Saturday , October 24 2026

जब लालू यादव ‘जेम्स बॉन्ड’ की तरह खुद ही निकल पड़े थे अगवा लड़की की तलाश में

बिहार की राजनीति में ऐसे अनगिनत किस्से दर्ज हैं, जो आज भी लोगों को हैरान और उत्सुक कर देते हैं। ऐसा ही एक बहुत दिलचस्प और अनोखा वाकया साल 1990 का है, जब बिहार की कमान महज 42 वर्ष की उम्र में युवा नेता लालू प्रसाद यादव ने संभाली थी। वह ऊर्जा और जोश से लबरेज थे और प्रशासनिक व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने के लिए औचक निरीक्षण और कड़े कदम उठाने के लिए जाने जाते थे। लेकिन एक दिन बात सिर्फ प्रशासनिक निगरानी तक सीमित नहीं रही, बल्कि मुख्यमंत्री खुद एक सीक्रेट एजेंट यानी ‘जेम्स बॉन्ड’ की भूमिका में आ गए।

यह बात अगस्त 1990 की है। मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव अपने सरकारी आवास पर मौजूद थे। उनके पास ही उनका सुरक्षाकर्मी तैनात था। अचानक सुरक्षाकर्मी के वायरलेस सेट पर एक आपातकालीन मैसेज गूंजा। मैसेज में कंट्रोल रूम को सूचना दी जा रही थी कि पटना के स्टेशन रोड इलाके में एक सफेद रंग की मारुति कार में किसी लड़की का अपहरण कर लिया गया है और कार तेजी से भाग रही है।

आमतौर पर ऐसी स्थिति में मुख्यमंत्री पुलिस महकमे, डीजीपी या संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों को तुरंत निर्देश जारी करते हैं। हालांकि, उस दिन लालू यादव ने कुछ ऐसा किया जिसकी किसी ने उम्मीद भी नहीं की थी। वायरलेस पर आपातकालीन पुकार सुनते ही लालू यादव ने तय किया कि वह खुद मौके पर जाकर स्थिति की कमान संभालेंगे और उस लड़की को बचाएंगे।

उन्होंने बिना पल गंवाए अपने ड्राइवर को तुरंत गाड़ी निकालने का हुक्म दिया। लेकिन साथ ही एक ऐसी हिदायत दी जिसने इस पूरे वाकये को एक फिल्मी जासूसी थ्रिलर का रूप दे दिया। लालू यादव ने स्पष्ट कहा कि वीआईपी गाड़ियों के ऊपर लगी लाल बत्ती और सायरन बंद कर दिए जाएं। साथ ही एस्कॉर्ट और पायलट गाड़ियों के हूपर भी पूरी तरह खामोश रखने का निर्देश दिया गया। वह नहीं चाहते थे कि शोर-शराबे से संदिग्ध कार चालक या अपराधी सतर्क हो जाएं।

मुख्यमंत्री की गाड़ी बिना किसी सुरक्षा तामझाम और बिना सायरन बजाए पटना की व्यस्त सड़कों पर दौड़ने लगी। ड्राइवर को उसी दिशा में गाड़ी ले जाने को कहा गया जहाँ से लोकेशन ट्रैकिंग की खबरें आ रही थीं। मुख्यमंत्री खुद अगली सीट पर बैठकर चारों तरफ पैनी नजर बनाए हुए थे।

पटना स्टेशन रोड के आसपास काफी चहल-पहल थी। कुछ ही दूरी पर मुख्यमंत्री के ड्राइवर को सड़क पर एक सफेद रंग की मारुति कार दिखाई दी। लालू यादव ने तुरंत ड्राइवर को इशारा किया कि कार को इस अंदाज़ में तेजी से ओवरटेक करके रोका जाए कि सामने वाले को संभलने का मौका न मिले। ड्राइवर ने फिल्मी अंदाज में गाड़ी कट मारकर उस मारुति के ठीक आगे खड़ी कर दी।

अचानक गाड़ी रुकने से मारुति कार में सवार लोग घबरा गए। यद्यपि गाड़ी का सायरन और लाल बत्ती बंद थी, लेकिन वीआईपी कार का ढांचा देखकर मारुति से एक व्यक्ति बाहर आया। जैसे ही लालू यादव ने शीशा नीचे किया, वह हैरान रह गए। कार से बाहर आने वाला व्यक्ति कोई अपराधी नहीं, बल्कि उनकी अपनी ही पार्टी ‘जनता दल’ का एक स्थानीय नेता निकला।

उस नेता ने जब मुख्यमंत्री को अचानक सामने देखा तो वह सकपका गया। लालू यादव ने भांप लिया कि यह वह संदिग्ध गाड़ी नहीं है। उन्होंने नेताजी से संक्षिप्त बात करते हुए कहा कि बाद में मिलना, अभी काम जरूरी है। इसके बाद उन्होंने फिर ड्राइवर से गाड़ी आगे बढ़ाने को कहा क्योंकि अगवा लड़की अभी तक नहीं मिली थी।

लालू यादव की गाड़ी एक बार फिर पटना की गलियों और मुख्य मार्गों पर फर्राटा भरने लगी। कुछ दूर जाने के बाद सुरक्षा टीम को एक और सफेद रंग की मारुति कार संदिग्ध हालत में दिखी। उसे भी तुरंत घेराबंदी करके रोका गया। लेकिन जब उसकी जांच की गई, तो उसमें से एक जाने-माने वकील साहब निकले।

काफी देर तक मुख्यमंत्री की गाड़ी पटना शहर की विभिन्न सड़कों पर बिना किसी सायरन और हूटर के घूमती रही। हालांकि, उस दिन गहन तलाशी और जासूसी के बावजूद वह अगवा लड़की मौके पर नहीं मिली, क्योंकि पुलिस कंट्रोल रूम और जमीनी सूचनाओं के बीच तालमेल की कमी थी।

लेकिन इस पूरी घटना ने मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को जमीनी हकीकत का एक बड़ा व्यावहारिक सबक दिया। उन्होंने खुद यह अनुभव किया कि आपात स्थिति में पुलिस कैसे काम करती है, सूचना तंत्र में क्या खामियां होती हैं और किस तरह अपराधी पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की आंखों में धूल झोंकने में कामयाब हो जाते हैं। इस अनोखे ‘जेम्स बॉन्ड’ स्टाइल रेस्क्यू ऑपरेशन की चर्चा आज भी बिहार की राजनीतिक गलियों में बड़े चाव से की जाती है।