
बदलते मौसम, स्मॉग या वायरल संक्रमण की चपेट में आने के बाद अक्सर यह देखा जाता है कि बुखार, सिरदर्द और बदन दर्द तो 3 से 5 दिनों में ठीक हो जाते हैं, लेकिन गले की खराश और लगातार उठने वाला खांसी का दौरा हफ्तों तक पीछा नहीं छोड़ता। कई बार लोग सोचते हैं कि उनकी दवाएं बेअसर साबित हो रही हैं या बीमारी दोबारा लौट आई है, जिसके चलते वे बार-बार भारी एंटीबायोटिक्स या कई तरह के कफ सिरप बदलने लगते हैं। पल्मोनोलॉजिस्ट्स और ईएनटी विशेषज्ञों के अनुसार, अधिकांश सामान्य सर्दी-जुकाम (Common Cold) वायरल संक्रमण के कारण होते हैं। शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) भले ही वायरस को कुछ दिनों में मार देती है, लेकिन वायरस द्वारा श्वसन तंत्र की अंदरूनी सतह को पहुंचाए गए नुकसान की मरम्मत होने में काफी वक्त लगता है। इसी प्रक्रिया को मेडिकल भाषा में ‘पोस्ट-इन्फेक्शियस’ या ‘पोस्ट-वायरल कफ’ (Post-Viral Cough) कहा जाता है।
हमारे गले और श्वास नली की भीतरी दीवार पर एक बेहद नाजुक सुरक्षात्मक परत होती है, जिसे ‘रेस्पिरेटरी एपिथीलियम’ (Ciliated Epithelium) कहा जाता है। इस परत पर मौजूद नन्हे-नन्हे बाल (Cilia) फेफड़ों में जाने वाले बलगम, धूल और कीटाणुओं को बाहर धकेलने का काम करते हैं। जब राइनोवायरस, इन्फ्लूएंजा या रेस्पिरेटरी सिंसिशियल वायरस (RSV) हमला करता है, तो यह इस सुरक्षात्मक परत को बुरी तरह क्षतिग्रस्त और छील देता है।
वायरस के खत्म होने के बाद भी श्वास नली की यह अंदरूनी त्वचा सूजी हुई और कच्ची रह जाती है। ठीक वैसे ही जैसे त्वचा पर लगी खरोंच को पूरी तरह भरने में 10 से 15 दिन लगते हैं, वैसे ही श्वास नली की अंदरूनी झिल्ली को दोबारा सामान्य होने में 2 से 4 हफ्ते का समय लगता है। इस दौरान जैसे ही ठंडी हवा, धूल, तीखी गंध या हल्का सा बलगम इस कच्ची सतह को छूता है, तंत्रिकाएं (Nerves) तुरंत उत्तेजित हो जाती हैं और मस्तिष्क को खांसी का सिग्नल भेज देती हैं।
खांसी के लंबे समय तक खिंचने का दूसरा सबसे प्रमुख कारण नाक और साइनस के भीतर होने वाला रिसाव है। जुकाम के बाद भी कई दिनों तक साइनस की अंदरूनी परत में सूजन बनी रहती है, जिससे गाढ़ा या पतला बलगम गले के पिछले हिस्से में धीरे-धीरे नीचे की ओर टपकता रहता है।
इसे मेडिकल शब्दावली में ‘पोस्ट-नेजल ड्रिप’ (PND) कहा जाता है। जब कोई व्यक्ति रात में लेटता है, तो यह रिसाव सीधे वोकल कॉर्ड और विंडपाइप के रिसेप्टर्स पर गिरता है। इसी वजह से ज्यादातर लोगों को दिन के मुकाबले रात में सोने के समय या सुबह सोकर उठते ही तेज और अनियंत्रित खांसी के दौरे आते हैं। जब तक साइनस की सूजन पूरी तरह शांत नहीं होती, तब तक यह खांसी बनी रहती है।
कुछ लोगों में वायरल इन्फेक्शन के बाद श्वास नलियां अत्यधिक संवेदनशील यानी ‘हाइपर-रिएक्टिव’ हो जाती हैं। इसे ‘रिएक्टिव एयरवे डिजीज’ कहा जाता है। साधारण स्थिति में सामान्य सांस लेने पर फेफड़े कोई असामान्य प्रतिक्रिया नहीं देते, लेकिन इस स्थिति में श्वास नलियां तेजी से सिकुड़ने (ब्रोंकोस्पाज्म) लगती हैं।
हंसते समय, सीढ़ियां चढ़ते वक्त, ठंडे पानी का घूंट भरने पर या जोर से बात करते समय अचानक सांस खींचने से फेफड़ों में खिंचाव महसूस होता है और तेज सूखी खांसी शुरू हो जाती है। यह स्थिति उन लोगों में और ज्यादा लंबी खिंचती है जिन्हें पहले से कोई एलर्जी, साइनसाइटिस या माइल्ड ब्रोंकाइटिस की पारिवारिक हिस्ट्री होती है।
कई बार लोग अनजाने में ऐसे कदम उठा लेते हैं जिससे श्वास नली की प्राकृतिक हीलिंग प्रक्रिया में और अधिक रुकावट आ जाती है:
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अनावश्यक एंटीबायोटिक्स का अंधाधुंध सेवन: सामान्य सर्दी-जुकाम 99% मामलों में वायरस के कारण होता है। एंटीबायोटिक्स केवल बैक्टीरिया को मारते हैं, वायरस को नहीं। बिना डॉक्टर की सलाह के खुद से एंटीबायोटिक्स खाने से शरीर के गुड बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं, पेट बिगड़ता है और खांसी की रिकवरी पर कोई सकारात्मक असर नहीं पड़ता।
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पानी की कमी (डिहाइड्रेशन): जब शरीर में पर्याप्त पानी नहीं होता, तो श्वसन नली में जमा होने वाला बलगम सूखकर चिपक जाता है। सूखा कफ गले में लगातार खुजली पैदा करता है जिसे बाहर निकालने के लिए बार-बार जोर से खांसना पड़ता है।
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पर्याप्त आराम न लेना: सर्दी-जुकाम के दौरान शरीर का इम्यून सिस्टम पूरी ऊर्जा वायरस से लड़ने में लगाता है। ऑफिस के तनाव, भागदौड़ और नींद की कमी से इम्यून सेल्स सुस्त पड़ जाते हैं, जिससे टिशू रिपेयर की गति धीमी हो जाती है।
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धूल, धुएं और प्रदूषण के संपर्क में रहना: रिकवरी के दौर में जब एयरवेज पहले से ही संवेदनशील होते हैं, उस समय स्मोकिंग करना, अगरबत्ती का धुआं लेना या भारी ट्रैफिक व स्मॉग में बिना मास्क घूमना ठीक होती हुई श्वास नली को फिर से जख्मी कर देता है।
खांसी को जल्दी शांत करने के लिए श्वास नली को नमी और आराम देना सबसे जरूरी होता है:
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दिन में 2 से 3 बार गर्म पानी की भाप (Steam): भाप लेने से श्वास नली की परत में नमी बनी रहती है और सूखा बलगम ढीला होकर आसानी से बाहर निकल जाता है।
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गुनगुने पानी में नमक से गरारे: दिन में कम से कम दो बार हल्के गुनगुने पानी में सेंधा नमक डालकर गरारे करने से गले के पिछले हिस्से की सूजन और बैक्टीरियल लोड कम होता है।
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शहद और अदरक का प्राकृतिक लेप: एक चम्मच शुद्ध शहद में अदरक का ताजा रस मिलाकर दिन में दो बार धीरे-धीरे चाटें। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी शहद को गले के लिए सबसे प्रभावी और सुरक्षित प्राकृतिक डेमुलसेंट (सूजन कम करने वाला तत्व) मानता है।
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सिर को थोड़ा ऊंचा रखकर सोएं: रात में सोते समय एक अतिरिक्त तकिया लगाकर सिर को थोड़ा ऊंचा रखें ताकि पोस्ट-नेजल ड्रिप गले में सीधे न गिरे और रात की खांसी से राहत मिले।
सामान्यतः पोस्ट-वायरल कफ 3 से 4 हफ्तों में अपने आप पूरी तरह ठीक हो जाता है। लेकिन यदि खांसी 4 हफ्ते (एक महीने) से अधिक समय तक लगातार बनी रहे, बलगम में खून आने लगे, सीने में एक तरफ तेज चुभन जैसा दर्द हो, रात में पसीने के साथ दोबारा तेज बुखार आने लगे या सांस खींचने में गंभीर कठिनाई महसूस हो, तो इसे कतई नजरअंदाज न करें। यह निमोनिया, क्रोनिक ब्रोंकाइटिस, ट्यूबरकुलोसिस (टीबी) या गैस्ट्रोएसोफेगल रिफ्लक्स डिजीज (GERD/एसिड रिफ्लक्स) का संकेत हो सकता है, जिसके लिए चेस्ट फिजिशियन से तुरंत क्लिनिकल जांच और एक्स-रे कराना अनिवार्य है।
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