति में वास करते हैं। यही कारण है कि स्थानीय लोग शाम ढलने के बाद इस क्षेत्र में बिना कारण जाने से बचते हैं और केवल पूर्ण श्रद्धा व शुद्ध मन से ही यहां पूजन-अर्चन किया जाता है।
साधु-संतों और तांत्रिकों के लिए सिद्ध साधना स्थली
हरिद्वार का यह जंगली और एकांत क्षेत्र सदियों से अघोरियों, तांत्रिकों और उच्च कोटि के साधकों के लिए गुप्त साधना का केंद्र रहा है। भगवान शिव को ‘भूतनाथ’ यानी भूतों और आत्माओं का स्वामी कहा गया है।
साधकों का मानना है कि इस पवित्र वृक्ष के नीचे बैठकर महामृत्युंजय मंत्र या शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करने से व्यक्ति को भय, अकाल मृत्यु के डर और नकारात्मक ऊर्जाओं से तुरंत मुक्ति मिल जाती है। जो ऊर्जा आम इंसान को भयभीत करती है, वही ऊर्जा शिवभक्तों के लिए परम सुरक्षा कवच का काम करती है।
दक्षेश्वर महादेव और सती के यज्ञ कुंड से सीधा जुड़ाव
इस रहस्यमयी स्थान का इतिहास राजा दक्ष के उस ऐतिहासिक यज्ञ से भी अभिन्न रूप से जुड़ा है, जहां देवी सती ने अपने पिता द्वारा महादेव का अपमान किए जाने पर यज्ञ कुंड में आत्मदाह कर लिया था। इसके बाद भगवान शिव के आदेश पर वीरभद्र और उनके गणों ने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस किया था।
इतिहासकारों और श्रद्धालुओं के अनुसार, हरिद्वार का यह पूरा इलाका केवल आस्था का तीर्थ नहीं है, बल्कि यहां की हरियाली, पर्वत और प्राचीन वृक्ष शिव और शक्ति के उस महाविनाश और पुनर्जन्म की कहानी के जीवंत साक्षी हैं।
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