
लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासत में जब भी ‘सैफई कुनबे’ का जिक्र होता है, तो जेहन में सत्ता संघर्ष, शक्ति प्रदर्शन और पारिवारिक कलह की तस्वीरें उभरने लगती हैं। समाजवादी पार्टी के भीतर हमने चाचा-भतीजे की रार देखी और पिता-पुत्र के बीच के वैचारिक मतभेद भी। लेकिन इसी हाई-प्रोफाइल राजनीतिक परिवार के भीतर एक ऐसा रिश्ता भी था, जिसने कभी सुर्खियां बटोरने की कोशिश नहीं की। यह रिश्ता था सपा प्रमुख अखिलेश यादव और उनके दिवंगत सौतेले भाई प्रतिक यादव का।
प्रतीक यादव के असामयिक निधन ने आज उस शख्सियत को दोबारा चर्चा में ला दिया है, जिसने मुलायम सिंह यादव का बेटा होने के बावजूद कभी खुद को सत्ता की रेस में शामिल नहीं किया।
दो आंगन, एक विरासत: कैसे शुरू हुई यह अनकही केमिस्ट्री?
अखिलेश और प्रतीक के रिश्तों की बुनियाद को समझने के लिए मुलायम सिंह यादव के पारिवारिक ढांचे को देखना होगा। अखिलेश, मुलायम सिंह की पहली पत्नी मालती देवी के पुत्र हैं, जबकि प्रतीक दूसरी पत्नी साधना गुप्ता के बेटे थे। 2003 में मालती देवी के निधन के बाद साधना गुप्ता और प्रतीक को परिवार में आधिकारिक दर्जा मिला।
अक्सर ऐसे पेचीदा पारिवारिक समीकरणों में ‘उत्तराधिकार’ की जंग छिड़ जाती है, लेकिन अखिलेश और प्रतीक ने इस गरिमा को बनाए रखा। अखिलेश उम्र में प्रतीक से करीब 15 साल बड़े थे, और यही अंतर उनके रिश्ते की सबसे बड़ी मजबूती बना।
मर्यादा का पालन: ‘कद’ बड़ा था पर भाई का सम्मान सबसे ऊपर
राजनीति में अक्सर उम्र पर रसूख भारी पड़ जाता है, लेकिन प्रतीक यादव ने हमेशा पारिवारिक मर्यादाओं को सर्वोपरि रखा। यादव परिवार के करीबियों का कहना है कि प्रतीक जब भी अखिलेश से मिलते थे, तो हमेशा उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेते थे।
इसकी सबसे बड़ी मिसाल 25 नवंबर 2025 को सैफई में देखने को मिली, जब चचेरे भाई आर्यन यादव की शादी में पूरा कुनबा जुटा था। उस वक्त प्रतीक यादव और उनकी पत्नी अपर्णा यादव (जो भाजपा में जा चुकी थीं) ने सार्वजनिक रूप से अखिलेश के पैर छुए थे। यह वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ, जिसने यह संदेश दिया कि राजनीतिक विचारधाराएं अलग हो सकती हैं, पर संस्कार नहीं।
सियासत से दूरी: क्यों कभी नहीं टकराए दोनों भाइयों के हित?
अखिलेश और प्रतीक के बीच कभी मनमुटाव न होने की एक बड़ी वजह उनकी अलग-अलग राहें रहीं।
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अखिलेश यादव: उन्होंने पिता की राजनीतिक विरासत संभाली और 2012 में सूबे के मुख्यमंत्री बने।
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प्रतीक यादव: उन्होंने कभी सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मांगी। उन्हें महंगी कारों, फिटनेस, जिम और रियल एस्टेट बिजनेस में दिलचस्पी थी।
प्रतीक का सत्ता के गलियारों से दूर रहना ही अखिलेश के साथ उनके रिश्तों के लिए ‘सुरक्षा कवच’ बना रहा। उन्होंने कभी भी अपने बड़े भाई के लिए कोई राजनीतिक चुनौती पेश नहीं की।
पारिवारिक कलह और ‘मौन’ का संकल्प
साल 2016-17 में जब समाजवादी पार्टी के भीतर शिवपाल यादव और अखिलेश के बीच ऐतिहासिक जंग छिड़ी, तब पूरा परिवार दो धड़ों में बंट गया था। वह ऐसा दौर था जब प्रतीक चाहते तो अपनी मां साधना गुप्ता के पक्ष में खड़े होकर अखिलेश के खिलाफ मोर्चा खोल सकते थे। लेकिन प्रतीक ने ‘मौन व्रत’ धारण कर लिया। उन्होंने मीडिया से दूरी बनाई और अपने बड़े भाई के खिलाफ एक शब्द भी नहीं कहा।
अंतिम दिनों का दर्द: जब अपर्णा पर लगाया ‘परिवार तोड़ने’ का आरोप
रिश्तों की सबसे कठिन परीक्षा तब हुई जब प्रतीक की पत्नी अपर्णा यादव भाजपा में शामिल हो गईं। हालांकि प्रतीक ने तब भी चुप्पी साधे रखी, लेकिन जनवरी 2026 में उनकी एक इंस्टाग्राम पोस्ट ने सबको चौंका दिया। अपने निधन से कुछ समय पहले प्रतीक ने अपर्णा को ‘फैमिली डिस्ट्रॉयर’ बताते हुए उन पर परिवार तोड़ने के गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने लिखा था कि अपर्णा ने उनके हंसते-खेलते परिवार को तबाह कर दिया है। हालांकि, बाद में उन्होंने पोस्ट डिलीट कर ‘सब ठीक है’ का संदेश दिया, लेकिन इससे यह साफ हो गया कि प्रतीक अपने बड़े भाई और मूल परिवार से जुड़ाव को कितनी अहमियत देते थे।
एक अध्याय का अंत
अखिलेश और प्रतीक यादव का रिश्ता इस बात की मिसाल है कि अगर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को दूर रखा जाए, तो सौतेले रिश्तों में भी सगे भाइयों जैसा स्नेह बना रह सकता है। प्रतीक का जाना उत्तर प्रदेश की राजनीति के उस अध्याय का अंत है, जहां एक भाई ने सत्ता की चकाचौंध के बजाय ‘सम्मान’ को चुना।
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