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ड्रैगन की गुप्त चाल दुनिया में युद्ध का हाहाकार, इधर चुपके से अनाज और खाद का भंडार भर रहा चीन

ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव और युद्ध जैसी स्थितियों ने दुनिया भर की सप्लाई चेन को हिलाकर रख दिया है। एक तरफ जहां कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, वहीं दूसरी तरफ चीन की एक ‘रहस्यमयी’ हरकत ने वैश्विक विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। वर्ल्ड बैंक के पूर्व अध्यक्ष डेविड मालपास ने आरोप लगाया है कि चीन बेहद गुपचुप तरीके से अनाज और खाद (Fertilizer) का विशाल भंडार तैयार कर रहा है।

चीन की ‘जमाखोरी’ और वर्ल्ड बैंक की चेतावनी

डेविड मालपास ने एक इंटरव्यू के दौरान चीन की इस रणनीति पर कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने बताया कि बीजिंग में होने वाले आगामी ट्रंप-शी जिनपिंग शिखर सम्मेलन से पहले चीन को यह जमाखोरी तुरंत बंद करनी चाहिए। उनके मुताबिक, चीन के पास इस समय दुनिया का सबसे बड़ा अनाज और खाद का स्टॉक है, जिसे वह और भी अधिक बढ़ाने में जुटा है। मार्च की शुरुआत से ही चीन ने घरेलू आपूर्ति का हवाला देते हुए खाद के निर्यात पर रोक लगा दी है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में हड़कंप मच गया है।

क्यों डरा हुआ है ‘ड्रैगन’? क्या है असली रणनीति?

जानकारों का मानना है कि चीन का यह कदम महज सुरक्षा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी कूटनीति का हिस्सा है। ईरान युद्ध के कारण ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) बंद पड़ा है, जिससे समुद्र के रास्ते होने वाली आवाजाही ठप हो गई है। चीन को डर है कि अगर युद्ध लंबा खिंचा, तो उसके यहां अकाल जैसे हालात बन सकते हैं। इसके अलावा, अनाज और खाद जैसी बुनियादी चीजों पर नियंत्रण करके चीन वैश्विक राजनीति में अपना दबदबा बनाना चाहता है। जब दुनिया में इनकी कमी होगी, तो चीन अपने भंडार का इस्तेमाल भारी मुनाफे और दूसरे देशों पर दबाव बनाने के लिए कर सकता है।

भारत के लिए क्यों है यह ‘खतरे की घंटी’?

भारत एक कृषि प्रधान देश है और खाद (विशेषकर डीएपी और यूरिया) के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है। चीन द्वारा निर्यात रोकने से भारत में खाद की किल्लत बढ़ सकती है। आंकड़ों की मानें तो ईरान युद्ध से पहले भारत जो यूरिया 512 डॉलर प्रति टन में खरीद रहा था, उसकी कीमत अब बढ़कर 959 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई है। खाद महंगी होने का सीधा असर खेती की लागत पर पड़ेगा, जिससे अंततः खाने-पीने की चीजों की कीमतें बढ़ेंगी और आम आदमी की जेब पर बोझ बढ़ेगा।