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Aja Ekadashi: अजा एकादशी पर आज जरूर पढ़ें राजा हरिश्चंद्र और चांडाल की यह पौराणिक कथा, जानें क्यों इसके बिना अधूरा है आपका व्रत

सनातन धर्म में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी के नाम से जाना जाता है। आज के दिन श्रद्धालु भगवान श्रीहरि विष्णु और माता लक्ष्मी की विधिवत पूजा-अर्चना कर उपवास रख रहे हैं। धार्मिक ग्रंथों और पुराणों के अनुसार, एकादशी का उपवास केवल अन्न त्यागने तक सीमित नहीं है, बल्कि इस पावन तिथि पर व्रत कथा का श्रवण और पठन करना अनिवार्य विधान है। मान्यता है कि जो जातक पूरे विधि-विधान से उपवास रखते हैं लेकिन व्रत कथा का श्रवण नहीं करते, उन्हें इस अनुष्ठान का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।

अजा एकादशी की पौराणिक कथा मनुष्य को कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सत्य, धर्म और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने की आत्मिक शक्ति प्रदान करती है। इस दिन सच्चे मन से भगवान विष्णु का स्मरण करने और कथा का पाठ करने से जन्म-जन्मांतर के संचित पापों का शमन होता है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि अजा एकादशी का माहात्म्य सुनने मात्र से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन में आए दुर्भाग्य का अंत होता है।

अजा एकादशी की मुख्य व्रत कथा अयोध्या के चक्रवर्ती और परम सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के जीवन से जुड़ी हुई है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, राजा हरिश्चंद्र अपनी सत्यनिष्ठा, परोपकार और वचनबद्धता के लिए तीनों लोकों में विख्यात थे। उनके सत्य की परीक्षा लेने के लिए महर्षि विश्वामित्र ने एक दिव्य योजना बनाई। मुनि ने राजा के स्वप्न में आकर उनका संपूर्ण राज्य दान स्वरूप मांग लिया। अगले दिन जब विश्वामित्र साक्षात राजा के दरबार में उपस्थित हुए, तो हरिश्चंद्र ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपना राज-पाट, हाथी, घोड़े, खजाना और पूरा साम्राज्य ऋषि के चरणों में समर्पित कर दिया।

साम्राज्य दान करने के बाद महर्षि विश्वामित्र ने दान की दक्षिणा मांगी। राजा हरिश्चंद्र के पास अब देने के लिए कुछ भी शेष नहीं बचा था। सत्य की रक्षा और दक्षिणा चुकाने के लिए राजा ने स्वयं को, अपनी धर्मपत्नी महारानी तारामती और अपने प्रिय पुत्र रोहिताश्व को बेचने का कठोर निर्णय लिया। महारानी और राजकुमार को एक ब्राह्मण ने अपने घर के कार्यों के लिए खरीद लिया, जबकि राजा हरिश्चंद्र को काशी के मणिकर्णिका घाट के स्वामी एक चांडाल ने क्रय किया।

चक्रवर्ती सम्राट हरिश्चंद्र अब काशी के श्मशान भूमि पर चांडाल के सेवक के रूप में कार्य करने लगे। उनका मुख्य काम रात-दिन जलती चिताओं की निगरानी करना और दाह-संस्कार के लिए आने वाले शवों के परिजनों से कफ़न का कर वसूलना था। राजसी वस्त्रों और ऐश्वर्य में जीवन बिताने वाले राजा अब चिताओं के अंगारों और मुर्दों की राख के बीच दिन-रात बिताने को विवश थे। ऐसी दारुण स्थिति में भी उन्होंने अपने स्वामी चांडाल की आज्ञा और सत्य के मार्ग को कभी नहीं छोड़ा।

एक दिन नियति ने राजा पर और भी भयंकर आघात किया। वन में खेलते समय राजकुमार रोहिताश्व को एक विषैले सर्प ने डस लिया, जिससे उसकी अकाल मृत्यु हो गई। महारानी तारामती विलाप करती हुई अपने मृत बालक को गोद में उठाकर आधी रात को काशी के श्मशान घाट पहुंचीं। घने अंधकार में राजा हरिश्चंद्र ने अपनी पत्नी के विलाप को सुना और अपने मृत पुत्र को पहचान लिया। पिता का हृदय हाहाकार कर उठा, लेकिन श्मशान के पहरेदार के रूप में उनका कर्तव्य आड़े आ गया। उन्होंने रानी से साफ कह दिया कि बिना कर चुकाए वे अपने ही पुत्र के शव का अंतिम संस्कार नहीं करने दे सकते, क्योंकि यह उनके स्वामी के नियम के विरुद्ध था।

महारानी तारामती के पास कर देने के लिए धन का एक तिनका भी नहीं था। उन्होंने कर के रूप में अपनी पहनी हुई साड़ी का आधा हिस्सा फाड़कर देने का प्रयास किया। उसी दौरान राजा हरिश्चंद्र के मन में यह सवाल बार-बार उठ रहा था कि आखिर उन्होंने कौन सा पाप किया है, जिसकी सजा उनका पूरा परिवार भुगत रहा है। अपने इसी संताप के बीच राजा की भेंट एक बार ब्रह्मर्षि गौतम से हुई थी। राजा ने हाथ जोड़कर मुनि से पूछा था कि हे ऋषिवर, मुझे इस असह्य कष्ट और चांडाल की दासता से मुक्ति पाने का कोई मार्ग दिखाएं।

महर्षि गौतम ने राजा के पूर्वजन्मों के संचित कर्मों को ध्यान में देखकर उन्हें भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अजा एकादशी का विधान बताया। मुनि ने कहा कि हे राजन, इस पावन तिथि पर निराहार रहकर भगवान विष्णु की आराधना करो, रात्रि में जागरण कर हरि संकीर्तन करो और इस व्रत की कथा का पाठ करो। अजा एकादशी का प्रभाव इतना दिव्य है कि यह पूर्वजन्म के समस्त पापों को तत्काल भस्म कर देती है और मनुष्य को उसका खोया हुआ मान-सम्मान वापस दिलाती है। राजा हरिश्चंद्र ने महर्षि की आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए पूरी निष्ठा के साथ अजा एकादशी का व्रत संपन्न किया।

अजा एकादशी के पावन व्रत और राजा हरिश्चंद्र की अटूट सत्यनिष्ठा के प्रभाव से स्वर्गलोक तक हलचल मच गई। जैसे ही महारानी तारामती ने कर के रूप में साड़ी का टुकड़ा देना चाहा, स्वयं भगवान श्रीहरि विष्णु, देवराज इंद्र और महर्षि विश्वामित्र वहां प्रकट हो गए। विश्वामित्र ने मुस्कुराते हुए कहा कि यह केवल राजा के सत्य, धैर्य और धर्मपरायणता की परीक्षा थी, जिसमें वे पूरी तरह सफल हुए हैं।

भगवान विष्णु के आशीर्वाद से मृत राजकुमार रोहिताश्व तत्काल जीवित होकर उठ बैठा। राजा हरिश्चंद्र का चांडाल की दासता से मुक्त होना सिद्ध हुआ और महर्षि विश्वामित्र ने उनका संपूर्ण राज्य ससम्मान वापस लौटा दिया। नगर में उत्सव का माहौल बन गया और चारों ओर राजा हरिश्चंद्र के सत्य की जय-जयकार होने लगी। राजा ने अपनी प्रजा के साथ लंबे समय तक धर्मपूर्वक शासन किया और जीवन के अंतिम पड़ाव में पूरे परिवार सहित वैकुंठ लोक को प्रस्थान किया।

अजा एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर पवित्र नदियों में स्नान करने या घर पर ही पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करने का विशेष महत्व है। पूजा स्थल पर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित कर उन्हें पीले पुष्प, तुलसी दल, चंदन, अक्षत और फल-मिष्ठान अर्पित करने चाहिए। पूजा के समय ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का निरंतर जप करना चाहिए।

संध्याकाल में विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ और घी का दीपक जलाकर आरती करना अत्यंत शुभ माना गया है। रात्रि में जागरण कर भजन-कीर्तन करने से व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है। अगले दिन द्वादशी तिथि के शुभ मुहूर्त में ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को भोजन कराकर और दान-दक्षिणा देकर ही व्रत का पारण करना चाहिए। इस प्रकार जो भक्त अजा एकादशी का व्रत रखकर कथा का श्रवण करते हैं, उनके घर में सुख, शांति, समृद्धि और आरोग्य का वास होता है।