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Gupt Movie Facts: जब 90 के दशक में ‘सिमरन’ बनकर लोगों का दिल जीतने वाली काजोल ने अचानक निभाया साइको किलर का खौफनाक रोल

मुंबई: 90 के दशक में जब हिंदी सिनेमा की मुख्यधारा की अभिनेत्रियां बड़े पर्दे पर केवल सीधी-सादी, मासूम और ‘नेक्स्ट डोर गर्ल’ की छवि में खुद को ढालना पसंद करती थीं, ठीक उसी दौर में काजोल ने एक ऐसा साहसिक कदम उठाया था जिसने पूरे बॉलीवुड को चौंका दिया था। साल 1995 में आई ऑल-टाइम ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ में ‘सिमरन’ का किरदार निभाकर देश भर के युवाओं की धड़कन बन चुकी काजोल ने महज दो साल बाद एक ऐसा किरदार चुना, जिसके बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। निर्देशक राजीव राय की बहुचर्चित सस्पेंस थ्रिलर फिल्म ‘गुप्त: द हिडन ट्रूथ’ (1997) में काजोल ने न केवल एक नकारात्मक भूमिका (Negative Role) निभाई, बल्कि अपनी सनसनीखेज अदाकारी से पर्दे पर ऐसा खौफ पैदा किया कि लोग थिएटरों में दंग रह गए थे। ईशा दीवान के रूप में उनका यह अभिनय उनके करियर की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा साबित हुआ और इस किरदार ने भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक नया पन्ना लिख दिया।

90 के दशक में जब हीरोइनें रिस्क लेने से डरती थीं, तब काजोल ने उठाया बड़ा जोखिम

साल 1997 में रिलीज हुई ‘गुप्त’ जब सिनेमाघरों में पहुंची, तो दर्शकों को लग रहा था कि वे एक पारंपरिक त्रिकोणीय प्रेम कहानी और मर्डर मिस्ट्री देखने जा रहे हैं। फिल्म में बॉबी देओल (साहिल सिन्हा) और मनीषा कोइराला (शीतल चौधरी) के साथ काजोल (ईशा दीवान) मुख्य भूमिकाओं में थे। पूरी फिल्म में काजोल को एक बेहद प्यारी, प्रेमी के लिए समर्पित और दीवानी प्रेमिका के रूप में दिखाया गया था जो साहिल से बेइंतहा मोहब्बत करती है। पूरी कहानी में मुख्य संदिग्ध के तौर पर साहिल को ही देखा जा रहा था, जिस पर अपने ही पिता के कत्ल का इल्जाम था। लेकिन जब फिल्म का अंतिम मोड़ आया, तो पर्दे पर जो खुलासा हुआ उसने दर्शकों के रोंगटे खड़े कर दिए।

फिल्म की असली कातिल कोई और नहीं, बल्कि मासूम दिखने वाली ईशा दीवान ही थी। 90 के दशक में किसी स्थापित और शीर्ष रोमांटिक अभिनेत्री का ऐसा खौफनाक और पागलपन से भरा विलेन का रोल निभाना एक बहुत बड़ा करियर-रिस्क माना जाता था। उस जमाने में माना जाता था कि नेगेटिव किरदार निभाने से हीरोइन की ऑन-स्क्रीन छवि खराब हो सकती है और दर्शक उसे एक लीड एक्ट्रेस के रूप में स्वीकार करना बंद कर सकते हैं। लेकिन काजोल ने इस रूढ़िवादिता को दरकिनार करते हुए इस चुनौती को सहर्ष स्वीकार किया था।

फिल्मफेयर अवॉर्ड्स में बनाया ऐतिहासिक रिकॉर्ड, विलेन के लिए पुरस्कार जीतने वाली पहली अभिनेत्री बनीं

काजोल के इस रिस्क का परिणाम ऐसा निकला जिसकी कल्पना स्वयं फिल्म निर्माताओं और समीक्षकों ने भी नहीं की थी। ‘गुप्त’ न केवल 1997 की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में शामिल हुई, बल्कि काजोल के अभिनय की हर तरफ सराहना हुई। 1998 में आयोजित हुए 43वें फिल्मफेयर अवॉर्ड्स समारोह में इतिहास रच गया। काजोल को उनके किरदार ईशा दीवान के लिए ‘सर्वश्रेष्ठ नकारात्मक भूमिका’ (Filmfare Award for Best Performance in a Negative Role / Best Villain) का पुरस्कार दिया गया।

यह पुरस्कार भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ, क्योंकि फिल्मफेयर के इतिहास में पहली बार किसी महिला कलाकार (अभिनेत्री) ने ‘बेस्ट विलेन’ की श्रेणी में यह प्रतिष्ठित ट्रॉफी अपने नाम की थी। इससे पहले तक इस अवॉर्ड श्रेणी पर केवल अमरीश पुरी, डैनी डेंजोंगपा, आशुतोष राणा और नाना पाटेकर जैसे दिग्गज पुरुष कलाकारों का ही दबदबा हुआ करता था। काजोल द्वारा बनाया गया यह रिकॉर्ड वर्षों तक अटूट रहा और उन्होंने साबित कर दिया कि एक महिला कलाकार पर्दे पर किसी भी पुरुष विलेन से ज्यादा खौफनाक और दमदार नजर आ सकती है।

‘गुप्त’ की सफलता और काजोल का वो आइकोनिक क्लाइमेक्स सीन

फिल्म ‘गुप्त’ के क्लाइमेक्स सीन को आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे बेहतरीन और चौंकाने वाले ट्विस्ट्स में गिना जाता है। अस्पताल के उस अंतिम दृश्य में जब ईशा दीवान का सच सामने आता है, तो काजोल के चेहरे के भाव एक पल में मासूमियत से बदलकर बेहद भयानक और सनकीपन में तब्दील हो जाते हैं। उनकी आंखों में दिखने वाला वो खौफनाक पागलपन, चीखने-चिल्लाने का अंदाज और चाकू लेकर हमला करने का तरीका दर्शकों की ककंपकंपी छुड़ाने के लिए काफी था।

काजोल ने एक साक्षात्कार में बताया था कि जब उन्हें इस किरदार की कहानी सुनाई गई थी, तो वे एक पल के लिए चौंक गई थीं, लेकिन उन्हें महसूस हुआ कि यह किरदार उनके अभिनय क्षमता की सीमाओं को तोड़ने का सबसे सही जरिया है। उन्होंने ईशा दीवान के किरदार के हर शेड को इतनी गहराई और जुनून के साथ जीया कि दर्शक फिल्म खत्म होने के बाद भी उनके उस भयानक रूप को भूल नहीं पाए। बीजू शाह का पार्श्व संगीत (Background Score) और ‘गुप्त गुप्त’ का टाइटल ट्रैक आज भी इस सस्पेंस थ्रिलर की पहचान बना हुआ है।

क्यों यह रोल था उनके करियर की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा?

90 के दशक का दौर वह समय था जब बॉलीवुड में अभिनेत्रियों के लिए सीमित गुंजाइश हुआ करती थी। उन्हें मुख्य रूप से गानों में नाचने, हीरो की प्रेमिका बनने या भावुक दृश्य करने तक ही सीमित रखा जाता था। ऐसे माहौल में काजोल का एक साइकोपैथ किलर बनना किसी दुस्साहस से कम नहीं था। अगर यह प्रयोग असफल हो जाता, तो उनके करियर को भारी नुकसान पहुंच सकता था।

लेकिन काजोल की अदाकारी की ताकत यही थी कि उन्होंने न केवल दर्शकों को डराया बल्कि उन्हें हैरान भी कर दिया। ‘गुप्त’ के बाद बॉलीवुड में महिला पात्रों को लिखे जाने का नजरिया पूरी तरह से बदल गया। इसके बाद आने वाली कई फिल्मों में अभिनेत्रियों को ग्रे और नेगेटिव शेड्स वाले किरदार मिलने शुरू हुए। हालांकि, प्रियंका चोपड़ा (ऐतराज) जैसी कुछ ही अभिनेत्रियां बाद में इस श्रेणी में सफलता हासिल कर सकीं, लेकिन इस राह की पहली मशाल काजोल ने ही जलाई थी।

काजोल का अभिनय सफर और ‘गुप्त’ की अमर विरासत

‘गुप्त: द हिडन ट्रूथ’ न केवल काजोल के करियर की सबसे कठिन फिल्मों में से एक बनी, बल्कि यह आज भी भारतीय सस्पेंस-थ्रिलर सिनेमा का एक मानक (Standard) मानी जाती है। इसके बाद काजोल ने ‘दुश्मन’, ‘कुछ कुछ होता है’, ‘कभी खुशी कभी गम’, ‘फना’ और ‘माय नेम इज खान’ जैसी अनगिनत सुपरहिट फिल्मों में अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया, लेकिन ईशा दीवान का किरदार आज भी उनके सिनेमैटिक सफर की सबसे खास चमक के रूप में याद किया जाता है।

25 साल से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी जब कभी बॉलीवुड की सबसे बेहतरीन मर्डर मिस्ट्रीज या सबसे खौफनाक विलेन की बात होती है, तो काजोल की ‘गुप्त’ का नाम सबसे ऊपर आता है। यह एक ऐसा रोल था जिसने साबित किया कि काजोल सिर्फ रोमांस की रानी ही नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा की सबसे निडर और वर्सेटाइल अदाकाराओं में से एक हैं।