
देश भर में पेट्रोल पंपों पर E20 (20% एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) की उपलब्धता बढ़ने के बीच वाहन चालकों और ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों के मन में यह सवाल उठ रहा था कि क्या सरकार भविष्य में इस मिश्रण को और आगे बढ़ाएगी। इस पर विराम लगाते हुए केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार की फिलहाल पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण को 20% से अधिक बढ़ाने की कोई योजना या मंशा नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार ने जैव ईंधन नीति (Biofuel Policy) के तहत 20% एथेनॉल ब्लेंडिंग का जो महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया था, देश उस दिशा में तेजी से आगे बढ़ चुका है। 20% का यह स्तर पर्यावरण संरक्षण, विदेशी मुद्रा की बचत और देश के मौजूदा वाहन बेड़े की इंजीनियरिंग अनुकूलता (Compatibility) के लिहाज से पूरी तरह संतुलित है। इसलिए इस सीमा को पार करने का कोई तात्कालिक प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है।
हाल के दिनों में सोशल मीडिया और विभिन्न मंचों पर यह दावा किया जा रहा था कि E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से वाहनों के इंजन में खराबी आ रही है, रबर के पुर्जे गल रहे हैं और माइलेज में भारी गिरावट दर्ज हो रही है। इन दावों को खारिज करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि देश भर के पेट्रोल पंपों पर रोजाना करीब 6 करोड़ गाड़ियां ईंधन भरवाने आती हैं। अगर E20 ईंधन से बड़े पैमाने पर इंजन खराब हो रहे होते, तो यह समस्या सड़कों पर व्यापक स्तर पर दिखाई देती, न कि केवल सोशल मीडिया पर चुनिंदा भ्रामक पोस्ट्स तक सीमित रहती। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऑटोमोबाइल कंपनियों द्वारा वर्ष 2023 के बाद निर्मित सभी नए वाहन पूरी तरह E20-अनुकूल (E20 Compliant) प्रमाणित हैं। जहां तक 2003 से पहले बने बेहद पुराने वाहनों का सवाल है, केवल उनमें ही कुछ रबर पार्ट्स के अनुकूलन की समस्या आ सकती है, लेकिन आधुनिक BS6 वाहनों के लिए यह ईंधन पूरी तरह सुरक्षित और प्रमाणित है।
पेट्रोलियम मंत्री ने एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम के आर्थिक और राष्ट्रीय महत्व को रेखांकित करते हुए बताया कि इस नीति से भारत को बहुआयामी लाभ हुआ है।
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कच्चे तेल के आयात में भारी कटौती: पेट्रोल में 20% तक एथेनॉल मिलाने के कारण भारत ने अब तक लगभग ₹1.6 लाख करोड़ से अधिक की कीमती विदेशी मुद्रा (Foreign Exchange) की बचत की है। यह वह रकम है जो कच्चे तेल के आयात बिल के रूप में विदेशों को भेजी जाती थी।
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किसानों की जेब में पहुंचा पैसा: एथेनॉल का उत्पादन गन्ने के शीरे (Molasses), क्षतिग्रस्त खाद्यान्न, मक्का और टूटे चावल से किया जाता है। तेल विपणन कंपनियों (OMCs) द्वारा एथेनॉल की खरीद से देश के गन्ना किसानों और अनाज उत्पादकों को सीधे तौर पर ₹1 लाख करोड़ से ज्यादा का भुगतान हुआ है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अभूतपूर्व संबल मिला है।
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कार्बन उत्सर्जन में कमी: पेट्रोल में एथेनॉल का मिश्रण जलने पर कम कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन उत्सर्जित करता है, जिससे बड़े शहरों में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण मदद मिल रही है।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि 20% की सीमा सामान्य पेट्रोल के लिए तय की गई है, लेकिन जो लोग शत-प्रतिशत हरित ईंधन पर चलना चाहते हैं, उनके लिए सरकार ने ‘फ्लेक्स-फ्यूल’ (Flex-Fuel) और E100 (100% एथेनॉल) के नियम पहले ही अधिसूचित कर दिए हैं। टोयोटा, टाटा मोटर्स और हुंडई जैसी प्रमुख वाहन निर्माता कंपनियां भारतीय बाजार के लिए फ्लेक्स-फ्यूल इंजन वाले मॉडल्स पर तेजी से काम कर रही हैं। ये वाहन खास इंजन तकनीक से लैस होते हैं, जो सामान्य पेट्रोल से लेकर 100% शुद्ध एथेनॉल तक किसी भी अनुपात के ईंधन पर बिना किसी इंजन खराबी के आसानी से चल सकते हैं।
केंद्रीय मंत्री के इस बयान से देश के करोड़ों दोपहिया और चार पहिया वाहन मालिकों को बड़ी राहत मिली है। वाहन चालकों को अब यह डर पालने की जरूरत नहीं है कि सरकार आने वाले दिनों में चुपके से पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा 25% या 30% कर देगी, जिससे उनकी मौजूदा गाड़ियों को नुकसान पहुंचे। 20% की सीमा तय रहने से वाहन निर्माता कंपनियों को भी अपने इंजन डिजाइन और फ्यूल सिस्टम को स्थिर रखने में मदद मिलेगी। सरकार का स्पष्ट संकेत है कि भारत आयातित जीवाश्म ईंधन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन यह कदम आम उपभोक्ताओं की गाड़ियों की सुरक्षा और तकनीकी मानकों की अनदेखी करके नहीं उठाया जाएगा।
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