
वैश्वीकरण के इस दौर में बड़ी संख्या में भारतीय युवा पढ़ाई या करियर के सिलसिले में विदेश जा रहे हैं और वहीं स्थायी रूप से बसकर अनिवासी भारतीय (NRI) या विदेशी नागरिक (OCI/विदेशी पासपोर्ट धारक) बन रहे हैं। जब बात पैतृक संपत्ति, विशेषकर ग्रामीण भारत में स्थित खेती की जमीन (Agricultural Land) के बंटवारे की आती है, तो परिवारों में अक्सर यह विवाद या असमंजस खड़ा हो जाता है कि जो बेटी विदेश में बस चुकी है, क्या उसका भी भारत में पिता की पुश्तैनी खेती की जमीन में कानूनी अधिकार बचता है या नहीं। कई बार परिवार के अन्य सदस्य यह दलील देकर बेटी का हक नकारने की कोशिश करते हैं कि वह अब दूसरे देश की नागरिक है, उसकी शादी हो चुकी है और भारत के विदेशी मुद्रा प्रबंधन कानून (FEMA) के तहत विदेशी नागरिकों को खेती की जमीन खरीदने की मनाही है। लेकिन भारतीय न्यायशास्त्र, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम और सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसलों के तहत यह कानूनी स्थिति बिल्कुल साफ और बेटियों के पक्ष में है।
भारतीय कानून के तहत इसका सीधा और स्पष्ट उत्तर है—बिल्कुल नहीं। किसी बेटी का विदेश में बस जाना, अनिवासी भारतीय (NRI) बन जाना या यहां तक कि किसी दूसरे देश (जैसे अमेरिका, ब्रिटेन या कनाडा) की नागरिकता लेकर विदेशी पासपोर्ट धारक (OCI कार्डधारक) बन जाना भी उसे उसके जन्मजात उत्तराधिकार से वंचित नहीं कर सकता।
भारतीय उत्तराधिकार कानून उत्तराधिकारी की नागरिकता या उसके निवास स्थान के आधार पर काम नहीं करते, बल्कि वे इस बात पर तय होते हैं कि संपत्ति किस प्रकार की है और व्यक्ति का संपत्ति धारक के साथ क्या पारिवारिक रिश्ता है। जब तक कोई व्यक्ति स्वेच्छा से अपने हिस्से का त्याग (Relinquishment Deed के जरिए) नहीं करता, तब तक कोई भी कानूनी प्रावधान उसके पैतृक उत्तराधिकार को केवल विदेश में रहने के आधार पर समाप्त नहीं कर सकता।
वर्ष 2005 से पहले हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 4(2) के तहत कृषि भूमि को राज्य के काश्तकारी कानूनों (Tenancy Laws) के दायरे में रखा गया था, जिसके चलते कई राज्यों (विशेषकर उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा) में कृषि भूमि पर बेटों का ही एकाधिकार माना जाता था। लेकिन 9 सितंबर 2005 को लागू हुए हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 ने इस विसंगति को पूरी तरह समाप्त कर दिया:
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जन्म से समान सह-दायिकी अधिकार (Coparcener Rights): संशोधित कानून की धारा 6 के तहत बेटी को जन्म से ही बेटे के बराबर पैतृक संपत्ति में ‘कोपार्सनर’ का दर्जा दिया गया। चाहे बेटी विवाहित हो, अविवाहित हो या सात समंदर पार रह रही हो, उसका अधिकार बेटे के 100% बराबर है।
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विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020) केस का मील का पत्थर: सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की खंडपीठ ने अपने ऐतिहासिक फैसले में व्यवस्था दी कि 2005 के संशोधन के बाद बेटी का पैतृक संपत्ति में अधिकार एक जन्मजात अधिकार (Inherent Right) है। पिता 2005 से पहले जीवित थे या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; यदि संपत्ति पैतृक है, तो बेटी को बेटे के बराबर हिस्सा मिलेगा ही।
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कृषि भूमि पर केंद्रीय कानून का वर्चस्व: सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न निर्णयों में यह भी दोहराया है कि हिंदू उत्तराधिकार कानून का 2005 का संशोधन कृषि भूमि पर भी समान रूप से लागू होता है और इस मामले में लैंगिक समानता को किसी भी राज्य स्तरीय पुरानी प्रथा के आधार पर दबाया नहीं जा सकता।
बेटी के कानूनी दावे को समझने के लिए जमीन की प्रकृति को दो श्रेणियों में देखना जरूरी है:
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पैतृक कृषि भूमि (Ancestral Land): जो जमीन पिता को उनके दादा, परदादा से विरासत में मिली है और बिना किसी बंटवारे के चली आ रही है। इस भूमि में बेटी का जन्म से ही बेटे के समान हिस्सा तय होता है। पिता चाहकर भी वसीयत के जरिए बेटी को इस पैतृक जमीन के हक से बेदखल नहीं कर सकते।
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पिता की स्व-अर्जित भूमि (Self-Acquired Land): यदि पिता ने खेती की जमीन अपनी खुद की कमाई से खरीदी है, तो वे उसके पूर्ण स्वामी हैं। यदि पिता जीवनकाल में किसी अन्य के नाम वैध वसीयत (Will) लिख जाते हैं, तो जमीन वसीयत के अनुसार जाएगी। लेकिन यदि पिता बिना कोई वसीयत लिखे (Intestate) दिवंगत हो जाते हैं, तो वह जमीन ‘क्लास-1 लीगल हेयर्स’ (Class-I Legal Heirs) यानी मां, बेटे और बेटी में बराबर-बराबर बांटी जाएगी। विदेश में रहने वाली बेटी को भी भाइयों के बराबर ही हिस्सा मिलेगा।
अक्सर पारिवारिक विवादों में ‘फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट’ (FEMA) का हवाला देकर बेटियों को डराया जाता है। फेमा के वास्तविक नियम इस प्रकार हैं:
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खरीदने पर रोक, विरासत में मिलने पर नहीं: फेमा नियमों और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के स्पष्ट दिशानिर्देशों के अनुसार, किसी एनआरआई (NRI) या ओसीआई (OCI) कार्डधारक को भारत में कृषि भूमि, फार्महाउस या बागान (Plantation Property) सीधे खरीदने (Purchase) की अनुमति नहीं है।
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उत्तराधिकार की पूरी छूट (Inheritance Allowed): फेमा के तहत यह स्पष्ट अपवाद है कि कोई भी एनआरआई या विदेशी नागरिक अपने माता-पिता या पूर्वजों से भारत में स्थित खेती की जमीन को विरासत/उत्तराधिकार (Inheritance) के माध्यम से वैध रूप से हासिल कर सकता है। इसके लिए आरबीआई से किसी पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं होती।
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जमीन की बिक्री के नियम: हालांकि, यदि वह विदेशी नागरिक बेटी भविष्य में उस खेती की जमीन को बेचना चाहती है, तो वह उसे केवल भारत में रहने वाले भारतीय नागरिक (Resident Indian) को ही बेच सकती है। बिक्री से प्राप्त राशि को आरबीआई के नियमों के अनुसार निर्धारित वार्षिक सीमा (LRS – 1 मिलियन डॉलर प्रति वित्तीय वर्ष) के भीतर विदेश ले जाया (Repatriate) जा सकता है।
यदि किसी एनआरआई या विदेश में रहने वाली बेटी को परिवार के लोग खेती की जमीन में हिस्सा देने से इनकार करते हैं या राजस्व रिकॉर्ड में उसका नाम दर्ज नहीं करा रहे हैं, तो वह निम्नलिखित कानूनी कदम उठा सकती है:
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वरासत / म्यूटेशन (दाखिल-खारिज): पिता के निधन के बाद स्थानीय तहसील/राजस्व विभाग में वरासत दर्ज कराते समय सभी जीवित वारिसों के साथ बेटी का नाम भी खतौनी में दर्ज कराना अनिवार्य होता है। इसके लिए ऑनलाइन राजस्व पोर्टल पर आवेदन किया जा सकता है।
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पावर ऑफ अटॉर्नी (PoA): यदि बेटी खुद भारत आने में असमर्थ है, तो वह भारतीय दूतावास (Indian Embassy/Consulate) में जाकर किसी विश्वसनीय व्यक्ति या वकील के नाम ‘स्पेशल पावर ऑफ अटॉर्नी’ (SPA) पंजीकृत करवा सकती है, जिसे भारत में एसडीएम/तहसीलदार के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है।
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बंटवारे का वाद (Partition Suit): यदि भाई या अन्य रिश्तेदार आपसी सहमति से हिस्सा देने से मना करते हैं, तो बेटी संबंधित क्षेत्र की सक्षम दीवानी अदालत (Civil Court) या राजस्व न्यायालय (SDM Court) में जमीन के सीमांकन और अपने वैध हिस्से के लिए ‘पार्टिशन सूट’ दाखिल कर सकती है। भारतीय कानून और अदालतें ऐसे मामलों में बेटियों के अधिकारों की पूरी रक्षा करती हैं।
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