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सौरव दास और आशुतोष रांका की कस्टडी पर भड़के अभिजीत दिपके, पूछा तीखा सवाल

देश की राजधानी दिल्ली के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में इन दिनों कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं की गिरफ्तारी और कस्टडी विस्तार को लेकर भारी घमासान मचा हुआ है। जंतर-मंतर पर बिना पूर्व अनुमति विरोध प्रदर्शन करने और परिसर में दाखिल होकर तिरंगा लहराने के आरोप में गिरफ्तार किए गए CJP के सह-संयोजक सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत को दिल्ली की एक अदालत द्वारा बढ़ा दिया गया है।

इस अदालती फैसले और प्रशासनिक देरी के सामने आते ही CJP के संस्थापक और प्रमुख अभिजीत दिपके का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली पर सीधा निशाना साधते हुए सोशल मीडिया और मीडिया के सामने तीखा हमला बोला है। अभिजीत दिपके ने आक्रोश जताते हुए पूछा कि क्या युवाओं को बेवजह जेल में रखकर अपनी ताकत दिखाई जा रही है या कोई राजनीतिक बदले की भावना से कार्रवाई की जा रही है।

इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि जंतर-मंतर पर हुए हालिया विरोध प्रदर्शन से जुड़ी हुई है। जंतर-मंतर परिसर को हाल ही में प्रदर्शन स्थल सूची से हटाए जाने के बावजूद, सौरव दास और आशुतोष रांका कथित तौर पर बंद गेट को पार कर भीतर दाखिल हो गए थे। वहां उन्होंने अपनी मांगों को लेकर तिरंगा प्रदर्शित किया और नारेबाजी की।

दिल्ली पुलिस ने शांति व्यवस्था भंग करने और सरकारी आदेशों के उल्लंघन के आरोप में दोनों नेताओं को 13-14 अक्टूबर के आसपास हिरासत में लिया और फिर पांच दिन की न्यायिक हिरासत (Judicial Custody) में भेज दिया था। पांच दिनों की कस्टडी की अवधि समाप्त होने के बाद जब दोनों नेताओं को अदालत में पेश किया गया, तो पुलिस ने आगे की जांच और कागजी प्रक्रियाओं का हवाला देते हुए न्यायिक हिरासत की अवधि को और बढ़ा दिया। इस प्रशासनिक और कानूनी देरी से नाराज CJP की लीगल टीम और नेताओं ने इसे जानबूझकर की गई कार्रवाई बताया।

अदालत द्वारा न्यायिक हिरासत की अवधि बढ़ाए जाने और जमानत प्रक्रियाओं में आ रही दिक्कतों पर प्रतिक्रिया देते हुए अभिजीत दिपके ने सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने तीखे लहजे में कहा कि हमारे युवा साथियों के पास से कोई हथियार या गैर-कानूनी चीज नहीं मिली है, उन्होंने सिर्फ अपनी आवाज उठाई और तिरंगा लहराया। क्या लोकतंत्र में अपनी बात रखना इतना बड़ा अपराध हो गया है कि बिना किसी पुख्ता कानूनी आधार के युवाओं को कई दिनों तक जेल की सलाखों के पीछे सड़ाया जा रहा है?

दिपके ने तंज कसते हुए कहा कि क्या जेल में बंद करके युवाओं की आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है? उन्होंने आरोप लगाया कि स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) और सरकारी पक्ष जानबूझकर समय बिताने और कागजी प्रक्रिया को टालने के लिए हथकंडे अपना रहे हैं ताकि हमारे नेताओं की रिहाई में बेवजह अड़चनें डाली जा सकें।

इस पूरे मामले में CJP की कानूनी प्रमुख (Legal Head) रत्ना सिंह ने भी पुलिस और प्रशासन के रवैये पर भारी असंतोष व्यक्त किया। उन्होंने मीडिया से बातचीत में खुलासा किया कि सभी जरूरी दस्तावेज, जमानतदारों के सत्यापन और अदालत द्वारा मांगी गई शर्तें समय पर पूरी कर ली गई थीं।

लेकिन इसके बावजूद सुनवाई में लगातार देरी की गई और बेवजह का समय खींचा गया। CJP का दावा है कि उनके नेताओं को जेल में रखने के लिए जानबूझकर कानूनी दांव-पेच और तकनीकी पेंच फंसाए जा रहे हैं। जब कोई ठोस कानूनी आधार मौजूद नहीं था, तो भी न्यायिक हिरासत की अवधि बढ़ा देना स्पष्ट रूप से राजनीतिक दबाव और प्रशासनिक तंत्र के दुरुपयोग को दर्शाता है।

अभिजीत दिपके ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी पार्टी इस तरह के दमनकारी कदमों से बिल्कुल भी डरने या झुकने वाली नहीं है। उन्होंने कहा कि उनके नेताओं के हौसले पूरी तरह से बुलंद हैं और वे जेल से मुस्कुराते हुए बाहर आएंगे। CJP ने अब इस मामले को उच्च न्यायालयों (High Court) तक ले जाने और वरिष्ठ वकीलों के साथ कानूनी लड़ाई को और मजबूत करने की रणनीति बनाई है।

राजधानी में घटित इस घटनाक्रम के बाद से लोकतांत्रिक अधिकारों, विरोध प्रदर्शन की आजादी और कस्टडी के इस्तेमाल को लेकर एक नई राष्ट्रीय बहस शुरू हो गई है। आने वाले दिनों में सौरव दास और आशुतोष रांका की रिहाई को लेकर कानूनी और राजनीतिक जंग और अधिक तेज होने के पूरे आसार हैं।