
उत्तराखंड से लगातार बच्चे लापता हो रहे हैं। कोई स्कूल से, कोई खेलते खेलते तो कई बाजार से घर ही नहीं आता। इन लापता बच्चों में ज्यादातर नाबालिग बच्चियां हैं। जिनकी उम्र 12 से 18 साल के बीच है। जब आप इसका आंकड़ा सुनेंगे तो आप भी हैरान रह जाएंगे। राजधानी देहरादून में पिछले 10 दिनों के भीतर 13 नाबालिग बच्चों की गुमशुदगी के मामले दर्ज हुए हैं। जिनमें अधिकतर लड़कियां हैं। आखिर ये बच्चे जा कहां रहे हैं? चलिए इस आर्टिकल में इसके बारे में जान लेते है।
उत्तराखंड से अचानक लापता हो रहे बच्चे
दरअसल पिछले कुछ वक्त से राज्य में बच्चों के लापता होने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। कोई स्कूल से घर नहीं पहुंचता, कोई खेलते खेलते गायब हो जाता है। तो कई बाजार से लौटते वक्त रास्ते में ही लापता हो जाता है। हैरानी की बात ये है कि इन लापता बच्चों में ज्यादातर नाबालिग बच्चियां हैं। इन बच्चों की उम्र 12 से 18 साल के बीच है।
क्या है बच्चों के लापता होने की वजह?
कुछ मामलों में इसे मानव तस्करी और किसी संगठित गिरोह से भी जोड़ा जाता है। लेकिन कई एक्सपर्ट्स की माने तो इसकी एक वजह ये भी हो सकती है कि कई बार बच्चे घर से नाराज होकर या दबाव में खुद ही घर से निकल जाते हैं। एक्सपर्ट्स की मानें तो सोशल मीडिया का बढ़ता असर बच्चों के बिहेवियर में धीरे-धीरे बदलाव ला रहा है। सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव, परिवारों में कम होते संवाद और बदलते सामाजिक माहौल इसकी बड़ी वजह हैं।
नाराज होकर खुद ही छोड़ रहे घर
कई बच्चे कम उम्र में सोशल मीडिया की चमक-दमक और लाइफस्टाइल से इनफ्लुएंस हो रहे हैं, जिनकी उन्हें समझ नहीं होती। जिसके चलते बच्चों को मां बाप की रोक टोक बुरी लगने लगती है। कभी गेम खेलने से रोकना, कभी देर रात मोबाइल छीन लेना। ये भी वजह हैं कि बच्चे इन सबसे नाराज होकर खुद ही घर छोड़ देते हैं।
10 दिनों में 13 नाबालिग बच्चे लापता
राजधानी के अलग-अलग थानों में पिछले 10 दिनों में करीब 13 नाबालिग बच्चों की गुमशुदगी के मुकदमे दर्ज किए गए हैं। इनमें ऋषिकेश, सेलाकुई और सहसपुर जैसे क्षेत्रों के मामले शामिल हैं। चौंकाने वाली बात ये है कि लापता होने वाले बच्चों की उम्र 12 से 18 साल के बीच है। इनमें अधिकांश नाबालिग लड़कियां हैं।
सालभर में गुमशुदा बच्चों में 93 प्रतिशत बच्चें को ढूंढ निकाला
वहीं पुलिस भी ऐसे मामलों में तत्परता दिखाते हुए अपनी तरफ से कोशिश करती है। पुलिस प्रशासन का कहना है कि पिछले एक साल के दौरान गुमशुदा हुए बच्चों में से 93 प्रतिशत बच्चों को बरामद भी किया गया है। हालांकि पुलिस का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए सिर्फ कानून व्यवस्था ही नहीं बल्कि सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर भी कोशिश करनी जरूरी है।
क्या बुरा है डिजिटल दौर?
डिजिटल दौर बुरा नहीं है लेकिन बिना गाइडेंस के ये खतरनाक साबित जरूर हो सकता है। साथ ही अपने बच्चों से कम्युनिकेशन बनाकर रखिए क्योंकि इसी से आप अपने बच्चे को अच्छे से समझा पाएंगे। साथ ही उन्हें ऐसे गलत फैसले लेने से रोक भी पाएंगे।
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