देहरादून: स्मार्ट वेंडिंग जोन में बड़ा ‘खेल’, मृतकों के नाम पर दुकानें और एक ही परिवार का कब्जा

देहरादून: राजधानी के छह नंबर पुलिया स्थित शहर के पहले ‘स्मार्ट वेंडिंग जोन’ में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं का एक बड़ा मामला सामने आया है। नगर निगम की टीम द्वारा किए गए सत्यापन में खुलासा हुआ है कि जिस वेंडिंग जोन को रेहड़ी-ठेली संचालकों को व्यवस्थित करने के लिए बनाया गया था, वहां नियमों की धज्जियां उड़ाकर दुकानों का बंदरबांट किया गया है।

सत्यापन में हुए चौंकाने वाले खुलासे

स्थानीय पार्षद मेहरबान सिंह भंडारी की शिकायत पर जब नगर निगम की टीम ने जांच की, तो वहां की स्थिति देखकर अधिकारी भी दंग रह गए। जांच में मुख्य रूप से ये गड़बड़ियां पाई गईं:

  • मृतकों के नाम पर आवंटन: वेंडिंग जोन में 5 दुकानें ऐसे लोगों के नाम पर दर्ज हैं, जिनकी मृत्यु हो चुकी है, लेकिन मौके पर उनका संचालन धड़ल्ले से जारी है।

  • पारिवारिक एकाधिकार: नियमों को ताक पर रखकर एक ही परिवार के 5-5 सदस्यों को दुकानें आवंटित की गई हैं।

  • किराए का काला खेल: 20 से ज्यादा दुकानदारों ने निगम से मिली दुकानों को अवैध रूप से दूसरों को किराए पर दे रखा है। कुछ दुकानें तो 200 रुपये प्रतिदिन की दिहाड़ी पर चलवाई जा रही हैं।

  • अवैध विस्तार और जाम: 4 फीट की चौड़ाई वाली दुकानों को दुकानदारों ने लोहे और लकड़ी के ढांचे लगाकर दोगुना बड़ा कर लिया है, जिससे सड़क पर जाम लग रहा है।

6 साल की चुप्पी और तकनीकी बदहाली

हैरानी की बात यह है कि 6 साल पहले बने इस जोन का आज तक कभी सत्यापन (Verification) नहीं हुआ।

  • सोलर सिस्टम फेल: दुकानों पर लगी सोलर प्लेटें खराब हो चुकी हैं और दुकानदारों ने उन्हें ढककर अवैध रूप से बिजली के कनेक्शन ले लिए हैं।

  • अवैध ठेलियां: आवंटित 95 ठेलियों के अलावा आसपास लगभग 40 अवैध ठेलियां भी संचालित होती पाई गईं।

मेयर की चेतावनी: होगी सख्त कार्रवाई

नगर निगम के मेयर सौरभ थपलियाल ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच के आदेश दिए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि:

  1. यदि आवंटन में किसी कर्मचारी की संलिप्तता पाई गई, तो उस पर सख्त कार्रवाई होगी।

  2. गलत तरीके से संचालित दुकानों का आवंटन रद्द कर उन्हें पात्र लोगों को दिया जा सकता है।

  3. अतिक्रमण और अवैध निर्माण को जल्द हटाया जाएगा।

उठते सवाल: किसकी शह पर चला घपला?

यह मामला सामने आने के बाद नगर निगम और पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। इतने सालों तक बिना किसी डर के चल रहे इस घोटाले ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या इसमें विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत थी? स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर पार्षद सक्रियता न दिखाते, तो शायद यह ‘स्मार्ट लूट’ आगे भी जारी रहती।