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करवाचौथ पर चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद कितनी बार करनी चाहिए परिक्रमा, चांद की परिक्रमा का सही नियम और इसका धार्मिक महत्व

सनातन संस्कृति और सुहागिन महिलाओं के सबसे बड़े पावन पर्व करवा चौथ (Karwa Chauth) का उत्साह हर साल देश के कोने-कोने में देखने को मिलता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर रखा जाने वाला यह निर्जला उपवास पति की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, अटूट प्रेम और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन महिलाएं पूरे दिन अन्न और जल का त्याग करके कठोर व्रत रखती हैं और शाम के समय माता करवा, भगवान गणेश तथा शिव-पार्वती की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करती हैं। इसके बाद रात के समय आसमान में चंद्रमा के दर्शन करने, उन्हें अर्घ्य देने और छलनी से पति का चेहरा देखने के बाद ही इस कठिन व्रत का पारण किया जाता है। हालांकि, करवाचौथ की पूजा के दौरान एक सवाल महिलाओं के मन में अक्सर आता है कि चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद चांद की परिक्रमा कितनी बार करनी चाहिए और इसका सही नियम क्या है? आइए उज्जैन के जाने-माने ज्योतिषाचार्य पंडित मनीष शर्मा जी के अनुसार जानते हैं चंद्रमा की परिक्रमा से जुड़े सभी जरूरी नियम और इसके आध्यात्मिक महत्व के बारे में।

सनातन धर्म में परिक्रमा का महत्व: क्यों जरूरी है भगवान और देवताओं की परिक्रमा करना

हिंदू धर्म और ज्योतिष शास्त्र में किसी भी देवी-देवता की पूजा-अर्चना बिना परिक्रमा के अधूरी मानी जाती है। सनातन परंपरा के अनुसार, जब हम किसी देवता या पूजनीय ग्रह की परिक्रमा करते हैं, तो इसका सीधा अर्थ यह होता है कि हम अपने अहंकार को पूरी तरह से त्यागकर पूरी श्रद्धा, विनम्रता और सम्मान के साथ भगवान की आराधना कर रहे हैं।

ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, परिक्रमा करने से उस दैवीय शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार हमारे शरीर में होता है, जिससे हमारा मन शांत और ऊर्जावान बनता है। करवाचौथ के पावन अवसर पर चंद्र देव (जो मन, शीतलता और प्रेम के कारक माने जाते हैं) की पूजा के बाद उनकी परिक्रमा करने का विशेष विधान बताया गया है।

करवाचौथ पर चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद कितनी बार करें परिक्रमा

धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं के अनुसार, करवाचौथ की रात जब चंद्रमा का उदय होता है, तो सुहागिन महिलाएं सबसे पहले चंद्र देव के दर्शन करती हैं। इसके बाद उन्हें जल, अक्षत, रोली और पुष्प अर्पित करके अपने सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं। अर्घ्य देने की इस प्रक्रिया के तुरंत बाद चंद्रमा की परिक्रमा करने की परंपरा है।

आम तौर पर दैनिक जीवन में किसी देवता की 3 बार परिक्रमा करने का नियम होता है, लेकिन करवाचौथ के व्रत के दिन चंद्रमा की 4 बार परिक्रमा करने को सबसे ज्यादा शुभ और फलदायी माना गया है। कई जगहों पर महिलाएं अपनी सुविधानुसार 3 या 4 बार परिक्रमा करती हैं, लेकिन ज्योतिषीय और पारंपरिक दृष्टिकोण से चार परिक्रमा का विधान सबसे उत्तम माना गया है। चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद महिलाएं छलनी से पहले चांद का दीदार करती हैं और फिर उसी छलनी से अपने पति का चेहरा देखकर उनके हाथों से जल ग्रहण करके अपना व्रत खोलती हैं।

चंद्रमा की परिक्रमा करने से मिलता है अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद

करवाचौथ के दिन विधि-विधान से पूजा करने और चंद्र देव की परिक्रमा करने का सबसे बड़ा फल सुहागिन महिलाओं को ‘अखंड सौभाग्य’ के रूप में प्राप्त होता है। हिंदू धर्म में अखंड सौभाग्य का अर्थ पति की लंबी उम्र, उनके अच्छे स्वास्थ्य और एक खुशहाल व समृद्ध वैवाहिक जीवन से है।

जब महिलाएं चंद्रमा की परिक्रमा करती हैं, तो वे चंद्र देव से अपने पति के यशस्वी और दीर्घायु जीवन की प्रार्थना करती हैं। ऐसी मान्यता है कि चंद्रमा की शीतलता और उसकी सकारात्मक किरणें सुहागिनों के जीवन में आने वाले सभी संकटों को दूर करती हैं और उनके रिश्ते को उम्रभर के लिए मजबूत बनाती हैं।

घर में सुख-शांति, समृद्धि और सकारात्मकता की प्राप्ति

करवाचौथ का यह महापर्व केवल पति की लंबी उम्र के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार की सुख-समृद्धि और उन्नति के लिए भी बेहद खास माना जाता है। मान्यता है कि चंद्र देव की विधिवत पूजा और उनकी परिक्रमा करने से घर-परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है, जिससे आपसी क्लेश समाप्त होते हैं और शांति का माहौल बना रहता है।

इस विशेष अवसर पर महिलाएं अपने सुखी परिवार, बच्चों की तरक्की और घर में हमेशा प्रेमपूर्ण वातावरण बनाए रखने की कामना करती हैं। पूजा-अर्चना और परिक्रमा के दौरान मन में श्रद्धा, पवित्र विचार और सकारात्मक भावनाएं रखना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि मन की सच्ची लगन से ही व्रत का पूरा फल प्राप्त होता है।

दांपत्य जीवन के सभी कष्ट और दूरियां होती हैं समाप्त

करवाचौथ का यह व्रत पति और पत्नी के बीच के रिश्ते में विश्वास, समर्पण और प्रेम को और अधिक प्रगाढ़ बनाने का प्रतीक है। चंद्रमा को अर्घ्य देने और उसकी परिक्रमा करने के पीछे यह वैज्ञानिक और आध्यात्मिक भाव भी छिपा है कि जिस प्रकार चंद्रमा अपनी शीतलता से पूरी पृथ्वी को रोशन करता है, उसी प्रकार पति-पत्नी का जीवन भी प्रेम के प्रकाश से जगमगाता रहे।

यदि दांपत्य जीवन में किसी प्रकार की अनबन या परेशानियां चल रही हों, तो इस दिन सच्चे मन से चंद्रमा की आराधना और परिक्रमा करने से आपसी संबंधों में मधुरता लौटती है। कुल मिलाकर, करवाचौथ के दिन चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद चार बार परिक्रमा करना आपके वैवाहिक जीवन को सदाबहार और खुशहाल बना सकता है।