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भोजपुर के चर्चित भरत तिवारी एनकाउंटर मामले ने पकड़ा तूल

बिहार की सियासत में इन दिनों एक एनकाउंटर प्रकरण को लेकर जबरदस्त घमासान मचा हुआ है। मामला भोजपुर जिले के बिलौटी गांव से जुड़ा है, जहां कुछ महीने पहले पुलिस ऑपरेशन के दौरान भरत तिवारी नामक व्यक्ति की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। इस घटना के बाद से ही लगातार राजनीतिक दलों और पुलिस प्रशासन के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। अब इस मामले में नया मोड़ तब आया जब राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के बक्सर से सांसद सुधाकर सिंह और बिहार के एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी कुंदन कृष्णन आमने-सामने आ गए।

वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी की ओर से उनके अधिवक्ता के माध्यम से आरजेडी सांसद सुधाकर सिंह को एक भारी-भरकम कानूनी नोटिस भेजा गया है। इस नोटिस में सांसद द्वारा दिए गए बयानों पर कड़ी आपत्ति जताते हुए 15 दिनों के भीतर सार्वजनिक रूप से बिना शर्त माफी मांगने की मांग की गई है। ऐसा न करने पर 5 करोड़ रुपये का सिविल मानहानि मुकदमा और आपराधिक मानहानि की कार्रवाई शुरू करने की चेतावनी दी गई है। इस नोटिस के सामने आने के बाद से बिहार के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में तापमान काफी बढ़ गया है।

#1 क्या था पूरा भरत तिवारी एनकाउंटर केस? सोशल मीडिया लाइव से लेकर पुलिस कार्रवाई तक की कहानी

भोजपुर जिले के बिलौटी गांव में घटी उस घटना को लोग आज भी भूले नहीं हैं, जब पुलिस कार्रवाई में भरत तिवारी की जान चली गई थी। इस एनकाउंटर के तूल पकड़ने की मुख्य वजह यह बताई जाती है कि घटना के दौरान कथित तौर पर भरत तिवारी अपने फेसबुक अकाउंट पर लाइव था और वह पुलिस के सामने हथियार फेंककर सरेंडर करने की बात कह रहा था। जब यह वीडियो सामने आया, तो पुलिस की कार्यशैली पर आम जनता और मानवाधिकार संगठनों ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

मृतक के परिजनों ने स्थानीय थाना पुलिस और एसटीएफ के अधिकारियों पर सीधे तौर पर हत्या का आरोप लगाया था। बढ़ते दबाव को देखते हुए शाहपुर थाने में पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई और बाद में राज्य सरकार ने मामले की गंभीरता को समझते हुए एक न्यायिक जांच आयोग (Judicial Inquiry Commission) का गठन भी कर दिया। इस मामले में कई पुलिसकर्मियों पर निलंबन की गाज भी गिर चुकी है, लेकिन विवाद तब और गहरा गया जब राजनीतिक बयानों के जरिए इस पर उच्च स्तर की जवाबदेही तय करने की मांग की जाने लगी।

#1 आरजेडी सांसद सुधाकर सिंह और आईपीएस कुंदन कृष्णन क्यों आए आमने-सामने?

इस पूरे विवाद की जड़ में वह बयानबाजी है जो आरजेडी सांसद सुधाकर सिंह ने पुलिस प्रशासन और तत्कालीन शीर्ष अधिकारियों की भूमिका पर की थी। घटना के समय कुंदन कृष्णन बिहार एसटीएफ के डीजी पद पर कार्यरत थे। सांसद सुधाकर सिंह ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस और विभिन्न साक्षात्कारों के दौरान यह सवाल उठाया था कि बिना किसी उच्चस्तरीय निर्देश या पुलिस मुख्यालय के आदेश के कोई भी निचला पुलिसकर्मी इस तरह की कार्रवाई को अंजाम नहीं दे सकता।

सांसद का कहना था कि इस प्रकरण की जांच केवल कुछ सिपाहियों या मैदानी पुलिसकर्मियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि नीति निर्धारकों और शीर्ष कमांडिंग अधिकारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। कानूनी नोटिस में इन्हीं बयानों को आधार बनाते हुए कहा गया है कि सांसद ने अधिकारी की पेशेवर प्रतिष्ठा और छवि को धूमिल करने के लिए निराधार और मनगढ़ंत आरोप लगाए हैं, जिससे पुलिस बल का मनोबल प्रभावित होता है।

#1 “मैं किसी धमकी से डरने वाला नहीं, अपने सवालों पर कायम हूं”- सांसद सुधाकर सिंह का कड़ा पलटवार

कानूनी नोटिस मिलने के बाद आरजेडी सांसद सुधाकर सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए स्पष्ट कर दिया कि वे इस तरह के कानूनी दबावों से झुकने वाले नहीं हैं। उन्होंने दो-टूक अंदाज में कहा कि जनहित और न्याय से जुड़े मुद्दों पर वे अपनी आवाज उठाना बंद नहीं करेंगे। सांसद ने लिखा कि किसी भी अधिकारी को उसके पद या वर्दी के कारण जनता के प्रति जवाबदेही से छूट नहीं मिल सकती।

सुधाकर सिंह ने अपने बयान को दोहराते हुए कहा कि वे आज भी इस बात पर अडिग हैं कि आखिर वह कौन सी परिस्थितियां थीं जिनके चलते एक व्यक्ति की जान गई और इसके पीछे का चैन ऑफ कमांड क्या था। उन्होंने कहा कि कानूनी नोटिस भेजकर जनप्रतिनिधियों की आवाज को दबाने की कोशिश लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुकूल नहीं है। अब देखना यह होगा कि इस कानूनी नोटिस और राजनीतिक तनातनी के बीच आगे चलकर यह मामला कोर्ट की दहलीज पर क्या नया मोड़ लेता है