Cooking Gas From Waste: कूड़ेदान में जाने वाला कचरा बनेगा आपके चूल्हे की गैस; पुणे के इस IIT इंजीनियर ने पिछले 7 साल से नहीं खरीदा कोई LPG सिलेंडर

सोचिए… आपकी रसोई (किचन) का बचा हुआ खाना, सड़ी-गली सब्जियां, फलों के छिलके और कूड़ेदान में जाने वाला गीला वेस्ट… अगर वही आपके घर के चूल्हे की गैस बन जाए तो? सुनने में यह भले ही किसी साइंस-फिक्शन फिल्म की कहानी जैसा अजीब लगे, लेकिन पुणे के एक आईआईटी (IIT) इंजीनियर ने इस अनोखे विचार को पूरी तरह से हकीकत में बदल दिया है।

जहां देश भर में लोग एलपीजी (LPG) सिलेंडर की बढ़ती कीमतों और रीफिलिंग के झंझट से परेशान रहते हैं, वहीं यह शख्स पिछले 7 साल से बिना एक भी रुपया खर्च किए और बिना कोई गैस सिलेंडर खरीदे अपने घर का खाना बना रहा है। इस अविश्वसनीय सफलता के पीछे छिपा है एक ऐसा देसी लेकिन स्मार्ट वैज्ञानिक जुगाड़, जो कचरे को ही शुद्ध ईंधन (Clean Fuel) में बदल देता है। सोशल मीडिया पर अब यह क्रांतिकारी आइडिया तेजी से वायरल हो रहा है।

पुणे के इंजीनियर प्रियदर्शन का महा-इन्वेंशन: क्या है ‘वायु’ बायोगैस सिस्टम?

पुणे के रहने वाले IIT इंजीनियर प्रियदर्शन शास्त्रबुद्धे ने पर्यावरण संरक्षण और होम-एनर्जी को ध्यान में रखते हुए एक बेहद खास पोर्टेबल सिस्टम तैयार किया है, जिसे उन्होंने ‘Vaayu’ (वायु बायोगैस डाइजेस्टर) नाम दिया है। प्रियदर्शन पिछले 7 सालों से पूरी तरह एलपीजी-मुक्त (LPG Free Lifestyle) जीवन जी रहे हैं।

  • कचरे से गैस का गणित: प्रियदर्शन अपने और आसपास के घरों से रोजाना करीब 11 किलोग्राम ऑर्गेनिक वेस्ट (गीला कचरा) इकट्ठा करते हैं।

  • 800 लीटर गैस का उत्पादन: यह 11 किलो कचरा उनके बनाए सिस्टम में जाकर हर दिन 800 लीटर शुद्ध कुकिंग गैस में तब्दील हो जाता है, जो एक सामान्य परिवार के तीन वक्त का खाना पकाने के लिए पर्याप्त से भी ज्यादा है। यानी जो कचरा पहले नालियों और डंपिंग ग्राउंड में सड़कर प्रदूषण फैलाता था, वही अब रसोई का कीमती ईंधन बन चुका है।

कैसे काम करता है यह पूरा सिस्टम? (How Vaayu Biodigester Works)

वायु बायोगैस सिस्टम को घर के बैकयार्ड, बगीचे या छत पर बेहद आसानी से इंस्टॉल किया जा सकता है। इसकी कार्यप्रणाली (Process) बहुत ही प्राकृतिक और वैज्ञानिक है:

  1. वेस्ट इनपुट: सबसे पहले इस सिस्टम के इनलेट (Inlet) में किचन का गीला कचरा, जैसे- सब्जी व फलों के छिलके, बासी या बचा हुआ खाना, चायपत्ती आदि डाल दिया जाता है।

  2. बैक्टीरियल डीकंपोजिशन: टैंक के भीतर मौजूद प्राकृतिक बैक्टीरिया (Natural Bacteria) उस ऑर्गेनिक कचरे को बिना किसी केमिकल के धीरे-धीरे तोड़ना (Decompose) शुरू करते हैं।

  3. मीथेन गैस का निर्माण: इस प्राकृतिक प्रक्रिया के दौरान भारी मात्रा में मीथेन गैस (Methane Gas) जनरेट होती है।

  4. बैलून स्टोरेज और सीधा चूल्हा: उत्पादित गैस को सिस्टम के ऊपर लगे एक खास सेफ्टी बैलून (Balloon) में स्टोर कर लिया जाता है। यह बैलून एक पाइप के जरिए सीधे आपकी रसोई के गैस चूल्हे (Gas Stove) से जुड़ जाता है, जिससे नीली और तेज आंच वाली क्लीन एनर्जी मिलती है।

सैकड़ों घरों और कमर्शियल रेस्टोरेंट्स तक पहुंचा यह देसी जुगाड़

प्रियदर्शन शास्त्रबुद्धे का यह आइडिया सिर्फ एक व्यक्तिगत जुगाड़ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब यह एक बड़े आंदोलन का रूप ले रहा है। वर्तमान में भारत के 350 से ज्यादा घरों में यह घरेलू बायोगैस सिस्टम सफलतापूर्वक काम कर रहा है।

  • सालाना 2500 सिलेंडरों की बचत: इन 350 घरों के वायु सिस्टम के कारण देश में हर साल लगभग 2,500 एलपीजी सिलेंडरों की भारी बचत हो रही है, जिससे पर्यावरण और देश का विदेशी मुद्रा भंडार दोनों सुरक्षित हो रहे हैं।

  • होटलों में बड़ा बदलाव: पुणे के ही एक बड़े रेस्टोरेंट में इस तकनीक का कमर्शियल इस्तेमाल हो रहा है, जहां रोज निकलने वाले 60 से 100 किलो फूड वेस्ट से ही होटल का खाना पकाया जा रहा है।

  • पूरी तरह एलपीजी फ्री: पुणे के ही रहने वाले अंगद पाटवर्धन नाम के एक यूजर ने बताया कि वे साल 2022 से इस सिस्टम को अपनाकर पूरी तरह एलपीजी फ्री हो चुके हैं और उनका गैस का खर्च अब ‘जीरो’ है।

क्यों है यह भारत की भविष्य की सबसे बड़ी जरूरत?

एक सरकारी रिपोर्ट और वैश्विक आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर इंसान सालाना औसतन 55 किलोग्राम फूड वेस्ट (खाना बर्बाद) पैदा करता है। यह वेस्ट जब डंपिंग यार्ड में जाता है, तो वहां पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली जहरीली गैसें पैदा होती हैं।

यदि देश का हर नागरिक या सोसायटियां इस बायोगैस तकनीक को अपना लें, तो न केवल हर घर का मासिक बजट बचेगा और महंगे सिलेंडरों से आजादी मिलेगी, बल्कि शहरों से कचरे के पहाड़ों का नामोनिशान मिट जाएगा और हमारी धरती मां को भी प्रदूषण से बड़ी राहत मिलेगी। प्रियदर्शन का यह ‘वायु’ प्रोजेक्ट साबित करता है कि सस्टेनेबल लिविंग (Eco-Friendly Living) ही भविष्य का इकलौता और सबसे सुंदर रास्ता है।