FD पर ब्याज से कमाई करने वालों के लिए बड़ा अपडेट: जानें कब कटता है TDS और कितनी आय पर मिलती है पूरी छूट

देश भर में सुरक्षित निवेश और तय मुनाफे के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट यानी एफडी को हमेशा से आम निवेशकों की पहली पसंद माना जाता है। चाहे सरकारी बैंक हों, निजी बैंक या डाकघर, करोड़ों भारतीय अपनी गाढ़ी कमाई को एफडी में जमा करते हैं। लेकिन अक्सर देखा जाता है कि जब ब्याज खाते में जुड़ता है, तो रकम उम्मीद से कम होती है और लोग सोच में पड़ जाते हैं कि आखिर पैसा कहां कट गया। यह कटौती बैंक द्वारा काटा जाने वाला टीडीएस यानी टैक्स डिडक्टेड एट सोर्स होता है। आयकर विभाग के नियमों के अनुसार एफडी पर मिलने वाला रिटर्न पूरी तरह टैक्स-फ्री नहीं होता है, बल्कि इस पर एक निश्चित सीमा पार करते ही सीधे स्रोत पर ही टैक्स काट लिया जाता है। अगर आप भी एफडी में निवेश करते हैं या नया डिपॉजिट खोलने की योजना बना रहे हैं, तो आपके लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि यह टीडीएस कब कटता है, कानून के तहत कितनी ब्याज आय पर एक रुपये की भी कटौती नहीं होती और अगर टीडीएस कट जाए तो उसे रिफंड कैसे कराया जा सकता है।

आयकर अधिनियम 1961 की धारा 194A के तहत बैंकों, सहकारी बैंकों और डाकघरों को यह कानूनी अधिकार दिया गया है कि वे जमाकर्ताओं के ब्याज भुगतान पर टीडीएस की कटौती करें। कई निवेशकों के मन में यह भ्रांति रहती है कि एफडी की मूल रकम पर टैक्स लगता है, जबकि वास्तविकता यह है कि टैक्स केवल उस जमा पर अर्जित ब्याज पर लागू होता है। बैंक एक वित्तीय वर्ष के दौरान ग्राहक के सभी एफडी और आरडी खातों पर मिलने वाले कुल ब्याज की गणना करते हैं। जैसे ही यह संयुक्त ब्याज सरकार द्वारा निर्धारित सालाना थ्रेशोल्ड सीमा को पार कर जाता है, बैंक उस पर टीडीएस काट लेते हैं। यहां यह समझना आवश्यक है कि टीडीएस कटने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आपकी अंतिम टैक्स देनदारी पूरी हो गई, बल्कि यह सरकार द्वारा अग्रिम रूप से वसूला जाने वाला टैक्स होता है जिसे बाद में आपकी कुल वार्षिक आय के साथ एडजस्ट किया जाता है।

आयकर नियमों में जमाकर्ताओं की आयु के आधार पर ब्याज छूट की अलग-अलग सीमाएं तय की गई हैं। यदि आपकी उम्र 60 वर्ष से कम है, यानी आप सामान्य नागरिक की श्रेणी में आते हैं, तो एक वित्तीय वर्ष में किसी एक बैंक से ₹50,000 तक के एफडी ब्याज पर कोई टीडीएस नहीं कटता है। जब तक आपका कुल अर्जित ब्याज इस सीमा के भीतर रहता है, बैंक पूरे ब्याज का भुगतान बिना किसी कटौती के आपके खाते में क्रेडिट करता है।

वरिष्ठ नागरिकों यानी 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के व्यक्तियों के लिए सरकार ने विशेष राहत प्रदान की है। सीनियर सिटीजंस के मामले में टीडीएस छूट की सीमा ₹1,00,000 प्रति वित्तीय वर्ष रखी गई है। इसका सीधा मतलब यह है कि यदि किसी बुजुर्ग निवेशक को एक वित्तीय वर्ष के भीतर एफडी से एक लाख रुपये तक का ब्याज मिलता है, तो बैंक उनके खाते से टीडीएस के रूप में एक भी रुपया नहीं काट सकता। गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों यानी एनबीएफसी या कॉरपोरेट एफडी के मामले में यह नियम थोड़ा सख्त है, जहां ₹5,000 से ₹10,000 से अधिक ब्याज अर्जित होने पर ही टीडीएस लागू हो जाता है।

टीडीएस की कटौती दर इस बात पर निर्भर करती है कि आपने बैंक में अपना पैन कार्ड यानी स्थायी खाता संख्या जमा की है या नहीं। यदि आपका पैन बैंक रिकॉर्ड में विधिवत अपडेटेड और आधार से लिंक है, तो थ्रेशोल्ड सीमा पार होने पर बैंक 10% की सामान्य दर से टीडीएस काटता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी सामान्य नागरिक को सालभर में ₹60,000 का ब्याज मिला, तो सीमा ₹50,000 पार होते ही पूरे ₹60,000 पर 10% यानी ₹6,000 टीडीएस काटा जाएगा।

परंतु यदि निवेशक ने बैंक शाखा में अपना पैन विवरण जमा नहीं कराया है या दिया गया पैन अमान्य है, तो आयकर की धारा 206AA के तहत बैंक को अनिवार्य रूप से 20% की दोहरी दर से टीडीएस काटना पड़ता है। इसलिए एफडी खाता खोलते समय ही अपना वैध पैन कार्ड प्रस्तुत करना समझदारी का पहला कदम है ताकि अनावश्यक अतिरिक्त कटौती से बचा जा सके।

पहले के दौर में कई लोग अलग-अलग शाखाओं में एफडी खोलकर टीडीएस से बच जाते थे, लेकिन आधुनिक कोर बैंकिंग सिस्टम यानी सीबीएस लागू होने के बाद ऐसा संभव नहीं रह गया है। बैंक अब शाखा के आधार पर नहीं, बल्कि ग्राहक के यूनिक कस्टमर आईडी और पैन नंबर के आधार पर कुल ब्याज की ट्रैकिंग करते हैं। यदि आपका एक ही बैंक की तीन अलग-अलग शाखाओं में खाता है और तीनों से मिलने वाला कुल ब्याज मिलाकर ₹50,000 से अधिक हो जाता है, तो बैंक का केंद्रीय सिस्टम स्वतः टीडीएस काट लेगा। हालांकि, यदि आपने अलग-अलग बैंकों में एफडी करवा रखी है, तो प्रत्येक बैंक केवल अपनी सीमा को परखेगा। इसका अर्थ यह है कि अलग-अलग बैंकों में सीमा से कम ब्याज रहने पर बैंक टीडीएस नहीं काटेंगे, लेकिन आपको आईटीआर फाइल करते समय अपनी कुल आय में उस पूरे ब्याज को अनिवार्य रूप से घोषित करना होगा।

यदि आपकी कुल वार्षिक आय आयकर छूट सीमा से कम है और आपकी अंतिम टैक्स देनदारी शून्य बनती है, तो आप बैंक को अग्रिम टीडीएस काटने से रोक सकते हैं। इसके लिए आयकर विभाग ने स्व-घोषणा फॉर्म की सुविधा दी है। 60 वर्ष से कम उम्र के भारतीय नागरिक वित्तीय वर्ष की शुरुआत में बैंक में फॉर्म 15G जमा कर सकते हैं। इसके लिए दो शर्तें जरूरी हैं: पहली यह कि आपकी कुल अनुमानित कर योग्य आय बेसिक छूट सीमा से कम हो और दूसरी यह कि एफडी से मिलने वाला कुल ब्याज भी बेसिक छूट सीमा से अधिक न हो।

वहीं 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों के लिए फॉर्म 15H उपलब्ध कराया जाता है। वरिष्ठ नागरिकों के लिए नियम अधिक लचीला है; यदि उनकी अंतिम कुल कर देनदारी शून्य है, तो वे ब्याज राशि अधिक होने पर भी फॉर्म 15H जमा करके टीडीएस कटौती पूरी तरह शून्य करा सकते हैं। यह फॉर्म वित्तीय वर्ष के पहले महीने यानी अप्रैल में ऑनलाइन नेट बैंकिंग या शाखा में जाकर जमा करना सबसे उत्तम रहता है।

कई बार जानकारी के अभाव में या समय पर घोषणा पत्र जमा न करने की वजह से बैंक खाते से टीडीएस कट जाता है। यदि आपके साथ भी ऐसा हुआ है तो घबराने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है। बैंक द्वारा काटा गया टीडीएस आयकर विभाग के पास जमा कर दिया जाता है और यह आपके फॉर्म 26AS तथा एनुअल इंफॉर्मेशन स्टेटमेंट यानी एआईएस में दर्ज हो जाता है। जब आप अपना वार्षिक आयकर रिटर्न यानी आईटीआर दाखिल करते हैं, तो वहां अपनी कुल आय और काटे गए टीडीएस का ब्यौरा दर्ज करें। यदि आपकी वास्तविक आय पर टैक्स देनदारी शून्य निकलती है या काटे गए टीडीएस से कम होती है, तो आयकर विभाग अतिरिक्त कटी हुई पूरी रकम सीधे आपके बैंक खाते में ब्याज सहित रिफंड के तौर पर भेज देता है।