म्यूचुअल फंड में निवेश से पहले जान लें ‘Direct’ और ‘Regular’ का असली खेल, एक छोटी सी चूक और डूब सकते हैं लाखों का मुनाफा

म्यूचुअल फंड में निवेश करना आज के समय में अपनी वेल्थ बढ़ाने का सबसे पॉपुलर तरीका बन गया है। लेकिन जैसे ही आप निवेश के लिए कोई फंड चुनते हैं, आपके सामने एक जैसी दिखने वाली दो स्कीम्स आ जाती हैं। एक के आगे ‘Direct’ लिखा होता है और दूसरे के आगे ‘Regular’। पहली नजर में तो ये दोनों जुड़वां भाई जैसे लगते हैं—इनका पोर्टफोलियो एक है, इन्हें चलाने वाला फंड मैनेजर एक है और निवेश की स्ट्रैटेजी भी बिल्कुल समान है। लेकिन रुकिए, इन दोनों के बीच एक ऐसा बारीक अंतर छिपा है, जो लंबे समय में आपके मुनाफे को लाखों रुपये कम या ज्यादा कर सकता है। अगर आप भी इस उलझन में हैं कि पैसा कहाँ लगाएं, तो यह खबर आपके लिए ही है।

निवेश का तरीका तय करता है आपकी जेब का बोझ

इन दोनों विकल्पों के बीच सबसे बड़ा अंतर इस बात का है कि आप किसके जरिए निवेश कर रहे हैं। ‘डायरेक्ट फंड’ का सीधा सा मतलब है कि आप सीधे एसेट मैनेजमेंट कंपनी (AMC) यानी म्यूचुअल फंड हाउस से हाथ मिला रहे हैं। इसमें आपके और कंपनी के बीच कोई तीसरा व्यक्ति या बिचौलिया नहीं होता। वहीं, ‘रेगुलर फंड’ में आप किसी एजेंट, डिस्ट्रीब्यूटर या फाइनेंशियल एडवाइजर के माध्यम से निवेश करते हैं। अब जाहिर सी बात है कि अगर कोई आपकी मदद कर रहा है, तो वह अपनी फीस भी लेगा, और यही फीस आपके निवेश के गणित को बदल देती है।

डायरेक्ट फंड में क्यों मिलता है ज्यादा रिटर्न?

अगर आप डायरेक्ट और रेगुलर फंड के पुराने आंकड़ों पर गौर करेंगे, तो पाएंगे कि डायरेक्ट फंड का रिटर्न हमेशा थोड़ा ज्यादा रहता है। इसके पीछे की मुख्य वजह है ‘एक्सपेंस रेशियो’ यानी फंड को मैनेज करने का खर्च। चूंकि डायरेक्ट प्लान में कंपनी को किसी एजेंट को कमीशन नहीं देना पड़ता, इसलिए इसकी लागत कम आती है। शुरू में यह अंतर शायद आपको 0.5% या 1% जैसा मामूली लगे, लेकिन जब बात 15-20 साल के निवेश की आती है, तो यही ‘कंपाउंडिंग’ का जादू आपकी बचत को लाखों के एक्स्ट्रा प्रॉफिट में बदल देता है।

आखिर लोग रेगुलर फंड क्यों चुनते हैं?

अब सवाल यह आता है कि अगर डायरेक्ट में ज्यादा फायदा है, तो लोग रेगुलर फंड के चक्कर में क्यों पड़ते हैं? दरअसल, रेगुलर फंड के साथ आपको एक ‘सपोर्ट सिस्टम’ मिलता है। शेयर बाजार कभी भी सीधी लकीर में नहीं चलता, यहाँ उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। जब मार्केट बुरी तरह गिरता है, तो आम निवेशक घबराकर अपना पैसा निकालने की सोचने लगता है। ऐसे समय में एक अनुभवी सलाहकार आपको गलत फैसले लेने से रोकता है और आपके गोल के हिसाब से सही सलाह देता है। जिन लोगों को मार्केट की गहरी समझ नहीं है, उनके लिए रेगुलर फंड की फीस असल में उनके निवेश की ‘सुरक्षा फीस’ की तरह काम करती है।

अपनी जरूरत के हिसाब से करें सही चुनाव

फैसला इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस कैटेगरी के निवेशक हैं। अगर आप खुद मार्केट रिसर्च कर सकते हैं, आपके पास समय है और आप उतार-चढ़ाव देखकर विचलित नहीं होते, तो डायरेक्ट फंड आपके लिए बेस्ट है। इससे आपकी कॉस्ट कम होगी और मुनाफा सीधा आपकी जेब में जाएगा। लेकिन अगर आप चाहते हैं कि कोई प्रोफेशनल आपके निवेश की कमान संभाले और सही दिशा दिखाए, तो रेगुलर फंड का रास्ता बेहतर है। याद रखें, फंड बार-बार बदलना या डरकर पैसा निकाल लेना सबसे बड़ी गलती है, जो आपको किसी भी फीस से ज्यादा भारी पड़ सकती है। अपनी समझ और रिस्क लेने की क्षमता के आधार पर ही सही विकल्प का चुनाव करें।