
वैश्विक वित्तीय बाजारों और घरेलू अर्थव्यवस्था में जब भी भारतीय रुपया (Indian Rupee) अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है, तो देश भर में एक भूचाल सा आ जाता है। विपक्षी दलों से लेकर आम आदमी तक, हर कोई इसे देश की अर्थव्यवस्था की कमजोरी और महंगाई का बड़ा कारण मानकर चिंता जताने लगता है। लेकिन इस आम धारणा के उलट देश के जाने-माने और प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री अरविंद पनगढ़िया (Arvind Panagariya) ने एक ऐसा बयान दिया है जिसने वित्तीय गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि रुपये का गिरना या डॉलर के मुकाबले उसका कमजोर होना हमेशा बुरा नहीं होता, बल्कि इसके कई सकारात्मक पहलू भी होते हैं जो देश के निर्यात (Exports) और समग्र आर्थिक विकास को गति देते हैं। उनके इस बयान के बाद से यह समझने की कोशिश की जा रही है कि आखिर एक अर्थशास्त्री की नजर में मुद्रा के अवमूल्यन के क्या मायने होते हैं।
आम तौर पर लोगों का यह मानना होता है कि अगर डॉलर मजबूत हो रहा है और रुपया कमजोर हो रहा है, तो इसका मतलब है कि देश की अर्थव्यवस्था पिछड़ रही है। लेकिन अर्थशास्त्र के बुनियादी सिद्धांत इस बात की गवाही देते हैं कि विनिमय दर (Exchange Rate) में उतार-चढ़ाव एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। अरविंद पनगढ़िया ने अपने एक हालिया विश्लेषण में इस बात पर जोर दिया है कि जब रुपया कमजोर होता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय सामान और सेवाएं (Goods and Services) सस्ते हो जाते हैं। इससे देश के निर्यातकों को सीधे तौर पर फायदा मिलता है, वे विदेशी खरीदारों को अधिक प्रतिस्पर्धी दरों पर माल बेच पाते हैं, जिससे देश का कुल निर्यात बढ़ता है और विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होता है। इसके अलावा, इससे घरेलू उद्योगों को भी विदेशी सस्ते सामानों से मुकाबला करने में सुरक्षा मिलती है, जो ‘मेक इन इंडिया’ जैसी पहलों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।
केवल विनिमय दरों पर बात करते हुए अरविंद पनगढ़िया ने यह भी रेखांकित किया कि आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है। वैश्विक मंदी और अनिश्चितता के दौर के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy) ने जिस प्रकार की सहनशक्ति और लचीलापन दिखाया है, वह काबिले तारीफ है। देश का मजबूत बुनियादी ढांचा, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में बढ़ती निवेश के अवसर और घरेलू मांग (Domestic Consumption) ऐसे मजबूत स्तंभ हैं जो किसी भी बाहरी वित्तीय झटके का सामना करने में सक्षम हैं। अर्थशास्त्री का मानना है कि हमें छोटी-छोटी बातों पर घबराने के बजाय देश की वास्तविक विकास दर और दीर्घकालिक आर्थिक सुधारों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जो आने वाले समय में भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनाने की ओर तेजी से अग्रसर कर रहे हैं।
हालांकि, अर्थशास्त्र का हर पहलू दोधारी तलवार की तरह होता है। जहां एक तरफ रुपये के गिरने से निर्यातकों की पौ बारह होती है, वहीं दूसरी तरफ देश के भीतर आयात (Imports) महंगे हो जाते हैं। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल (Crude Oil) और इलेक्ट्रॉनिक सामान विदेशों से आयात करता है, जिसके लिए भुगतान डॉलर में करना पड़ता है। जब रुपया कमजोर होता है, तो तेल आयात का बिल बढ़ जाता है, जिससे देश के भीतर ईंधन के दाम और अंततः महंगाई बढ़ने का जोखिम पैदा हो जाता है। अरविंद पनगढ़िया जैसे अर्थशास्त्री भी इस चुनौती से पूरी तरह वाकिफ हैं, लेकिन उनका तर्क यह है कि यदि दीर्घकालिक राष्ट्रीय हित और निर्यात संवर्धन (Export Promotion) को प्राथमिकता दी जाए, तो इस संतुलन को समझदारी से संभाला जा सकता है। सरकार और केंद्रीय बैंक (RBI) की नीतियां हमेशा इसी संतुलन को बनाए रखने के लिए काम करती हैं।
अरविंद पनगढ़िया का यह बयान ऐसे समय में आया है जब दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं मुद्रास्फीति (Inflation) और भू-राजनीतिक तनावों से जूझ रही हैं। भारत के नीति निर्माताओं के लिए यह संदेश साफ है कि विनिमय दर के रोजाना के उतार-चढ़ाव से घबराने की जरूरत नहीं है, बल्कि देश के उत्पादन आधार (Manufacturing Base) और रोजगार सृजन को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए। जब देश का निर्यात मजबूत होगा और औद्योगिक उत्पादन बढ़ेगा, तो मुद्रा के ऐसे छोटे-मोटे उतार-चढ़ाव अर्थव्यवस्था की रफ्तार को नहीं रोक पाएंगे। भारत जिस तरह से आत्मनिर्भरता और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अपनी भूमिका बढ़ा रहा है, उससे यह स्पष्ट है कि देश का आर्थिक भविष्य सुरक्षित हाथों में है और ऐसी बौद्धिक चर्चाएं देश को सही दिशा दिखाने का काम करती हैं।
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