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8वें वेतन आयोग पर केंद्रीय कर्मचारियों की नजर: क्या 30 महीने का एरियर होगा पक्का? जानिए गठन में देरी के पीछे का असली वित्तीय गणित

देश के एक करोड़ से अधिक सेवारत केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के बीच इस समय 8वें केंद्रीय वेतन आयोग (8th Central Pay Commission) को लेकर चर्चाएं चरम पर हैं। 7वें वेतन आयोग की 10 साल की समयावधि तकनीकी रूप से 31 दिसंबर 2025 को समाप्त हो चुकी है और नियमों के अनुसार 8वें वेतन आयोग की सिफारिशें 1 जनवरी 2026 से प्रभावी मानी जानी हैं। हालांकि, केंद्र सरकार द्वारा अब तक आधिकारिक तौर पर आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों के नाम व टर्म्स ऑफ रेफरेंस (ToR) की औपचारिक घोषणा में हो रहे विलंब को लेकर कर्मचारी यूनियनों में चिंता जरूर थी, लेकिन वित्तीय विशेषज्ञों और ट्रेड यूनियनों का मानना है कि इस देरी में कर्मचारियों का नुकसान नहीं, बल्कि एकमुश्त एरियर (Arrears) का बड़ा वित्तीय फायदा छिपा हुआ है। यदि आयोग अपनी सिफारिशें सौंपने और उन्हें लागू करने में 2027 या 2028 तक का समय लेता है, तो कर्मचारियों की झोली में 18 से लेकर 30 महीने तक का मोटा बकाया आना तय माना जा रहा है।

केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन संशोधन के इतिहास पर नजर डालें तो किसी भी वेतन आयोग की सिफारिशें उसी दिन से लागू नहीं हो पातीं जिस दिन उनका कार्यकाल शुरू होता है।

  • 5वें, 6वें और 7वें वेतन आयोग का उदाहरण: 7वें वेतन आयोग का गठन फरवरी 2014 में हुआ था, लेकिन इसकी सिफारिशें 1 जनवरी 2016 से प्रभावी मानी गईं और कर्मचारियों को संशोधित वेतन का भुगतान अगस्त-सितंबर 2016 में किया गया था। इस दौरान कर्मचारियों को लगभग 8 महीने का एरियर मिला था।

  • 6वें वेतन आयोग का बड़ा एरियर: 6वें वेतन आयोग के समय यह देरी और अधिक लंबी खिंची थी, जिसके परिणामस्वरूप कर्मचारियों को दो किस्तों में लगभग 32 महीने तक का भारी-भरकम एरियर दिया गया था।

  • 8वें वेतन आयोग की स्थिति: यदि केंद्र सरकार आगामी समय में आयोग की औपचारिक अधिसूचना जारी करती है, तो आयोग को देश भर के विभिन्न विभागों, सैन्य बलों और कर्मचारी संगठनों से चर्चा कर रिपोर्ट तैयार करने में कम से कम 12 से 18 महीने का वक्त लगेगा। इसके बाद कैबिनेट की मंजूरी और पे-मैट्रिक्स निर्धारण में और कुछ महीने लग सकते हैं। चूूँकि प्रभावी तारीख 1 जनवरी 2026 ही रहेगी, इसलिए लागू होने के दिन तक का पूरा अंतर (लगभग 24 से 30 महीने) कर्मचारियों के खातों में एकमुश्त एरियर के रूप में क्रेडिट किया जाएगा।

8वें वेतन आयोग के तहत सबसे बड़ा बदलाव ‘फिटमेंट फैक्टर’ (Fitment Factor) के रूप में देखा जाएगा। 7वें वेतन आयोग में 2.57 का कॉमन फिटमेंट फैक्टर लागू किया गया था, जिसके चलते केंद्रीय कर्मचारियों का न्यूनतम मूल वेतन ₹7,000 से बढ़कर ₹18,000 प्रति माह हुआ था।

  • कर्मचारी यूनियनों की मांग: नेशनल काउंसिल (JCM) और विभिन्न रेलवे व रक्षा कर्मचारी महासंघों की मांग है कि 8वें वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर को बढ़ाकर 2.86 से 3.68 के बीच रखा जाना चाहिए।

  • न्यूनतम मूल वेतन (Basic Pay): यदि सरकार 2.86 के फिटमेंट फैक्टर को स्वीकार करती है, तो लेवल-1 (ग्रुप डी/एमटीएस) के कर्मचारियों की न्यूनतम बेसिक सैलरी ₹18,000 से सीधे उछलकर लगभग ₹34,500 से ₹36,000 प्रति माह हो सकती है।

  • अधिकतम वेतन: इसी अनुपात में उच्च स्तरों (लेवल-18 कैबिनेट सचिव स्तर) का अधिकतम वेतन ₹2.5 लाख से बढ़कर ₹4 लाख से ₹4.5 लाख प्रति माह तक पहुंच सकता है।

वेतन आयोग लागू होने में जितनी देरी होगी, एरियर का कॉर्पस उतना ही बड़ा होगा। एरियर की गणना मूल वेतन में होने वाली बढ़ोतरी, उस पर मिलने वाले महंगाई भत्ते (DA) के समायोजन और नए पे-मैट्रिक्स के अंतर के आधार पर की जाती है।

  • लेवल-1 कर्मचारियों के लिए: मान लीजिए किसी कर्मचारी की बेसिक सैलरी में प्रति माह ₹12,000 से ₹15,000 की शुद्ध वृद्धि (DA एडजस्टमेंट के बाद) दर्ज होती है। 30 महीने की देरी की स्थिति में केवल मूल वेतन के अंतर का एरियर ही लगभग ₹3.5 लाख से ₹4.5 लाख बन सकता है।

  • लेवल-7 से 10 (अधिकारी वर्ग): अनुभाग अधिकारियों, रक्षा अधिकारियों और राजपत्रित (Gazetted) अधिकारियों के मामले में यह अंतर ₹25,000 से ₹40,000 प्रति माह तक बैठता है। 30 महीनों के अंतराल पर उनका कुल एरियर ₹7.5 लाख से ₹12 लाख से अधिक हो सकता है।

  • पेंशनर्स को दोहरा लाभ: 65 लाख से अधिक केंद्रीय पेंशनभोगियों की बेसिक पेंशन में भी समान फिटमेंट फैक्टर से बढ़ोतरी होगी, जिससे बुजुर्गों को भी एकमुश्त एरियर की बड़ी राशि प्राप्त होगी, जो उनके रिटायरमेंट फंड और स्वास्थ्य सुरक्षा को मजबूती देगी।

बेशक कर्मचारियों के लिए एरियर एक बड़ी बचत या पूंजीगत खर्च (जैसे घर खरीदना, लोन चुकाना या बच्चों की शिक्षा) का जरिया बनता है, लेकिन सरकार के राजकोषीय गणित के लिए यह एक बड़ी चुनौती होती है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों और आर्थिक रिपोर्टों में यह संकेत दिया गया है कि 8वें वेतन आयोग के लागू होने से केंद्र के बजट पर सालाना सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 0.6% से 0.8% तक का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ सकता है। यही कारण है कि वित्त मंत्रालय आयोग के गठन और उसकी सिफारिशों को बेहद सुनियोजित तरीके से चरणबद्ध कर रहा है, ताकि राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को नियंत्रित रखते हुए अर्थव्यवस्था में उपभोग (Consumption Demand) को बढ़ावा दिया जा सके।

नियमों के मुताबिक जब भी महंगाई भत्ता (DA) 50% के आंकड़े को छूता है या पार करता है, तो हाउस रेंट अलाउंस (HRA), चिल्ड्रन एजुकेशन अलाउंस (CEA), हॉस्टल सब्सिडी और ग्रेच्युटी की सीमाओं में स्वतः संशोधन हो जाता है। वर्तमान में डीए 50% के अहम स्तर से ऊपर बना हुआ है, जिससे भत्तों में इजाफा पहले ही प्रभावी हो चुका है। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि अब समय आ गया है कि इस बढ़े हुए डीए को मूल वेतन में मर्ज करके नए वेतन आयोग की औपचारिक रूपरेखा तय की जाए। आने वाले संसद सत्र और बजट प्रावधानों में 8वें वेतन आयोग के गठन के औपचारिक ऐलान की पूरी संभावना जताई जा रही है, जो कर्मचारियों के लंबे इंतजार को एक शानदार वित्तीय सौगात में बदल सकता है।