
सोशल मीडिया के इस दौर में जहां लाखों युवा स्मार्टफोन और कुछ बेसिक एडिटिंग ऐप्स के जरिए घर बैठे कंटेंट क्रिएटर और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बन रहे हैं, वहीं एक हैरान करने वाला मामला इंटरनेट पर तेजी से वायरल हो रहा है। एक महिला ने इंस्टाग्राम रील्स, टिकटॉक वीडियो और सोशल मीडिया कंटेंट बनाने की बारीकियां सीखने के लिए एक प्रतिष्ठित विदेशी यूनिवर्सिटी से पूरी मास्टर डिग्री ले डाली और इसके लिए अपनी जेब से पूरे ₹36 लाख (लगभग 43,000 डॉलर से अधिक) खर्च कर दिए। जब महिला ने अपनी डिग्री और इस पर आए भारी-भरकम खर्च का खुलासा सोशल मीडिया पर किया, तो यूजर्स का सिर चकरा गया। लोगों ने न केवल इस डिग्री की उपयोगिता पर सवाल उठाए, बल्कि यह तीखी बहस भी शुरू हो गई कि क्या महज 15 से 60 सेकंड की रील्स बनाना सीखने के लिए इतनी बड़ी रकम और छात्र कर्ज (Student Loan) के बोझ तले दबना समझदारी का फैसला है।
वायरल हो रही जानकारी के अनुसार, विदेशी नागरिक इस युवती को सोशल मीडिया पर डिजिटल कंटेंट क्रिएटर बनने का गहरा शौक था। एल्गोरिद्म, वायरल ट्रेंड्स, वीडियो फ्रेमिंग, ब्रांड पार्टनरशिप और ऑडियंस एंगेजमेंट को अकादमिक स्तर पर सीखने के लिए उसने एक नामी विश्वविद्यालय के ‘कंटेंट क्रिएशन एंड डिजिटल मीडिया’ प्रोग्राम में दाखिला लिया।
कोर्स पूरा होने के बाद जब महिला ने अपने ग्रेजुएशन गाउन और डिग्री के साथ सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर करते हुए बताया कि इस दो साल की पढ़ाई पर उसके लगभग ₹36 लाख खर्च हो चुके हैं, तो वीडियो देखते ही देखते मिलियन व्यूज पार कर गया। वीडियो में महिला गर्व से अपनी डिग्री दिखा रही थी, लेकिन कमेंट सेक्शन में लोगों की मिली-जुली और हैरान करने वाली प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई।
महिला का वीडियो वायरल होते ही इंटरनेट यूजर्स दो खेमों में बंट गए। अधिकांश यूजर्स ने इस फैसले को गैर-जरूरी और पैसों की बर्बादी करार दिया:
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फ्री ट्यूटोरियल्स का हवाला: कई यूजर्स ने कमेंट करते हुए लिखा कि आज के दौर में कैपकट (CapCut), प्रीमियर प्रो, स्टोरीटेलिंग और इंस्टाग्राम एल्गोरिद्म को समझने के लिए यूट्यूब पर हजारों फ्री ट्यूटोरियल्स उपलब्ध हैं। इसके लिए लाखों रुपये का कर्ज लेने की क्या जरूरत थी?
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प्रैक्टिकल अनुभव बनाम किताबी ज्ञान: अन्य अनुभवी क्रिएटर्स ने कहा कि सोशल मीडिया पर सफलता किसी यूनिवर्सिटी की डिग्री से नहीं, बल्कि लगातार कंटेंट पोस्ट करने, कैमरा फेस करने और दर्शकों की पसंद-नापसंद को खुद परखने (Hit and Trial) से मिलती है।
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आरओआई (Return on Investment) पर सवाल: वित्तीय जानकारों ने टिप्पणी की कि 36 लाख रुपये की पूंजी से एक हाई-एंड स्टूडियो, कैमरा गियर, लाइटिंग और एक पूरी प्रोडक्शन टीम हायर की जा सकती थी, जिससे कहीं बेहतर और तेज ग्रोथ मिल सकती थी।
हालांकि, आलोचनाओं के बीच कुछ लोगों और शिक्षाविदों ने महिला के फैसले का बचाव भी किया। उनका मानना है कि बदलते दौर में डिजिटल मीडिया अब केवल ‘टाइमपास’ नहीं, बल्कि अरबों डॉलर की एक संगठित इंडस्ट्री बन चुका है:
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कॉरपोरेट और ग्लोबल ब्रांड्स में अवसर: कई बड़ी फॉर्च्यून 500 कंपनियां और पीआर एजेंसियां अब ऐसे प्रोफेशनल्स को हायर कर रही हैं जिनके पास मीडिया एथिक्स, कॉपीराइट कानून, कंज्यूमर बिहेवियर और डिजिटल स्ट्रैटेजी की औपचारिक डिग्री हो।
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हाई-लेवल नेटवर्किंग: विदेशी विश्वविद्यालयों में ऐसे कोर्सेज के दौरान छात्रों को बड़े मीडिया हाउसेज, ग्लोबल यूट्यूबर्स और मार्केटिंग हेड्स के साथ सीधे कोलैबोरेट करने का मौका मिलता है, जो आम क्रिएटर्स को आसानी से नहीं मिल पाता।
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कमर्शियल समझ: केवल फनी वीडियो बनाने के बजाय इस तरह की डिग्री से छात्रों को मीडिया बजटिंग, स्पॉन्सरशिप कॉन्ट्रैक्ट्स और डेटा एनालिटिक्स की गहरी समझ मिलती है।
हाल के वर्षों में अमेरिका, ब्रिटेन, आयरलैंड और यहां तक कि भारत के भी कई निजी संस्थानों ने सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसिंग, पॉडकास्टिंग और क्रिएटर इकोनॉमी पर शॉर्ट-टर्म डिप्लोमा और डिग्री कोर्सेज शुरू किए हैं। आयरलैंड की साउथ ईस्ट टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (SETU) ने हाल ही में ‘कंटेंट क्रिएशन एंड सोशल मीडिया’ में 3 साल का बैचलर डिग्री प्रोग्राम शुरू कर वैश्विक स्तर पर सुर्खियां बटोरी थीं।
विशेषज्ञों का कहना है कि जहां फॉर्मल एजुकेशन आपको मीडिया की बुनियादी समझ दे सकती है, वहीं सोशल मीडिया पर ‘ऑरिजिनैलिटी’ और दर्शकों से जुड़ने का हुनर कोई क्लासरूम नहीं सिखा सकता। ₹36 लाख की इस वायरल डिग्री ने यह साबित कर दिया है कि आज के दौर में क्रिएटर इकोनॉमी युवाओं के बीच कितना बड़ा आकर्षण बन चुकी है, भले ही इसके लिए उन्हें अपने भविष्य की गाढ़ी कमाई दांव पर लगानी पड़े।
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