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Crude Oil Price Surge: कच्चे तेल में फिर भड़की आग, ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर के पार; क्या आम जनता पर पड़ेगा पेट्रोल-डीजल की महंगाई का बोझ?

अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी बाजार में कच्चे तेल की कीमतों ने एक बार फिर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) तेजी से उछलते हुए 110 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया है। पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा लाल सागर और प्रमुख तेल प्रतिष्ठानों पर किए जा रहे हमलों और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में आ रहे व्यवधानों के चलते तेल की कीमतों में यह नया उबाल देखा जा रहा है। भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरतों का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा विदेशों से आयात करता है, ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगी यह आग सीधे तौर पर घरेलू बाजार को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के पेट्रोल पंपों से लेकर देश के महानगरों में दैनिक आवागमन करने वाले आम नागरिकों और वाहन चालकों के मन में अब यही बड़ा सवाल कौंध रहा है कि क्या आगामी दिनों में पेट्रोल और डीजल के खुदरा दामों में बढ़ोतरी होगी या सरकारी तेल कंपनियां जनता को राहत देंगी।

वैश्विक ऊर्जा विश्लेषकों के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में आई इस तेज तेजी के पीछे केवल मांग का बढ़ना नहीं, बल्कि आपूर्ति से जुड़े कई गंभीर वैश्विक संकट जिम्मेदार हैं।

  • मिडिल ईस्ट में संघर्ष और हूती हमले: लाल सागर और बाब-अल-मंदेब के संकरे जलमार्ग में मालवाहक टैंकरों पर हूती हमलों के कारण शिपिंग कंपनियों को लंबे और महंगे समुद्री मार्गों का सहारा लेना पड़ रहा है, जिससे माल ढुलाई (Freight Rates) और बीमा प्रीमियम में भारी वृद्धि हुई है।

  • सऊदी अरब और खाड़ी क्षेत्र पर संकट: खाड़ी देशों के प्रमुख ऊर्जा केंद्रों के नजदीक बढ़ते सैन्य तनाव के कारण आपूर्ति में अचानक रुकावट आने का जोखिम चरम पर पहुंच गया है।

  • रिफाइनिंग क्षमता और अमेरिकी भंडार में गिरावट: वैश्विक स्तर पर डीजल और ईंधन की तंग आपूर्ति के बीच अमेरिकी क्रूड इन्वेंट्री में आई हालिया कमी ने वायदा बाजार में सट्टेबाजी और लिवाली को और हवा दे दी है।

  • रूसी आपूर्ति पर नई पाबंदियों की आशंका: पश्चिमी देशों द्वारा रूसी ऊर्जा प्रवाह और ‘शैडो फ्लीट’ पर कड़े नियमों की चर्चाओं के चलते रिफाइनरियों के पास कच्चे तेल के विकल्प सीमित हो रहे हैं।

जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 80 से 85 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में रहता है, तो भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियां (OMCs)—जैसे इंडियन ऑयल (IOCL), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL)—ईंधन बिक्री पर मजबूत ग्रॉस रिफाइनिंग मार्जिन (GRM) और मार्केटिंग मार्जिन अर्जित करती हैं। लेकिन जैसे ही ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर और अब 110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचता है, तेल कंपनियों की खरीद लागत तेजी से बढ़ जाती है। यदि खुदरा कीमतें स्थिर रखी जाती हैं, तो कंपनियों को पेट्रोल और विशेषकर डीजल की बिक्री पर ‘अंडर-रिकवरी’ यानी प्रति लीटर घाटा उठाना पड़ता है। हालांकि, राहत की बात यह है कि भारतीय रिफाइनरियों ने पिछले समय में रियायती रूसी कच्चे तेल और विविधीकृत बास्केट के जरिए काफी वित्तीय बफर तैयार किया था, जो इस तरह के अल्पकालिक झटकों को कुछ समय तक सोखने में मदद करता है।

कच्चे तेल में आई इस ताजा तेजी के बाद घरेलू स्तर पर ईंधन के दाम तुरंत बढ़ेंगे या नहीं, इसे लेकर ऊर्जा विशेषज्ञों का दृष्टिकोण बेहद नपा-तुला है। आर्थिक जानकारों के अनुसार, पेट्रोल और डीजल की कीमतें केवल कच्चे तेल की दैनिक कीमतों पर तय नहीं होतीं, बल्कि इसमें सरकार की राजकोषीय नीति, मुद्रास्फीति (Inflation) की स्थिति और राजनीतिक संवेदनशीलता की भी बड़ी भूमिका होती है।

  • अल्पकालिक ठहराव (Wait and Watch Policy): तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कीमतों में आने वाले इस उछाल को तुरंत उपभोक्ताओं पर डालने के बजाय अगले 10 से 15 दिनों के औसत रुझान पर नज़र रखेंगी। यदि यह तेजी केवल अस्थायी या सट्टेबाजी आधारित है और भाव जल्द ही 100 डॉलर से नीचे लौटते हैं, तो खुदरा दरों में बदलाव को टाला जा सकता है।

  • एक्साइज ड्यूटी और टैक्स में कटौती का विकल्प: यदि ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर के पार लंबे समय तक टिका रहता है, तो केंद्र और राज्य सरकारों के पास खुदरा महंगाई को नियंत्रित करने के लिए केंद्रीय उत्पाद शुल्क (Excise Duty) या राज्यों के वैट (VAT) में सीमित कटौती करने का विकल्प रहता है, ताकि आम जनता की जेब पर सीधा बोझ न पड़े।

  • महंगाई और आर्थिक वृद्धि पर असर: यदि ईंधन के दाम बढ़ते हैं, तो इसका सीधा असर माल ढुलाई और लॉजिस्टिक्स लागत पर पड़ेगा, जिससे फल, सब्जियों और रोजमर्रा की जरूरी चीजों की कीमतों में उछाल आ सकता है। इसलिए सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता ईंधन की कीमतों को यथासंभव स्थिर रखने की रहेगी।

वर्तमान में देश भर के प्रमुख महानगरों में पेट्रोल और डीजल की कीमतें काफी समय से स्थिर बनी हुई हैं। राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में पेट्रोल लगभग ₹94.72 और डीजल ₹87.62 प्रति लीटर के स्तर पर बिक रहे हैं। वहीं देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में पेट्रोल ₹104.21 और डीजल ₹92.15 प्रति लीटर के आसपास है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पेट्रोल लगभग ₹94.65 और डीजल ₹87.76 प्रति लीटर के भाव पर उपलब्ध हैं। स्थानीय बिक्री कर (VAT) और फ्रेट चार्ज अलग-अलग होने के कारण राज्यों और शहरों के बीच कीमतों में कुछ अंतर देखने को मिलता है। आने वाले दिनों में यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तनाव शांत नहीं होता है, तो पेट्रोलियम मंत्रालय और ओएमसी कंपनियों की संयुक्त समीक्षा बैठक में आगे की रणनीति तय की जाएगी।