
भारतीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में इन दिनों नोबेल शांति पुरस्कार (Nobel Peace Prize) को लेकर एक नया और बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ और दिग्गज सांसद शशि थरूर ने केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए यह आरोप लगाया है कि भारतीय मूल की प्रसिद्ध दक्षिण अफ्रीकी कानून विशेषज्ञ नवी पिल्लई को इस साल का प्रतिष्ठित नोबेल शांति पुरस्कार मिलने के बावजूद भारत सरकार की तरफ से उन्हें आधिकारिक तौर पर बधाई तक नहीं दी गई है। शशि थरूर के इस बयान के बाद देश की राजनीतिक फिजा में भूचाल आ गया है, और सोशल मीडिया से लेकर कूटनीतिक हलकों तक इस पर पक्ष-विपक्ष में तीखी बहस छिड़ गई है। जहां एक तरफ थरूर ने सरकार की चुप्पी को ‘निंदनीय’ करार दिया है, वहीं दूसरी तरफ सोशल मीडिया यूजर्स और पूर्व राजनयिकों ने थरूर की ही खिंचाई करते हुए तीखे सवाल खड़े किए हैं। आइए जानते हैं कि इस पूरे विवाद के पीछे की असली वजह क्या है और नवी पिल्लई का भारत से क्या संबंध रहा है।
कौन हैं नवी पिल्लई और क्यों मिला उन्हें 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार
सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि जिस शख्सियत को लेकर देश में सियासत गर्माई है, उनका जीवन और संघर्ष कितना असाधारण रहा है। नवी पिल्लई (Navi Pillay) का भारतीय मूल से गहरा और पुराना नाता है। उनके पूर्वज करीब 130 साल पहले भारत से पलायन करके पहले श्रीलंका और फिर दक्षिण अफ्रीका जाकर बस गए थे। नवी पिल्लई का जन्म साल 1941 में दक्षिण अफ्रीका के डरबन शहर में हुआ था। उन्होंने अपने शुरुआती जीवन में भयानक गरीबी और रंगभेद (Apartheid) के कड़े और अमानवीय दौर का बहुत करीब से सामना किया था।
अपनी कड़ी मेहनत और शिक्षा के दम पर उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ नटाल से कानून की डिग्री हासिल की और बाद में प्रतिष्ठित हार्वर्ड लॉ स्कूल से डॉक्टरेट (PhD) की उपाधि प्राप्त की। अपने ऐतिहासिक कानूनी सफर के दौरान साल 1995 में वह दक्षिण अफ्रीका के उच्च न्यायालय की पहली अश्वेत महिला जज (First Black Female Judge) बनने का गौरव हासिल करने में सफल रहीं। उन्होंने रंगभेद के खिलाफ अपने दौर में नेल्सन मंडेला जैसे महान नेताओं और राजनीतिक कैदियों के लिए अदालत में साहसिक कानूनी लड़ाई लड़ी थी। इसके अलावा, रवांडा इंटरनेशनल क्रिमिनल ट्रिब्यूनल में उनकी भूमिका बेहद अहम रही थी। साल 1998 के उस ऐतिहासिक ‘अकायेसु फैसले’ (Akayesu Judgment) में उनके अभूतपूर्व योगदान को हमेशा याद किया जाएगा, जिसके जरिए बलात्कार और यौन हिंसा को आधिकारिक तौर पर ‘नरसंहार’ (Genocide) की श्रेणी में शामिल किया गया था। मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने की उनकी इसी आजीवन सेवाओं को देखते हुए नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने उन्हें साल 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया है।
शशि थरूर का सरकार पर हमला: “पूर्वजों के देश ने नहीं दी बधाई”
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक लंबी पोस्ट साझा करते हुए केंद्र सरकार की चुप्पी पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने लिखा कि भारतीय मूल की इस असाधारण और संघर्षशील महिला को दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार जीते हुए छह दिन बीत चुके हैं, लेकिन उनके पूर्वजों के देश यानी भारत की सरकार ने उन्हें अभी तक एक औपचारिक बधाई तक नहीं दी है। थरूर ने इसे बेहद निंदनीय करार देते हुए कहा कि संकीर्ण सोच वाले लोगों को इस पर शर्म आनी चाहिए।
अपनी इस पोस्ट के साथ शशि थरूर ने एक एआई-जनरेटेड वीडियो भी साझा किया था, जिसमें नवी पिल्लई के बस ड्राइवर पिता की बेटी से लेकर देश की पहली अश्वेत जज बनने तक के संघर्षपूर्ण सफर को बहुत ही मार्मिक ढंग से दिखाया गया था। वीडियो में इस बात पर प्रकाश डाला गया था कि कैसे उन्होंने श्वेत वकीलों और भेदभावपूर्ण कानूनी सिस्टम के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी, राजनीतिक कैदियों का खुलकर बचाव किया और अंततः नेल्सन मंडेला के साथ मिलकर न्याय की हुंकार भरी।
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस और शशि थरूर की हुई आलोचना
शशि थरूर द्वारा सरकार पर सवाल उठाए जाने के बाद सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई, और कई यूजर्स ने थरूर के इस रुख पर ही सवाल खड़े कर दिए। एक सोशल मीडिया यूजर प्रियंका ने तंज कसते हुए लिखा कि कांग्रेस नेता को इसके लिए ‘नोबेल पाखंड पुरस्कार’ मिलना चाहिए।
इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा और वजनदार बयान देश के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल (Kanwal Sibal) का आया। उन्होंने शशि थरूर की पोस्ट को पूरी तरह हैरान करने वाला बताया। पूर्व विदेश सचिव ने देश की जनता को याद दिलाया कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त (UN High Commissioner for Human Rights) के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान (2008 से 2014 तक) नवी पिल्लई ने मानवाधिकारों के विभिन्न मुद्दों पर लगातार और तीखे अंदाज में भारत की आलोचना की थी, जिसका भारत सरकार ने समय-समय पर आधिकारिक और कड़ा जवाब भी दिया था।
कंवल सिब्बल ने सीधा सवाल किया कि क्या सिर्फ किसी व्यक्ति के ‘भारतीय मूल’ का होने मात्र से भारत सरकार को उसे तुरंत बधाई दे देनी चाहिए, जबकि उनके नीतिगत मतभेद और भारत विरोधी रुख जगजाहिर रहे हैं? कूटनीतिक जानकारों का भी यही मानना है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों और कूटनीति में केवल वंशावली या मूल महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि देश के रणनीतिक और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि होते हैं। यही कारण है कि यह पूरा मामला अब राजनीतिक गलियारों में एक बड़ी बहस का विषय बन चुका है।
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