
संसद के मानसून सत्र 2026 के दौरान केंद्र सरकार ने एक बड़ा विधायी कदम उठाते हुए फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) संशोधन विधेयक 2026 को 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास जांच के लिए भेजने का प्रस्ताव पारित कराया है। लोकसभा में गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने विपक्ष के भारी शोर-शराबे और हंगामे के बीच इस प्रस्ताव को पटल पर रखा, जिसे सदन ने मंजूरी दे दी। विपक्षी दल शुरुआत से ही इस विधेयक को वापस लेने या इस पर गहन समीक्षा की मांग कर रहे थे। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की सदन में मौजूदगी और अन्य मुद्दों पर विपक्ष की नारेबाजी के बीच सरकार ने गतिरोध समाप्त करने और विधेयक के सभी पहलुओं पर व्यापक विचार-विमर्श सुनिश्चित करने के उद्देश्य से इसे जेपीसी (JPC) के सुपुर्द करने का निर्णय लिया है।
अखिलेश यादव का सरकार पर तीखा प्रहार: ‘अल्पसंख्यकों और एनजीओ को दबाने की साजिश’
विधेयक को जेपीसी में भेजे जाने के बावजूद विपक्षी नेताओं के कड़े तेवर कम नहीं हुए हैं। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और सांसद अखिलेश यादव ने सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए आरोप लगाया कि एनडीए सरकार यह कानून केवल अपने राजनीतिक हितों को साधने और अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करने के लिए ला रही है। अखिलेश यादव ने संसदीय कार्य मंत्री किरन रिजिजू के उस बयान पर तीखा पलटवार किया, जिसमें रिजिजू ने कहा था कि यह विधेयक किसी अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ नहीं है। सपा प्रमुख ने तंज कसते हुए कहा, “सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि उन्होंने आज तक ऐसा कौन सा बिल पेश किया है जो अल्पसंख्यकों के खिलाफ न रहा हो?”
सपा सांसद अखिलेश यादव ने एनजीओ और चैरिटेबल ट्रस्टों के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि स्वयंसेवी संगठन, धार्मिक संस्थान और गैर-सरकारी संगठन (NGOs) देश के दूरदराज और आदिवासी इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाते आए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए ऐसे सख्त कानून ला रही है, जिससे समाज सेवा में लगे निर्दोष संस्थानों को निशाना बनाया जाएगा और लाखों गरीब बच्चों को शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित होना पड़ेगा। उन्होंने इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर भी सरकार को घेरते हुए कहा कि एक्सप्रेसवे पर गड्ढे हैं और हवाई अड्डों में पानी भर रहा है, लेकिन सरकार का पूरा ध्यान सिर्फ पाबंदियां लगाने पर है।
संसदीय कार्य मंत्री किरन रिजिजू का पलटवार: ‘विपक्ष का दोहरा रवैया, जेपीसी में रखें अपनी बात’
विपक्ष के आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरन रिजिजू ने सरकार के रुख का बचाव किया। रिजिजू ने कहा कि विपक्षी दल खुद ही लंबे समय से इस विधेयक को गृह मामलों की स्थायी समिति या संयुक्त संसदीय समिति (JPC) में भेजने की मांग कर रहे थे। जब सरकार ने उनकी मांग को स्वीकार करते हुए निष्पक्ष और विस्तृत चर्चा के लिए इसे जेपीसी को सौंपने का फैसला किया है, तो अब विपक्ष को इसका स्वागत करना चाहिए।
किरन रिजिजू ने विपक्षी दलों को खुली चुनौती देते हुए कहा कि यदि उन्हें एफसीआरए संशोधन विधेयक के किसी भी प्रावधान से आपत्ति है या उन्हें लगता है कि यह अल्पसंख्यकों के खिलाफ है, तो वे जेपीसी की बैठकों में तथ्य के साथ अपनी बात रखें। उन्होंने आश्वस्त किया कि यह विधेयक पूरी तरह पारदर्शी है और इसका उद्देश्य केवल विदेशी फंड के दुरुपयोग को रोकना व राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ बनाना है, न कि किसी विशेष समुदाय या संस्था को नुकसान पहुंचाना।
क्या है एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026? जानें इसके मुख्य प्रावधान और नियम
फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2026 को इस वर्ष 25 मार्च को लोकसभा में पहली बार पेश किया गया था। यह बिल विदेशी अंशदान अधिनियम के तहत गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), धार्मिक ट्रस्टों और सामाजिक संस्थाओं द्वारा प्राप्त होने वाले विदेशी धन के प्रबंधन और विनियमन को सख्त बनाने का प्रस्ताव करता है। इस कानून के तहत प्रमुख बदलाव और प्रावधान निम्नलिखित हैं:
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नामित अधिकारी (Designated Authority) की नियुक्ति: बिल का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान एक ‘डेजिग्नेटेड अथॉरिटी’ का गठन है। यदि किसी संस्था का एफसीआरए लाइसेंस रद्द होता है, सरेंडर किया जाता है या समय पर रिन्यू न होने से समाप्त हो जाता है, तो उस संस्था की विदेशी फंड से बनाई गई संपत्तियों को यह अथॉरिटी अपनी देखरेख और प्रबंधन में ले लेगी।
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पूजा स्थलों की धार्मिक पहचान का संरक्षण: बिल में यह स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि यदि विदेशी फंड से निर्मित कोई संपत्ति पूजा स्थल या धार्मिक केंद्र के रूप में उपयोग हो रही है, तो नामित अधिकारी को उस संपत्ति का धार्मिक चरित्र और स्वरूप बनाए रखना अनिवार्य होगा।
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सजा की अवधि में कटौती: मौजूदा एफसीआरए कानून के तहत नियमों के उल्लंघन पर अधिकतम 5 साल की जेल का प्रावधान था, जिसे नए संशोधन विधेयक में घटाकर अधिकतम 1 साल करने का प्रस्ताव रखा गया है।
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सख्त निगरानी और रिकॉर्ड: विदेशी चंदे के दुरुपयोग को रोकने के लिए संस्थाओं के खातों, खर्चों और बैंक विवरणों की नियमित ऑडिटिंग को अनिवार्य बनाया गया है।
जेपीसी (JPC) का ढांचा और आगे का समय चक्र: शीतकालीन सत्र में सौंपी जाएगी रिपोर्ट
संसद द्वारा पारित प्रस्ताव के अनुसार, एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 की समीक्षा करने वाली संयुक्त संसदीय समिति (JPC) कुल 31 सदस्यों की होगी। इसमें लोकसभा के 21 सांसद और राज्यसभा के 10 सांसद शामिल किए जाएंगे। लोकसभा सदस्यों का मनोनयन लोकसभा अध्यक्ष द्वारा और राज्यसभा सदस्यों का मनोनयन राज्यसभा के सभापति द्वारा किया जाएगा।
समिति के कामकाज के लिए कुल सदस्यों का एक-तिहाई भाग कोरम (Quorum) निर्धारित किया गया है। संसद ने जेपीसी को निर्देश दिया है कि वह विधेयक के सभी पहलुओं, हितधारकों (Stakeholders) के सुझावों और नागरिक समाज की चिंताओं का विस्तृत अध्ययन करके वर्ष 2026 के शीतकालीन सत्र (Winter Session 2026) के पहले सप्ताह के अंतिम दिन तक अपनी विस्तृत रिपोर्ट लोकसभा को सौंपे।
क्यों हो रहा है बिल का विरोध? राज्यों और धार्मिक संस्थाओं की चिंताएं
देश भर की कई धार्मिक संस्थाओं, चर्च यूनियनों और सिविल सोसाइटी संगठनों ने इस विधेयक पर गंभीर चिंताएं जताई हैं। खासतौर पर पूर्वोत्तर राज्यों जैसे मिजोरम, नागालैंड और मेघालय में इस बिल को लेकर व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिली है। हाल ही में मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने गिरजाघरों के प्रतिनिधियों के साथ नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर अपनी आशंकाएं जाहिर की थीं।
संस्थाओं की मुख्य चिंता यह है कि यदि किसी प्रशासनिक या तकनीकी कारण से उनका लाइसेंस रद्द होता है, तो उनकी दशकों पुरानी शैक्षणिक, स्वास्थ्य और धार्मिक संपत्तियों पर सरकार का सीधा नियंत्रण हो जाएगा। हालांकि, गृह मंत्री अमित शाह ने आश्वासन दिया था कि यह कानून पिछली तारीख (Retrospective Effect) से लागू नहीं होगा। अब जबकि यह मामला 31 सदस्यीय जेपीसी के पास चला गया है, तो उम्मीद जताई जा रही है कि समिति सभी पक्षों, धार्मिक प्रमुखों और कानून विशेषज्ञों के साथ बैठक कर विधेयक के विवादित बिंदुओं को दूर करने का प्रयास करेगी।
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