
सपनों को पूरा करने की कोई उम्र नहीं होती, लेकिन जब बात देश के कानून और प्रशासनिक नीतियों की आती है तो संवैधानिक नियम ही सर्वोपरि होते हैं। ऐसा ही एक अनूठा और दिलचस्प मामला उत्तर प्रदेश के लखनऊ से सामने आया है, जहां 71 वर्षीय बुजुर्ग अभ्यर्थी अशोक बहार ने नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (NEET-UG) पास करने के बाद एमबीबीएस (MBBS) में दाखिले के लिए वरिष्ठ नागरिकों (Senior Citizens) को 1 प्रतिशत आरक्षण देने की मांग उठाई थी। हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) की लखनऊ बेंच ने इस याचिका पर अपना फैसला सुनाते हुए इसे पूरी तरह से खारिज कर दिया है। अदालत के इस सख्त रुख के बाद 71 साल के इस नीट उम्मीदवार को बड़ा झटका लगा है, जिन्होंने ढलती उम्र के इस पड़ाव पर भी डॉक्टर बनने का अपना दशकों पुराना सपना पूरा करने की जिद ठान रखी थी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता अशोक बहार की स्पेशल अपील का निपटारा करते हुए बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा कि वरिष्ठ नागरिकों के लिए मेडिकल सीटों में आरक्षण का कोई कानूनी प्रावधान मौजूद नहीं है। अदालत ने यह टिप्पणी की कि आरक्षण से जुड़ा कोई भी नया नियम या नीतिगत निर्णय लेना सक्षम विधायिका या संबंधित सरकार का काम है, किसी अदालत का नहीं। जजों ने स्पष्ट किया कि एमबीबीएस और अन्य मेडिकल पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए पात्र वरिष्ठ नागरिकों के लिए आरक्षण की मांग करना किसी ऐसे अधिकार पर आधारित नहीं है जिसे कानूनन लागू कराया जा सके। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने सिंगल जज के पहले दिए गए उस फैसले को बिल्कुल सही और न्यायसंगत ठहराया जिसमें इस याचिका को खारिज किया गया था।
लखनऊ के रहने वाले 71 वर्षीय अशोक बहार का जीवन संघर्ष और लगन की एक अनूठी मिसाल है। उनके पास बॉटनी, जूलॉजी और केमिस्ट्री में बीएससी की डिग्रियों के अलावा लॉ, कंप्यूटर एप्लीकेशन और मैनेजमेंट (MBA) की भी उच्च योग्यताएं हैं। वे सरकारी उपक्रम आईडीपीएल में उच्च पद पर कार्य कर चुके हैं और वर्तमान में वकालत से जुड़े हैं। अशोक बहार बताते हैं कि उनकी मां सावित्री देवी का सपना था कि वे अपने पिता की तरह डॉक्टर बनें। उनके परिवार में पत्नी (जो खुद एक अनुभवी गायनेकोलॉजिस्ट हैं) समेत करीब 20 डॉक्टर मौजूद हैं, जिनमें से कई विदेशों में सेवाएं दे रहे हैं। इसके बावजूद खुद का डॉक्टर न बन पाना उनके दिल में हमेशा खटकता रहा, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा नीट में अधिकतम आयु सीमा हटाए जाने पर उन्होंने 71 साल की उम्र में परीक्षा दी।
कोर्ट में सुनवाई के दौरान अशोक बहार के वकील पंकज धीर सिंह राणा ने दलील दी कि जब सुप्रीम कोर्ट ने नीट-यूजी की परीक्षा के लिए अधिकतम आयु सीमा की पाबंदी को पूरी तरह खत्म कर दिया है, तो इसका सीधा मतलब है कि वरिष्ठ नागरिक भी मेडिकल शिक्षा प्राप्त करने के हकदार हैं। उन्होंने तर्क दिया कि जिस तरह दिव्यांगों, पूर्व सैनिकों, खिलाड़ियों और स्वतंत्रता सेनानियों को मेडिकल दाखिले में विशेष कोटा या छूट दी जाती है, उसी तरह वरिष्ठ नागरिकों को भी 1% आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए। इसके जवाब में नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) के वकील ने कोर्ट में पक्ष रखते हुए कहा कि एनटीए केवल परीक्षा आयोजित कराने वाली संस्था है और यह एमबीबीएस दाखिले से जुड़े मौजूदा सरकारी कानूनों के तहत काम करती है। चूंकि मौजूदा नियमों में बुजुर्गों के लिए कोटे का कोई प्रावधान नहीं है, इसलिए अदालत इसमें बिना सरकारी नीति के हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
अशोक बहार की इस ऐतिहासिक याचिका भले ही अदालत से खारिज हो गई हो, लेकिन इसने देश के मेडिकल एजुकेशन सिस्टम में आयु सीमा, अवसर और वरिष्ठ नागरिकों की भागीदारी को लेकर एक नई राष्ट्रीय बहस जरूर छेड़ दी है। हालांकि वर्तमान नियमों के तहत उन्हें एमबीबीएस की सामान्य कैटेगरी की कट-ऑफ और मेरिट के आधार पर ही सीट मिल सकती है, न कि किसी विशेष कोटे के तहत। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या याचिकाकर्ता इस नीतिगत मुद्दे को लेकर आगे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं या फिर सरकार भविष्य में वरिष्ठ नागरिकों के लिए उच्च शिक्षा में कोई नई नीति तैयार करती है। फिलहाल, 71 साल की उम्र में भी अशोक बहार की यह पढ़ने की भूख और डॉक्टर बनने का जुनून पूरे देश के युवाओं के लिए एक बड़ी प्रेरणा बना हुआ है।
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