GST काउंसिल में बड़े बदलाव की तैयारी: अब जांच के दौरान नहीं होगी सीधी जेल, धारा 69 में गिरफ्तारी खत्म करने पर विचार

देश के कारोबारी जगत और टैक्सपेयर्स के लिए गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) व्यवस्था से जुड़ी एक अत्यंत महत्वपूर्ण और राहत भरी खबर सामने आ रही है। सरकार और जीएसटी काउंसिल व्यापार सुगमता (Ease of Doing Business) को बढ़ावा देने तथा करदाताओं के मन से उत्पीड़न व ‘इंस्पेक्टर राज’ के खौफ को पूरी तरह खत्म करने के लिए कानून में क्रांतिकारी फेरबदल करने की योजना बना रही है। सूत्रों के मुताबिक, आगामी जीएसटी काउंसिल बैठक में केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम (CGST Act) की धारा 69 के तहत जांच (Investigation) के दौरान की जाने वाली गिरफ्तारियों के प्रावधान को समाप्त करने के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। यदि इस ऐतिहासिक सुधार पर मुहर लग जाती है, तो अधिकारियों द्वारा केवल प्राथमिक संदेह या जांच के स्तर पर व्यापारियों को सीधे जेल भेजने की मनमानी शक्ति पर स्थायी रोक लग जाएगी।

केंद्रीय जीएसटी अधिनियम की धारा 69 कर अधिकारियों को यह असाधारण अधिकार देती है कि यदि कमिश्नर के पास ‘विश्वास करने का उचित कारण’ (Reason to Believe) हो कि किसी व्यक्ति ने धारा 132 के तहत निर्दिष्ट अपराध (जैसे फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट, बिना इनवॉइस सप्लाई या टैक्स चोरी) किया है, तो वह उसे सीधे गिरफ्तार करने का आदेश जारी कर सकता है। मौजूदा नियमों के अनुसार, ₹5 करोड़ से अधिक की कथित टैक्स चोरी के मामलों में यह अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती (Cognizable and Non-Bailable) माना जाता है। विवाद की मुख्य वजह यह रही है कि कई मामलों में अंतिम टैक्स देनदारी का निर्धारण (Final Adjudication) हुए बिना ही केवल सर्च और प्राथमिक जांच के दौरान अधिकारियों द्वारा गिरफ्तारी की शक्ति का इस्तेमाल किया गया। इससे वास्तविक कारोबारियों, कंपनी निदेशकों और स्टार्टअप संस्थापकों में कानूनी उत्पीड़न और अचानक गिरफ्तारी का निरंतर डर बना रहता था।

धारा 69 के अंधाधुंध और मनमाने इस्तेमाल को लेकर देश की शीर्ष अदालत तक कई मामले पहुंचे हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया था कि धारा 69 के तहत गिरफ्तारी का लिखित आदेश संबंधित व्यक्ति को सौंपे या ईमेल के जरिए सूचित किए बिना किसी भी नागरिक की गिरफ्तारी नहीं की जा सकती। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि महज समन जारी होने से कोई व्यक्ति आरोपी नहीं बन जाता और ‘रीजन टू बिलीव’ केवल अधिकारियों का संदेह नहीं बल्कि पुख्ता दस्तावेजी साक्ष्यों पर आधारित होना चाहिए। न्यायपालिका के कड़े रुख और उद्योग मंडलों (CII, FICCI, ASSOCHAM) की लगातार मिल रही मांगों के बाद अब वित्त मंत्रालय और जीएसटी की लॉ कमेटी इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि आपराधिक कार्रवाई और गिरफ्तारी को केवल जांच के दौरान हथियार बनाने के बजाय दीवानी वसूली और अंतिम फैसले तक सीमित किया जाना चाहिए।

यदि जीएसटी काउंसिल धारा 69 में संशोधन या जांच के दौरान गिरफ्तारी के अधिकार को हटाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे देती है, तो इसका सबसे बड़ा असर देश के कारोबारी माहौल पर पड़ेगा। अब तक ऑडिट, डेटा विसंगतियों या क्लर्कियल गलतियों के चलते भी कई बार व्यापारियों पर भारी जुर्माने और जेल जाने की तलवार लटक जाती थी। इस सुधार के बाद टैक्स अधिकारियों की प्राथमिक जिम्मेदारी पहले टैक्स डिमांड नोटिस (Show Cause Notice) जारी करने, कानूनी सुनवाई पूरी करने और अंतिम कर देनदारी तय करने की होगी। टैक्सपेयर्स को अपना पक्ष रखने, अपील करने और न्यायसंगत कानूनी प्रक्रिया से गुजरने का पूरा अवसर मिलेगा, जिससे व्यापारिक गतिविधियां बिना किसी प्रशासनिक दहशत के सुचारू रूप से चल सकेंगी।

सूत्रों का कहना है कि सुधार का उद्देश्य वास्तविक व्यापारियों और उद्योगों को सुरक्षा देना है, न कि संगठित रूप से फर्जी बिलिंग (Fake Invoicing) करने वाले जालसाजों को बचाना। इसके तहत नियम बनाए जा सकते हैं कि नियमित और पंजीकृत करदाताओं के मामले में जांच के दौरान गिरफ्तारी बिल्कुल नहीं होगी। हालांकि, बोगस कंपनियों (Shell Companies) के जरिए मनी लॉन्ड्रिंग करने वाले, बिना किसी वास्तविक व्यापार के करोड़ों का फर्जी आईटीसी (ITC) हड़पने वाले अंतरराष्ट्रीय या अंतरराज्यीय आपराधिक गिरोहों के लिए सख्त कानूनी प्रावधान और अदालती प्रक्रिया के बाद गिरफ्तारी के नियम यथावत लागू रहेंगे। यानी आपराधिक कानून की सख्ती केवल आदतन अपराधियों पर केंद्रित होगी, न कि सामान्य व्यापारिक जोखिम उठाने वाले उद्यमियों पर।

जीएसटी काउंसिल की बैठक में राज्यों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय वित्त मंत्रालय के बीच सहमति बनने के बाद इस ऐतिहासिक बदलाव को कानूनी रूप देने की प्रक्रिया शुरू होगी। इसके लिए संसद में सीजीएसटी संशोधन विधेयक पेश किया जाएगा। इसके पारित होने के बाद राज्यों को भी अपने संबंधित एसजीएसटी (SGST) कानूनों में तदनुसार संशोधन करना होगा। वित्तीय और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारतीय कर प्रणाली को दंडात्मक व्यवस्था से निकालकर आधुनिक, पारदर्शी और ‘विश्वास आधारित कराधान’ (Trust-Based Taxation) की ओर ले जाने वाला एक मील का पत्थर साबित होगा।