Grand Trunk Road History & Route 2026: क्या सचमुच शेरशाह सूरी ने बनवाई थी ग्रैंड ट्रंक रोड? जानिए 2300 साल पुरानी इस ऐतिहासिक सड़क का पूरा सच

आज भारत में एक्सप्रेस-वे और आधुनिक हाईवे का जाल बहुत तेजी से फैल रहा है, जिससे यात्रा बेहद सुगम और तेज हो गई है। मुंबई-पुणे एक्सप्रेस-वे से शुरू हुआ यह आधुनिक सिलसिला आज देश के कोने-कोने को जोड़ रहा है। लेकिन जब देश में चमचमाती कंक्रीट की सड़कें, नेशनल हाईवे या स्टेट हाईवे का वजूद नहीं था, तब भारत की सबसे बड़ी जीवन रेखा ‘ग्रैंड ट्रंक रोड’ (Grand Trunk Road – GT Road) हुआ करती थी।

यह सड़क न केवल अंग्रेजों के जमाने से पुरानी है, बल्कि इसका इतिहास सदियों का सफर समेटे हुए है। जीटी रोड को लेकर अक्सर आम लोगों के बीच यह धारणा है कि इसे केवल शेरशाह सूरी ने बनवाया था। लेकिन ऐतिहासिक और वैज्ञानिक तथ्य कुछ और ही कहानी बयां करते हैं। आइए बेहद आसान शब्दों में समझते हैं एशिया के इस सबसे पुराने और ऐतिहासिक मार्ग की पूरी दास्तां, इसका रूट और वर्तमान स्थिति:

ऐतिहासिक रूट: बांग्लादेश से काबुल तक का विशाल गलियारा

ऐतिहासिक रूप से ग्रैंड ट्रंक रोड का विस्तार बेहद विशाल था। यह दक्षिण एशिया को आपस में जोड़ने वाला सबसे बड़ा व्यापारिक और सामरिक मार्ग माना जाता था:

  • ऐतिहासिक विस्तार: यह सड़क वर्तमान बांग्लादेश के चटगांव (Chittagong) क्षेत्र से शुरू होकर भारत और पाकिस्तान को पार करते हुए सीधे अफगानिस्तान की राजधानी काबुल तक जाती थी।

  • भारत में पुराना मार्ग: भारत के भीतर यह मुख्य रूप से कोलकाता से शुरू होकर आधुनिक बिहार, उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों से गुजरती हुई दिल्ली, हरियाणा और पंजाब के अमृतसर तक पहुंचती थी। इसके बाद यह लाहौर, पेशावर होते हुए काबुल से जुड़ती थी।

  • ऐतिहासिक सीमा: भारत और पाकिस्तान के बीच स्थित प्रसिद्ध वाघा-अटारी बॉर्डर (Wagha-Attari Border) इसी ऐतिहासिक ग्रैंड ट्रंक रोड पर स्थित है।

  • आधुनिक स्वरूप: आज के समय में भारत के भीतर जीटी रोड का मूल वजूद कई आधुनिक राष्ट्रीय राजमार्गों में विलीन हो चुका है। इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा अब राष्ट्रीय राजमार्ग 19 (NH 19) और राष्ट्रीय राजमार्ग 44 (NH 44) जैसी प्रमुख सड़कों का हिस्सा बन चुका है।

2300 साल पुराना इतिहास: चंद्रगुप्त मौर्य का ‘उत्तरापथ’

ग्रैंड ट्रंक रोड का इतिहास शेरशाह सूरी से भी हजारों साल पुराना है। वास्तव में इसका मूल संबंध प्राचीन भारत के ‘उत्तरापथ’ (Uttarapath) से है, जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘उत्तर दिशा का प्रमुख मार्ग’।

  • मौर्य काल की रीढ़: मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य और उनके बाद सम्राट अशोक के शासनकाल में (लगभग 2300 वर्ष पूर्व) इस मार्ग का प्रशासनिक और सैन्य महत्व चरम पर था। इतने बड़े साम्राज्य को एक सूत्र में पिरोने, सेना की त्वरित आवाजाही, व्यापार और गुप्तचरों के जरिए संदेश भेजने के लिए इस कच्चे मार्ग को व्यवस्थित किया गया था।

  • यात्रियों की जीवन रेखा: प्राचीन काल से ही इस मार्ग का उपयोग देश-विदेश के व्यापारी, सैनिक, बौद्ध भिक्षु, साधु-संत और तक्षशिला जैसी यूनिवर्सिटीज में पढ़ने वाले छात्र करते आ रहे थे। इसलिए यह कहना बिल्कुल उचित होगा कि जीटी रोड का मूल ढांचा प्राचीन काल से ही मौजूद था, जिसे समय-समय पर विभिन्न राजाओं ने अपनी जरूरत के अनुसार सुधारा।

क्या वाकई शेरशाह सूरी ने बनाई यह सड़क? (दस्तावेजी सच)

इतिहास की किताबों में जीटी रोड के निर्माता के रूप में शेरशाह सूरी का नाम सबसे ऊपर सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। लेकिन यदि हम ऐतिहासिक समय-सीमा और वैज्ञानिक तथ्यों का विश्लेषण करें, तो एक बिल्कुल अलग पहलू सामने आता है:

5 साल का संक्षिप्त कार्यकाल: शेरशाह सूरी ने कन्नौज के युद्ध में मुगल बादशाह हुमायूं को पराजित कर दिल्ली के सिंहासन पर अधिकार किया था। सूरी का कुल शासनकाल महज 5 वर्ष (1540 से 1545 ईस्वी) का रहा। महज़ पांच साल के इतने छोटे से कार्यकाल में बांग्लादेश से लेकर अफगानिस्तान तक, हजारों किलोमीटर लंबी पक्की सड़क का नए सिरे से निर्माण करना तकनीकी और व्यावहारिक रूप से पूरी तरह असंभव है।

तो फिर सूरी का नाम क्यों लिया जाता है?

शेरशाह सूरी ने सड़क का निर्माण नहीं कराया था, बल्कि उसने प्राचीन बिखरे हुए ‘उत्तरापथ’ मार्ग का कायाकल्प (Restructuring) किया था। सूरी का योगदान निम्नलिखित कारणों से अतुलनीय माना जाता है:

  • उसने पुराने और जर्जर रास्तों को पूरी तरह से ठीक कराकर एक व्यवस्थित सड़क का रूप दिया और कई संकरे हिस्सों को चौड़ा कराया।

  • सराय व्यवस्था: यात्रियों और व्यापारियों की सुरक्षा व आराम के लिए सड़क के किनारे हर कुछ दूरी पर ‘सरायों’ (Rest houses) का निर्माण कराया, जहाँ ठहरने और घोड़ों के लिए चारे की व्यवस्था थी।

  • कोस मीनारें: दूरी को मापने के लिए सूरी ने सड़क के किनारे ‘कोस मीनारें’ बनवाईं। उस समय एक कोस लगभग 3 किलोमीटर के बराबर होता था, जिससे राहगीरों को यात्रा का सटीक अनुमान लगाने में मदद मिलती थी।

  • सुरक्षा एवं डाक: उसने सड़कों पर डाकुओं और लुटेरों से सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए और पहली बार इस मार्ग पर एक कुशल ‘डाक चौकी व्यवस्था’ विकसित की।

मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक: कैसे आधुनिक हुई जीटी रोड?

  • मुगल काल का वैभव: शेरशाह सूरी के बाद जब मुगलों ने दोबारा सत्ता संभाली, तो बादशाह अकबर और उनके उत्तराधिकारियों ने भी इस मार्ग का भरपूर उपयोग किया। दिल्ली, आगरा और लाहौर जैसे प्रमुख मुगल केंद्रों को जोड़ने में इसकी बड़ी भूमिका रही। इसी मार्ग के जरिए कपड़े, मसाले, अनाज और घोड़ों का बड़े पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार हुआ, जिससे इसके आसपास कई समृद्ध कस्बे और सांस्कृतिक केंद्र विकसित हुए।

  • ब्रिटिश काल की आधुनिक इंजीनियरिंग: 19वीं शताब्दी के दौरान ब्रिटिश शासन ने भारत पर अपनी प्रशासनिक और सैन्य पकड़ मजबूत करने के लिए जीटी रोड का पूरी तरह से आधुनिकरण किया। अंग्रेजों ने सड़क के बड़े हिस्सों को पक्का (Metalled Road) करवाया, पुराने नालों पर आधुनिक इंजीनियरिंग के पुल बनवाए और यातायात को सुगम बनाया। हालांकि, बाद में रेलवे नेटवर्क के आने से लंबी दूरी के लिए इसका महत्व थोड़ा कम हुआ, पर क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लिए यह हमेशा रीढ़ बनी रही।

आज 2026 में किस हाल में है यह ऐतिहासिक धरोहर?

आज के दौर में ग्रैंड ट्रंक रोड अपने पुराने पारंपरिक रूप में दिखाई नहीं देती। बदलते वक्त के साथ यह पूरी तरह से आधुनिक भारत की विकास गाथा का हिस्सा बन चुकी है:

  • आधुनिक हाईवे में तब्दील: दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल से गुजरने वाले इसके हिस्सों को चौड़ा करके 4-लेन और 6-लेन के चमचमाते नेशनल हाईवे, नए बाईपास और फ्लाईओवर में बदल दिया गया है, जिससे लंबी दूरी का सफर बेहद तेज हो चुका है।

  • शहरी चुनौतियां: बड़े शहरों (जैसे दिल्ली के शाहदरा, कानपुर, या वाराणसी के शहरी इलाकों) से गुजरते वक्त जीटी रोड को आज अत्यधिक ट्रैफिक जाम, अवैध अतिक्रमण (Encroachment) और बढ़ते प्रदूषण जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। मानसून के दिनों में इसके कुछ पुराने और उपेक्षित हिस्सों में गड्ढों और जलभराव की समस्या भी आम है।

ग्रैंड ट्रंक रोड केवल एक भौगोलिक रास्ता या मिट्टी-पत्थरों से बनी सड़क नहीं है; यह भारत के 2300 साल से अधिक के उतार-चढ़ाव भरे इतिहास, संस्कृतियों के मिलन, व्यापारिक क्रांतियों और साम्राज्यों के उदय-अस्त की एक जीवित निशानी है।