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टूटे चावल के निर्यात पर मंडराया पाबंदी का खतरा, कीमतों में तेजी से बढ़ी चिंता

अंतरराष्ट्रीय बाजार से लेकर घरेलू स्तर तक कृषि जिंसों के बाजार में इन दिनों एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। देश में जहां एक तरफ मुख्य अनाज की उपलब्धता संतोषजनक बनी हुई है, वहीं दूसरी तरफ खाने की थाली से जुड़ा चावल का एक ऐसा हिस्सा चर्चा के केंद्र में आ गया है जिसे कभी बहुत कम कीमत पर आंका जाता था। बात हो रही है टूटे चावल (ब्रोकन राइस) की, जिसके दाम अब केवल भारत में ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी लगातार छलांग लगा रहे हैं। इस तेजी के बाद अब यह सवाल जोर पकड़ने लगा है कि क्या सरकार एक बार फिर इसके निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का कड़ा कदम उठा सकती है?

भारतीय चावल निर्यातक महासंघ (IREF) की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक बाजार में 100 प्रतिशत टूटे चावल की कीमतें 360 अमेरिकी डॉलर प्रति मीट्रिक टन के महत्वपूर्ण आंकड़े को पार कर चुकी हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में आई इस मजबूती का सीधा असर घरेलू अर्थव्यवस्था और स्थानीय कारोबार पर पड़ रहा है। जानकारों का मानना है कि वैश्विक मांग में अचानक आया उछाल और घरेलू मोर्चे पर बढ़ रही खपत ने इस कम मूल्य वाले उप-उत्पाद (बाइ-प्रोडक्ट) को नीति निर्माताओं के लिए एक बार फिर चिंता का विषय बना दिया है।

वैश्विक हलचलों के बीच देश के भीतर भी टूटे चावल के दाम तेजी से ऊपर चढ़ रहे हैं। उपभोक्ता मामलों के विभाग से मिले आंकड़ों के अनुसार टूटे चावल का अखिल भारतीय औसत थोक मूल्य बढ़कर 3,036 रुपये प्रति क्विंटल के स्तर पर पहुंच गया है, जबकि कुछ हफ्ते पहले यह 2,883 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास था। महज तीन हफ्ते के भीतर कीमतों में करीब 5.3 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई है। इसके अलावा थोक मूल्य सूचकांक (WPI) पर आधारित सालाना महंगाई दर भी बढ़कर 5.38 प्रतिशत पर पहुंच गई है, जिससे साफ जाहिर होता है कि घरेलू उपभोक्ताओं और संबंधित उद्योगों पर महंगाई का दबाव बढ़ रहा है।

टूटे चावल की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी और निर्यात प्रतिबंध की चर्चा के पीछे सबसे बड़ा कारण देश में एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम का तेजी से होता विस्तार है। सरकार के पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य के चलते अनाज आधारित कच्चे माल की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। इसमें मक्का और एफसीआई के अतिरिक्त चावल के साथ-साथ खुला टूटे चावल भी शामिल है। निजी डिस्टिलरीज कंपनियां खुले बाजार से बड़े पैमाने पर इसकी खरीद कर रही हैं। इसके परिणामस्वरूप पोल्ट्री फीड (मुर्गी दाना) निर्माताओं और चावल निर्यातकों के बीच कच्चे माल की उपलब्धता को लेकर कड़ी प्रतिस्पर्धा छिड़ गई है।

भारत ने साल 2025 की शुरुआत में ही टूटे चावल के निर्यात पर लगी पुरानी पाबंदियों को हटाकर इसे ‘मुक्त’ श्रेणी में डाला था, ताकि वैश्विक व्यापार को बढ़ावा मिल सके। हालांकि, मौजूदा हालात जिस तरह से करवट ले रहे हैं और थोक कीमतों में लगातार तेजी आ रही है, उसे देखते हुए कृषि व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि घरेलू बाजार में सप्लाई चेन पर और अधिक दबाव बढ़ा, तो सरकार खाद्य सुरक्षा और महंगाई को नियंत्रित करने के लिए निर्यात पर फिर से पाबंदी या नीतिगत अंकुश लगाने पर विचार कर सकती है।