
लखनऊ। आधुनिक जीवनशैली, अत्यधिक मानसिक तनाव और असंतुलित खानपान के कारण आज ‘हाई कोलेस्ट्रॉल’ (High Cholesterol) एक बेहद आम लेकिन बेहद गंभीर स्वास्थ्य समस्या बन चुका है। इसे चिकित्सा विज्ञान में ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है क्योंकि धमनियों में वसा जमा होने पर भी शुरुआती चरणों में इसके कोई बाहरी लक्षण दिखाई नहीं देते। अक्सर लोग लिपिड प्रोफाइल टेस्ट (Lipid Profile Test) की रिपोर्ट में कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ा हुआ देखकर सीधे मेडिकल स्टोर से दवाएं खरीदकर खाना शुरू कर देते हैं, जो कि स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक हो सकता है। चिकित्सा विशेषज्ञों (हार्ट स्पेशलिस्ट) के मुताबिक, हर बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल स्तर के लिए तुरंत दवा की जरूरत नहीं होती है। आइए डॉक्टरों से सीधे समझते हैं कि आखिर दवा शुरू करने का सही पैमाना क्या है और कब सिर्फ आदतों को सुधारकर बात बन सकती है।
कितना होना चाहिए कोलेस्ट्रॉल का नॉर्मल स्तर?
एक स्वस्थ वयस्क के शरीर में कुल कोलेस्ट्रॉल (Total Cholesterol) का स्तर 200 mg/dL से कम होना चाहिए। इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका दो प्रकार के कोलेस्ट्रॉल की होती है:
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LDL (बैड कोलेस्ट्रॉल): इसका स्तर 100 mg/dL से कम होना आदर्श माना जाता है।
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HDL (गुड कोलेस्ट्रॉल): यह दिल की सुरक्षा करता है और इसका स्तर पुरुषों में 40 mg/dL और महिलाओं में 50 mg/dL से अधिक होना चाहिए।
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Triglycerides (ट्राइग्लिसराइड्स): इसका स्तर 150 mg/dL से नीचे रहना सुरक्षित माना जाता है।
दवा (Statins) की जरूरत कब पड़ती है?
वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट्स के अनुसार, केवल लिपिड प्रोफाइल की रिपोर्ट देखकर दवा शुरू नहीं की जाती, बल्कि मरीज के पूरे ‘कार्डियोवैस्कुलर रिस्क’ (हार्ट अटैक के खतरे) का आकलन किया जाता है। दवा की जरूरत मुख्य रूप से निम्नलिखित स्थितियों में पड़ती है:
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अत्यधिक उच्च स्तर: यदि किसी व्यक्ति का बैड कोलेस्ट्रॉल (LDL) 190 mg/dL या उससे अधिक पहुंच गया है, तो बिना देरी किए दवाएं शुरू करनी पड़ती हैं।
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पहले से मौजूद बीमारियां: यदि मरीज को पहले से डायबिटीज (मधुमेह), हाई ब्लड प्रेशर (उच्च रक्तचाप) है या उसे पहले कभी माइनर हार्ट अटैक या स्ट्रोक आ चुका है, तो डॉक्टरों का लक्ष्य LDL को 70 mg/dL या उससे भी नीचे लाने का होता है। ऐसी स्थिति में 100 mg/dL के स्तर पर भी दवाएं दी जाती हैं।
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पारिवारिक इतिहास: यदि परिवार में माता-पिता या भाई-बहन को कम उम्र में दिल की बीमारी (Heart Disease) होने का इतिहास रहा हो, तो आनुवंशिक कारणों से बढ़े कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने के लिए मेडिकल थेरेपी अनिवार्य हो जाती है।
कब सिर्फ लाइफस्टाइल में बदलाव से बन सकती है बात?
यदि किसी व्यक्ति का कुल कोलेस्ट्रॉल 200 से 239 mg/dL के बीच (बॉर्डरलाइन) है और LDL स्तर 100 से 130 mg/dL के आसपास है, तथा उसे दिल की बीमारी का कोई अन्य रिस्क फैक्टर (जैसे धूम्रपान, मोटापा या शुगर) नहीं है, तो डॉक्टर तुरंत दवा नहीं लिखते। ऐसी स्थिति में मरीज को 3 से 6 महीने का समय दिया जाता है, जिसमें केवल जीवनशैली और खानपान में सुधार करके कोलेस्ट्रॉल को पूरी तरह रिवर्स किया जा सकता है:
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डाइट में सुधार: भोजन से पूरी तरह ट्रांस फैट, रिफाइंड तेल, डालडा, मैदा, फास्ट फूड और अत्यधिक रेड मीट को बाहर करें। इसकी जगह फाइबर से भरपूर चीजें जैसे ओट्स, दलिया, हरी सब्जियां, फल, नट्स (बादाम, अखरोट) और फलियां शामिल करें।
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नियमित शारीरिक गतिविधि: रोजाना कम से कम 30 से 45 मिनट की तेज वॉक (Brisk Walking), योग या कार्डियो एक्सरसाइज करने से शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल घटता है और गुड कोलेस्ट्रॉल (HDL) का स्तर तेजी से बढ़ता है।
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वजन और तनाव नियंत्रण: यदि वजन ज्यादा है, तो उसे कम से कम 5 से 10 फीसदी तक घटाने का प्रयास करें। इसके अलावा पर्याप्त नींद लें और धूम्रपान व शराब के सेवन से पूरी तरह दूरी बना लें।
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