
अक्सर कॉलेज की लंबी छुट्टियों में युवा मौज-मस्ती या ट्रिप्स प्लान करते हैं, लेकिन बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (BBA) की पढ़ाई कर रहे एक युवा छात्र ने आत्मनिर्भर बनने की ठानी। अपनी कॉलेज वेकेशन के खाली समय का सदुपयोग करने और प्रैक्टिकल बिजनेस ऑपरेशंस को जमीन पर समझने के लिए उसने राइड-हेलिंग प्लेटफॉर्म रैपिडो (Rapido) पर बतौर ‘ऑटो कैप्टन’ काम करने का फैसला किया। लगातार तीन महीने तक रोजाना 8 से 10 घंटे शहर की सड़कों पर ऑटो दौड़ाने के बाद छात्र ने सोशल मीडिया पर अपनी विस्तृत कमाई, फ्यूल खर्च, प्लेटफॉर्म कट और जमीनी अनुभवों का कच्चा-चिट्ठा पेश किया है, जो इंटरनेट पर काफी वायरल हो रहा है।
3 महीने का पूरा वित्तीय हिसाब: कितनी हुई कुल कमाई?
छात्र ने पारदर्शिता बरतते हुए अपनी कुल ग्रॉस अर्निंग (Gross Earnings) और शुद्ध मुनाफे (Net Profit) का पूरा ब्रेकडाउन साझा किया:
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कुल ग्रॉस अर्निंग: छात्र ने 3 महीने के दौरान करीब 1,35,000 रुपये से लेकर 1,50,000 रुपये के आसपास की कुल राइड वैल्यू जनरेट की।
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सीएनजी/पेट्रोल और मेंटेनेंस खर्च: लगभग 35,000 से 40,000 रुपये ईंधन और वाहन के सामान्य मेंटेनेंस में खर्च हुए।
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प्लेटफॉर्म कमीशन व टैक्स कटौती: कंपनी के कमीशन और जीएसटी कटने के बाद छात्र के हाथ में लगभग 85,000 से 95,000 रुपये की शुद्ध बचत (Net In-hand Income) आई।
यानी छात्र ने हर महीने औसतन 28,000 से 32,000 रुपये की इन-हैंड कमाई की, जो टियर-1 या टियर-2 शहरों में एक फ्रेशर की शुरुआती इंटर्नशिप या एंट्री-लेवल जॉब से काफी बेहतर मानी जा सकती है।
गिग इकोनॉमी का कड़वा सच: कड़ी धूप, जाम और लगातार दबाव
छात्र ने केवल अच्छी कमाई की तारीफ ही नहीं की, बल्कि गिग वर्कर्स (Gig Workers) के रोजमर्रा के कड़े संघर्ष और जमीनी हकीकत को भी बेबाकी से उजागर किया। छात्र के मुताबिक, स्क्रीन पर दिखने वाले आंकड़े आसान लगते हैं, लेकिन इसके पीछे भीषण गर्मी, ट्रैफिक जाम, अचानक कैंसिलेशन और एल्गोरिदम के दबाव में 10-10 घंटे लगातार गाड़ी चलाना बेहद थका देने वाला होता है। इसके अलावा, काम के दौरान न तो कोई फिक्स्ड टाइमिंग होती है, न ही पेड लीव, पीएफ या मेडिकल इंश्योरेंस जैसी कोई सोशल सिक्योरिटी मिलती है।
BBA की किताबों से ज्यादा सड़कों पर सीखे बिजनेस के गुर
छात्र ने अपने अनुभव को साझा करते हुए बताया कि इन 90 दिनों ने उसे किताबों से कहीं ज्यादा ग्राहक मनोविज्ञान (Customer Psychology), पीक-आवर डायनेमिक्स, रूट ऑप्टिमाइजेशन और स्ट्रेस मैनेजमेंट सिखाया। अलग-अलग मिजाज के पैसेंजर्स से डील करना, कम लागत में अधिकतम माइलेज निकालना और कठिन परिस्थितियों में शांत रहना उसके लिए किसी एमबीए केस स्टडी से कम नहीं था।
सोशल मीडिया पर यूजर्स छात्र की इस कड़ी मेहनत, स्वावलंबन और किसी भी काम को छोटा न समझने की सोच की जमकर तारीफ कर रहे हैं।
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