CGHS मेडिकल रीइंबर्समेंट के नए नियम जारी: ₹3000 वाली टेस्ट लिमिट, OPD पर्चे की वैलिडिटी और आंखों की जांच पर सरकार ने दी बड़ी राहत

केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए संचालित केंद्रीय सरकार स्वास्थ्य योजना (CGHS) के तहत मेडिकल क्लेम रीइंबर्समेंट से जुड़ी प्रक्रियाओं पर सरकार ने स्थिति पूरी तरह स्पष्ट कर दी है। अक्सर रीइंबर्समेंट क्लेम प्रोसेस करते समय बिल रिजेक्ट होने या रेफरल को लेकर लाभार्थियों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। इन तकनीकी बाधाओं और विसंगतियों को दूर करने के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और सीजीएचएस ने नए स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिनमें ओपीडी परामर्श, टेस्ट लिमिट, आंखों की जांच और विशेष जांचों के नियम तय किए गए हैं।

₹3,000 तक और उससे अधिक की जांचों के लिए नियम

अक्सर लाभार्थियों में यह भ्रम रहता था कि क्या ₹3,000 की सीमा रीइंबर्समेंट की अधिकतम कैपिंग है। सीजीएचएस ने साफ किया है कि ₹3,000 कोई अधिकतम रीइंबर्समेंट कैप नहीं है, बल्कि यह रेफरल और जांच केंद्र के चयन से जुड़ा एक पैमाना है। यदि किसी सूचीबद्ध (Empanelled) अस्पताल का विशेषज्ञ डॉक्टर ₹3,000 तक की कोई सामान्य जांच या माइनर प्रोसीजर लिखता है, तो लाभार्थी को वह जांच उसी अस्पताल में करानी होगी जहां उसने प्रारंभिक परामर्श लिया था। इसके लिए अलग से वेलनेस सेंटर से रेफरल लेने की जरूरत नहीं है।

यदि मरीज उसी परामर्श के आधार पर किसी दूसरे पैनल अस्पताल या डायग्नोस्टिक सेंटर से जांच कराना चाहता है, तो उसे सीजीएचएस वेलनेस सेंटर से पूर्व रेफरल या एंडोर्समेंट लेना अनिवार्य होगा। वहीं दूसरी ओर, ₹3,000 से अधिक लागत वाली बड़ी व विशेष जांचों जैसे एमआरआई (MRI), सीटी स्कैन (CT Scan) और पेट स्कैन (PET Scan) के लिए पहले से सीजीएचएस वेलनेस सेंटर का आधिकारिक रेफरल होना अनिवार्य है, अन्यथा क्लेम स्वीकार नहीं किया जाएगा।

OPD पर्चे की 7 दिन की वैधता अवधि

दिशानिर्देशों के अनुसार, किसी भी सूचीबद्ध अस्पताल में स्पेशलिस्ट डॉक्टर द्वारा जारी किया गया ओपीडी परामर्श पर्चा उसी विशेषज्ञता (Same Speciality) के भीतर केवल 7 दिनों के लिए वैध माना जाएगा। इसका सीधा अर्थ यह है कि यदि किसी लाभार्थी ने सोमवार को कार्डियोलॉजिस्ट से परामर्श लिया है, तो वह उसी परामर्श के आधार पर अगले 7 दिनों तक फॉलो-अप परामर्श, संबंधित दवा या जांच करवा सकता है। 7 दिन की अवधि समाप्त होने के बाद फॉलो-अप के लिए नया परामर्श या री-वेरिफिकेशन आवश्यक होगा।

आंखों की जांच और कंसल्टेशन फीस के नए मानक

आंखों के इलाज और जांच को लेकर निजी अस्पतालों द्वारा अलग-अलग प्रक्रियाओं के नाम पर अतिरिक्त शुल्क वसूलने की शिकायतों पर भी कड़ा रुख अपनाया गया है। नए नियमों के तहत आई स्पेशलिस्ट की कंसल्टेशन फीस में तीन प्राथमिक जांचें अनिवार्य रूप से शामिल रहेंगी। इनमें रिफ्रैक्शन (Refraction – चश्मे के नंबर की जांच), टोनोमेट्री (Tonometry – आंख के दबाव की जांच) और फंडस परीक्षण (Fundus Examination – रेटिना की जांच) शामिल हैं। सूचीबद्ध अस्पताल इन तीन जांचों के लिए मरीज से अलग से कोई शुल्क नहीं ले सकते।

फॉलो-अप इलाज और अनलिस्टेड जांचों की प्रक्रिया

यदि कोई विशेषज्ञ डॉक्टर ऐसी जांच या चिकित्सा प्रक्रिया की सिफारिश करता है जो सीजीएचएस की अनुमोदित दर सूची (CGHS Rate List) में सूचीबद्ध नहीं है (Unlisted Investigation), तो मरीज को सीधे जांच कराने के बजाय संबंधित विभाग या प्रशासनिक कार्यालय से पूर्व अनुमति (Prior Permission) प्राप्त करनी होगी। इसके अतिरिक्त, मरीज की प्राथमिक चिकित्सा जिस अस्पताल में शुरू हुई है, उसी अस्पताल में फॉलो-अप इलाज जारी रखने की सलाह दी गई है ताकि उपचार के रिकॉर्ड में निरंतरता बनी रहे और क्लेम सेटलमेंट बिना किसी आपत्ति के तेजी से पूरा हो सके।