
Shankar Math shivling shaped temple : भारतीय मंदिर वास्तुकला (Temple Architecture) अपनी भव्यता, नक्काशी और आध्यात्मिक रहस्यों के लिए दुनियाभर में जानी जाती है। उत्तर भारत के नागर शैली के ऊंचे शिखर हों या दक्षिण भारत के द्रविड़ शैली के विशाल गोपुरम, देश के कोने-कोने में स्थित देवालय अपनी विशिष्ट बनावट से हर किसी को विस्मृत कर देते हैं। लेकिन क्या आपने कभी ऐसे मंदिर की कल्पना की है, जिसके ऊपर कोई पारंपरिक गुंबद, मीनार या कलश न हो, बल्कि समूचा मंदिर भवन ही बाहर से देखने पर एक विशालकाय, सजीव शिवलिंग के स्वरूप में दिखाई देता हो? धार्मिक और स्थापत्य कला के इस विस्मयकारी संगम को ‘शंकर मठ’ के नाम से जाना जाता है। दूर से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है मानो धरती के सीने पर साक्षात देवाधिदेव महादेव का विशाल लिंग स्वरूप स्थापित हो। इस मंदिर की वास्तुकला, आंतरिक ऊर्जा और इससे जुड़े रहस्य श्रद्धालुओं व शोधकर्ताओं दोनों को समान रूप से आकर्षित करते हैं।
आमतौर पर हिंदू मंदिरों के शीर्ष पर अर्धगोलाकार गुंबद, छत्र या आकाश को छूते हुए त्रिकोणीय शिखर बनाए जाते हैं, जिन पर ध्वज और कलश स्थापित होता है। परंतु शंकर मठ की स्थापत्य योजना पारंपरिक नियमों से बिल्कुल परे एक अनूठे वैज्ञानिक व तांत्रिक दर्शन पर आधारित है। मंदिर की बाहरी दीवारों को इस तरह घुमावदार और सुडौल रूप दिया गया है कि वे जमीन से उठकर ठीक उसी अनुपात में ऊपर जाती हैं जैसा किसी प्राकृतिक शिवलिंग का आकार होता है। इसके ऊपरी हिस्से को ठीक उसी गोलाई और ढलान के साथ ढाला गया है, जो जलहरी और पिंडी के संतुलन को दर्शाता है। मंदिर का प्रवेश द्वार इस तरह नियोजित है कि श्रद्धालु जब बाहर खड़े होते हैं, तो वे एक भव्य मंदिर देखने के साथ-साथ एक विशालकाय शिवलिंग का साक्षात दर्शन करते हैं, जो अपने आप में दुनिया की विरल स्थापत्य कलाओं में गिना जाता है।
शंकर मठ के भीतर कदम रखते ही श्रद्धालुओं को एक अलग ही प्रकार के स्पंदन और असीम शांति का अहसास होता है। विशेषज्ञों और वास्तुकारों के अनुसार, इसका कारण मंदिर की अंडाकार (Elliptical) और शिवलिंगनुमा आंतरिक छत है। आधुनिक ध्वनिकी (Acoustics) के नियमों के अनुसार, जब मंदिर के गर्भगृह में ‘ॐ नमः शिवाय’ या ‘महामृत्युंजय मंत्र’ का उच्चारण किया जाता है, तो आवाज की तरंगें किसी सपाट दीवार से टकराने के बजाय शिवलिंग की घुमावदार दीवारों पर लगातार घूमती हैं। यह परावर्तन एक सूक्ष्म और निरंतर गूंज (Resonance) पैदा करता है, जो वहां ध्यान लगाने वाले साधकों के मन को तत्काल शांत कर देता है। ध्यान और योग की दृष्टि से इस संरचना को ब्रह्मांडीय ऊर्जा (Cosmic Energy) को अवशोषित करने वाले केंद्र के रूप में देखा जाता है।
इस अनूठे मंदिर के निर्माण में न केवल ज्यामितीय सटीकता बरती गई है, बल्कि इस्तेमाल की गई निर्माण सामग्री भी बेहद खास है। इसे विशेष प्राकृतिक पत्थरों और पारंपरिक चूने-गारे के मिश्रण से इस प्रकार गढ़ा गया है कि भीषण गर्मी के दिनों में भी मंदिर के भीतर का तापमान बाहर की तुलना में काफी ठंडा और सुखद रहता है। दिनभर सूर्य की गति बदलने के साथ-साथ शिवलिंग के आकार वाले इस मंदिर की बाहरी सतह पर धूप और छांव का जो दृश्य बनता है, वह देखने वालों को मंत्रमुग्ध कर देता है। सुबह के समय जब सूर्य की पहली किरणें इस मंदिर के शीर्ष भाग को स्पर्श करती हैं, तो ऐसा आभास होता है मानो शिवलिंग का स्वर्ण-अभिषेक हो रहा हो।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग केवल एक प्रतीक नहीं बल्कि निराकार और साकार ब्रह्म का एकीकृत स्वरूप है। शंकर मठ की परिकल्पना इसी विचार को साकार करने के लिए की गई थी कि भक्त मंदिर की चारदीवारी में प्रवेश करने से पहले ही शिवत्व का साक्षात्कार कर सकें। स्थानीय श्रद्धालुओं का मानना है कि इस मंदिर की परिक्रमा करने मात्र से सामान्य शिवलिंग की पूजा और परिक्रमा से कई गुना अधिक पुण्य फल प्राप्त होता है, क्योंकि यहां श्रद्धालु किसी छोटी पिंडी की नहीं बल्कि संपूर्ण देवालय रूपी महा-शिवलिंग की प्रदक्षिणा करते हैं। महाशिवरात्रि, सावन के पवित्र सोमवार और प्रदोष व्रत के दौरान यहां दूर-दराज से आने वाले भक्तों का तांता लगा रहता है, जो इस अनूठी रचना के सम्मुख नतमस्तक होकर आत्मिक शांति की कामना करते हैं।
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