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Air Pollution Stroke Risk: जहरीली हवा से बढ़ रहा है जानलेवा ब्रेन स्ट्रोक का खतरा, डॉक्टर ने बताए शुरुआती लक्षण और बचाव के जरूरी उपाय मेटा विवरण (Meta Description): Air Pollution and Brain Stroke Risk: वायु प्रदूषण केवल फेफड़ों को ही नहीं बल्कि दिमाग को

Air Pollution Stroke Risk : सर्दियों की शुरुआत के साथ ही उत्तर भारत सहित देश के कई प्रमुख शहरों में वायु प्रदूषण (Air Pollution) का स्तर बेहद खतरनाक श्रेणी में पहुंच जाता है। हवा में घुला यह धीमा जहर केवल सांस की नली, अस्थमा और फेफड़ों के संक्रमण तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि यह इंसानी शरीर के सबसे संवेदनशील अंग यानी मस्तिष्क पर भी सीधा और जानलेवा हमला बोल रहा है। हालिया मेडिकल रिसर्च और न्यूरोलॉजिस्ट्स (मस्तिष्क रोग विशेषज्ञों) के अनुसार, हवा में मौजूद सूक्ष्म प्रदूषक तत्व सीधे रक्तप्रवाह में घुलकर नसों को ब्लॉक कर रहे हैं, जिससे ब्रेन स्ट्रोक (मस्तिष्क का दौरा) का खतरा 20% से 30% तक बढ़ जाता है। हवा की गुणवत्ता का गिरता स्तर (AQI) बुजुर्गों, उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन) और हृदय रोगियों के लिए किसी गंभीर आपातकाल से कम नहीं है। ऐसे में प्रदूषण से दिमाग पर पड़ने वाले घातक असर, स्ट्रोक के शुरुआती संकेतों और बचाव के उपायों को समझना हर नागरिक के लिए बेहद जरूरी है।

प्रदूषित हवा में मुख्य रूप से पार्टिकुलेट मैटर (PM 2.5 और PM 0.1), कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसे जहरीले तत्व घुले होते हैं। इनमें PM 2.5 कण इतने बारीक होते हैं कि वे सांस के जरिए फेफड़ों की गहराई को पार करते हुए सीधे रक्त वाहिकाओं (Blood Vessels) में प्रवेश कर जाते हैं।

जब ये विषैले कण रक्तप्रवाह में पहुंचते हैं, तो वे रक्त धमनियों की आंतरिक परत (Endothelium) में गंभीर सूजन (Inflammation) और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस पैदा करते हैं। इसके चलते रक्त गाढ़ा होने लगता है और नसों में थक्के (Blood Clots) बनने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। यदि यह रक्त का थक्का दिमाग तक जाने वाली किसी धमनी को ब्लॉक कर देता है, तो मस्तिष्क की कोशिकाओं तक ऑक्सीजन और जरूरी पोषक तत्वों की आपूर्ति तत्काल रुक जाती है। ऑक्सीजन के अभाव में कुछ ही मिनटों के भीतर लाखों ब्रेन सेल्स मरने लगते हैं, जिसे चिकित्सीय भाषा में ‘इस्केमिक स्ट्रोक’ (Ischemic Stroke) कहा जाता है। इसके अलावा, प्रदूषित हवा रक्तचाप (Blood Pressure) को अचानक बढ़ा देती है, जिससे दिमाग की कमजोर नस फटने का खतरा यानी ‘हेमरेजिक स्ट्रोक’ (Hemorrhagic Stroke) भी हो सकता है।

ब्रेन स्ट्रोक के मामले में समय ही जीवन है। डॉक्टर बताते हैं कि यदि लक्षण दिखने के 3 से 4.5 घंटे के भीतर मरीज को अस्पताल पहुंचा दिया जाए (गोल्डन ऑवर), तो क्लॉट-बस्टिंग इंजेक्शन या थ्रोम्बेक्टोमी के जरिए मरीज की जान बचाई जा सकती है और स्थायी लकवे से बचाया जा सकता है। स्ट्रोक के लक्षणों को पहचानने का सबसे आसान तरीका ‘FAST’ फॉर्मूला है:

  • F (Face Drooping – चेहरे का टेढ़ापन): मरीज को मुस्कुराने के लिए कहें। क्या उसका चेहरा या मुंह एक तरफ से लटक रहा है या टेढ़ा हो रहा है?

  • A (Arm Weakness – बांह में कमजोरी): दोनों हाथ ऊपर उठाने को कहें। क्या एक हाथ कमजोर होकर नीचे गिर रहा है या उसमें सुन्नपन महसूस हो रहा है?

  • S (Speech Difficulty – बोलने में लड़खड़ाहट): मरीज को एक सरल वाक्य बोलने को कहें। क्या उसकी आवाज अस्पष्ट, भारी या लड़खड़ा रही है?

  • T (Time to Call – तुरंत अस्पताल भागें): यदि इनमें से कोई भी एक लक्षण दिखे, तो बिना समय गंवाए तुरंत नजदीकी ऐसे अस्पताल जाएं जहां 24 घंटे सीटी स्कैन (CT Scan) और न्यूरोलॉजी आईसीयू की सुविधा उपलब्ध हो।

इसके अलावा अचानक सिर में असहनीय तेज दर्द होना, चक्कर आना, आंखों के आगे अचानक अंधेरा छा जाना या संतुलन खो बैठना भी स्ट्रोक के गंभीर चेतावनी संकेत हो सकते हैं।

डॉक्टरों के मुताबिक, खराब वायु गुणवत्ता के दिनों में निम्नलिखित वर्गों को अत्यधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता है:

  • बुजुर्ग नागरिक: 55 से 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की रक्त नलिकाएं प्राकृतिक रूप से सख्त और संकीर्ण होती हैं, जिन पर प्रदूषण का असर सबसे तेजी से पड़ता है।

  • हाई बीपी और डायबिटीज के मरीज: अनियंत्रित शुगर और उच्च रक्तचाप पहले से ही धमनियों को कमजोर बना देते हैं, ऐसे में प्रदूषण स्ट्रोक के खतरे को दोगुना कर देता है।

  • हृदय रोगी और कोलेस्ट्रॉल पीड़ित: जिन लोगों के दिल की धड़कन अनियमित (Arrhythmia/Atrial Fibrillation) रहती है या जिनका बैड कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ है।

  • धूम्रपान करने वाले: सिगरेट या बीड़ी पीने वाले लोगों में वायु प्रदूषण मिलकर रक्त के थक्के जमने की प्रक्रिया को अत्यधिक तेज कर देता है।

ब्रेन स्ट्रोक और प्रदूषण के घातक असर से बचने के लिए न्यूरोलॉजिस्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञ निम्नलिखित व्यावहारिक सावधानियों पर अमल करने की सलाह देते हैं:

  1. सुबह की सैर का समय बदलें: जब एक्यूआई (AQI) 300 के पार हो, तो भोर या देर शाम को खुले में तेज टहलने या भारी कसरत करने से बचें। सुबह के समय जमीन के करीब ठंड और स्मॉग की घनी चादर होती है, जिससे भारी सांस लेने पर जहरीले कण सीधे फेफड़ों और रक्त में पहुंचते हैं। धूप निकलने के बाद ही घर से बाहर निकलें।

  2. N-95 मास्क का इस्तेमाल करें: सामान्य कपड़े या सर्जिकल मास्क PM 2.5 के सूक्ष्म कणों को नहीं रोक पाते। जब भी बाहर निकलना जरूरी हो, अच्छी गुणवत्ता का N-95 या N-99 रेस्पिरेटर मास्क सही फिटिंग के साथ पहनें।

  3. घर के भीतर हवा शुद्ध रखें: खिड़कियां और दरवाजे उस समय बंद रखें जब बाहर प्रदूषण चरम पर हो। यदि संभव हो तो कमरे में HEPA फिल्टर युक्त एयर प्यूरीफायर का उपयोग करें। घर के अंदर अगरबत्ती, धूपबत्ती या मच्छर मारने वाली कॉइल जलाने से बचें क्योंकि ये इनडोर प्रदूषण को कई गुना बढ़ा देते हैं।

  4. हाइड्रेटेड रहें और खूब पानी पिएं: दिनभर पर्याप्त मात्रा में गुनगुना पानी, सूप और हर्बल काढ़ा पिएं। भरपूर पानी पीने से रक्त का थक्का जमने की संभावना कम होती है और शरीर से टॉक्सिन्स बाहर निकलते हैं।

  5. एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर डाइट लें: अपने भोजन में विटामिन सी, विटामिन ई और ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर चीजें शामिल करें। आंवला, संतरा, हरी पत्तेदार सब्जियां, अखरोट और हल्दी वाला दूध शरीर में प्रदूषण से होने वाली आंतरिक सूजन (Inflammation) को कम करने में मदद करते हैं।

  6. नियमित बीपी और दवाइयों की निगरानी: यदि आप हाइपरटेंशन, कोलेस्ट्रॉल या डायबिटीज के मरीज हैं, तो अपनी निर्धारित दवाएं बिल्कुल न छोड़ें और रोजाना बीपी की जांच करते रहें। अचानक बीपी बढ़ना स्ट्रोक का बड़ा कारण बन सकता है।