2013 की किताब पर 2025 का सम्मान! ‘कुरमुरी’ ने दी खुलवा दी उत्तराखंड में पुरस्कारों की पोल

उत्तराखंड के साहित्यिक जगत में इन दिनों बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। प्रतिष्ठित कन्हैयालाल डंडरियाल पुरस्कार को लेकर सामने आए मामले ने न सिर्फ भाषा संस्थान की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि साहित्यिक पुरस्कारों की पारदर्शिता पर भी बहस छेड़ दी है।

2013 की किताब पर 2025 का सम्मान

उत्तराखंड भाषा संस्थान ने वर्ष 2025 के लिए दिया गया कन्हैयालाल डंडरियाल पुरस्कार निरस्त कर दिया है। यह सम्मान गढ़वाली काव्य संग्रह ‘कुरमुरी’ के लिए साहित्यकार ओम बधाणी को दिया गया था। मामले की पुष्टि करते हुए उत्तराखंड भाषा संस्थान की निदेशक माया ढकरियाल ने बताया कि शिकायत मिलने के बाद जांच कराई गई, जिसमें लगाए गए आरोप सही पाए गए। ऐसे में आगे की कार्रवाई को लेकर भाषा मंत्री से दिशा-निर्देश मांगे गए हैं।

ये है पूरा मामला

दरअसल, विवाद की शुरुआत दिल्ली निवासी संदीप गढ़वाली की शिकायत से हुई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि ओम बधाणी का गढ़वाली काव्य संग्रह ‘कुरमुरी’ मूल रूप से वर्ष 2013 में प्रकाशित हो चुका था, जबकि पुरस्कार के नियमों के मुताबिक केवल वर्ष 2022 से 2024 के बीच प्रकाशित मौलिक गढ़वाली पद्य पुस्तकें ही इस सम्मान के लिए पात्र थीं।

कवर पेज बदलकर और प्रकाशन वर्ष बदलकर दिखाकर ले लिया पुरस्कार

शिकायतकर्ता ने दावा किया कि पुस्तक का कवर पेज बदलकर और प्रकाशन वर्ष 2013 की जगह 2023 दर्शाकर उसे दोबारा प्रकाशित किया गया। इसके बाद उसी पुस्तक को पुरस्कार के लिए आवेदन में शामिल किया गया। शिकायत के साथ संस्थान को दस्तावेज और अन्य प्रमाण भी सौंपे गए थे।

ओम बधाणी को नोटिस जारी

मामले की गंभीरता को देखते हुए भाषा संस्थान ने ओम बधाणी को नोटिस जारी किया। जवाब में उन्होंने इसे “भूलवश हुई त्रुटि” बताया, लेकिन शिकायतकर्ता ने इसे जानबूझकर किया गया कृत्य करार देते हुए सख्त कार्रवाई की मांग की। जांच पूरी होने के बाद संस्थान ने शिकायत को सही माना और पुरस्कार निरस्त करने का फैसला लिया। ओम बधाणी ने पुरस्कार की धनराशि और सम्मान पत्र भी संस्थान को वापस लौटा दिए हैं।

साहित्यकारों ने उठाई पिछले सालों में दिए पुरस्कारों की जांच की मांग

पूरे घटनाक्रम के बाद उत्तराखंड के साहित्यिक जगत में हलचल तेज हो गई है। कई साहित्यकारों ने पिछले सालों में दिए गए अन्य साहित्यिक पुरस्कारों की भी जांच कराने की मांग उठाई है। साथ ही पुरस्कार प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने, पात्रता की सख्त जांच करने और योग्य रचनाकारों को सम्मान दिलाने की मांग भी जोर पकड़ने लगी है। साहित्यकारों का कहना है कि इस तरह की घटनाएं साहित्यिक पुरस्कारों की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाती हैं। साथ ही उन लेखकों और रचनाकारों के साथ भी अन्याय करती हैं, जो ईमानदारी और मौलिकता के साथ भाषा और साहित्य के क्षेत्र में काम कर रहे हैं।