
कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) को लेकर वेतनभोगी वर्ग के बीच यह बहस अक्सर देखने को मिलती है कि जब हर महीने कटने वाला अंशदान कर्मचारी की अपनी मेहनत की कमाई है, तो इसे निकालने की तारीख, सीमा और शर्तें तय करने का अधिकार सरकार या ईपीएफओ (EPFO) के पास क्यों होना चाहिए। बहुत से कर्मचारियों का मानना है कि बैंक में जमा साधारण बचत की तरह पीएफ खाते पर भी उनका पूर्ण और बिना शर्त नियंत्रण होना चाहिए। हालांकि, नीति निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों और सामाजिक सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, ईपीएफ केवल एक नियमित बचत खाता (Savings Account) नहीं है, बल्कि यह एक ‘अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा तंत्र’ (Mandatory Social Security Scheme) है। सरकार द्वारा निकासी के नियम तय करने के पीछे कई दीर्घकालिक वित्तीय, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण हैं।
कर्मचारी भविष्य निधि एवं विविध प्रावधान अधिनियम, 1952 के तहत ईपीएफ का गठन आम उपभोग के लिए नहीं, बल्कि वृद्धावस्था सुरक्षा (Old-Age Financial Security) के उद्देश्य से किया गया था। भारत में अधिकांश संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों के पास कोई अन्य सरकारी पेंशन सुरक्षा नहीं होती। यदि पीएफ निकासी को एटीएम की तरह पूरी तरह लचीला बना दिया जाए, तो अधिकांश लोग अपनी कार्यशील उम्र (Working Age) के दौरान ही उपभोक्ता खर्चों, गैजेट्स या छुट्टियों में यह पूंजी खर्च कर बैठेंगे।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के सिद्धांतों के तहत प्रत्येक कल्याणकारी राज्य की यह जिम्मेदारी होती है कि वह अपने नागरिकों के लिए रिटायरमेंट के बाद जीवन यापन का एक न्यूनतम वित्तीय सहारा सुनिश्चित करे। यही कारण है कि कानूनन इसे लंबे समय के लिए लॉक-इन रखा जाता है।
ईपीएफ पर मिलने वाला सालाना ब्याज (जो आमतौर पर 8% से अधिक रहता है) पूरी तरह सरकारी गारंटी से सुरक्षित होता है। जब पैसा लगातार खाते में बना रहता है, तो उस पर चक्रवृद्धि ब्याज (Compounding Interest) काम करता है।
-
समय से पहले निकासी का नुकसान: यदि कोई कर्मचारी 30-35 वर्ष की आयु में 5 या 10 लाख रुपये निकाल लेता है, तो वह केवल उस मूल राशि को ही नहीं गंवाता, बल्कि अगले 20-25 वर्षों में उस पर बनने वाले 40 से 50 लाख रुपये के संभावित कंपाउंडिंग रिटर्न को भी खो देता है।
-
रिटायरमेंट पर आर्थिक संकट: सरकार का प्रयास रहता है कि 58 या 60 वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते कर्मचारी के पास इतना बड़ा रिटायरमेंट फंड (Corpus) तैयार हो जाए कि उसे वृद्धावस्था में किसी पर निर्भर न रहना पड़े।
बिहेवियरल इकोनॉमिक्स (व्यवहारवादी अर्थशास्त्र) के अनुसार, इंसान स्वभाव से भविष्य की तुलना में वर्तमान जरूरतों और इच्छाओं को ज्यादा प्राथमिकता देता है।
यदि पीएफ से मनचाही निकासी की खुली छूट दे दी जाए:
-
उपभोग में पैसा खर्च होना: तात्कालिक आकर्षणों या गैर-जरूरी खर्चों के चलते रिटायरमेंट फंड समय से पहले समाप्त हो जाएगा।
-
अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य संकट: उम्र के आखिरी पड़ाव में जब आय बंद हो जाती है और मेडिकल खर्च कई गुना बढ़ जाते हैं, तब बिना फंड वाले बुजुर्ग नागरिकों की जिम्मेदारी सीधे तौर पर सरकार और समाज पर आ जाती है।
-
आर्थिक अनुशासन: ईपीएफ अनिवार्य बचत की आदत डालता है, जिससे आपात स्थिति के अलावा पैसे को छूने से बचा जा सके।
यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है कि सरकार पैसे को पूरी तरह फ्रीज कर देती है। जीवन की वास्तविक जरूरतों और संकटों को ध्यान में रखते हुए ईपीएफओ ने कई परिस्थितियों में आंशिक निकासी (Partial Withdrawal/Advance) की छूट दी हुई है:
-
घर खरीदने या निर्माण के लिए: 5 वर्ष की सेवा के बाद घर या जमीन खरीदने के लिए पीएफ से बड़ा हिस्सा निकाला जा सकता है।
-
बच्चों की उच्च शिक्षा व शादी: 7 वर्ष की न्यूनतम सेवा पूरी होने पर बच्चों की शादी या उच्च शिक्षा के लिए निकासी की अनुमति है।
-
गंभीर बीमारी के इलाज के लिए: स्वयं या परिवार के सदस्यों (माता-पिता, जीवनसाथी, बच्चे) के गंभीर चिकित्सीय उपचार के लिए बिना किसी न्यूनतम सेवा शर्त के तुरंत एडवांस लिया जा सकता है।
-
बेरोजगारी या नौकरी छूटने पर: नौकरी छूटने के 1 महीने बाद 75% तक और 2 महीने से अधिक बेरोजगार रहने पर पूरा 100% फंड निकालने का अधिकार कर्मचारी के पास होता है।
संक्षेप में, पीएफ के पैसों पर सरकारी नियमों का नियंत्रण किसी पर पाबंदी लगाने के लिए नहीं, बल्कि व्यक्ति के भविष्य को उसके वर्तमान के अनियोजित खर्चों से सुरक्षित रखने का एक कानूनी ढाल है। हालांकि, विशेषज्ञों का यह भी तर्क है कि निकासी की ऑनलाइन प्रक्रिया को कागजी अड़चनों और तकनीकी रिजेक्शन से मुक्त कर और अधिक पारदर्शी व तेज बनाया जाना चाहिए, ताकि वास्तविक जरूरत के समय कर्मचारी को अपने ही पैसे के लिए कार्यालयों के चक्कर न काटने पड़ें।
girls globe