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IDBI बैंक में हिस्सेदारी बिक्री पर सरकार का बड़ा बयान, वित्त मंत्रालय ने बताया क्या है कानून और कानूनी अधिकार

भारतीय बैंकिंग सेक्टर और सरकारी विनिवेश (Disinvestment) के मोर्चे पर इन दिनों एक बहुत बड़ा घटनाक्रम तेजी से आगे बढ़ रहा है। हाल ही में कैबिनेट की आर्थिक मामलों की समिति (CCEA) द्वारा आईडीबीआई बैंक (IDBI Bank Stake Sale) में सरकार और एलआईसी की बड़ी हिस्सेदारी कनाडा की दिग्गज कंपनी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स (Fairfax Financial Holdings) को बेचने के प्रस्ताव को मंजूरी दिए जाने के बाद देश की सियासत और आर्थिक गलियारों में बहस छिड़ गई थी। कई जगहों पर सरकार के इस अधिकार को लेकर सवाल उठाए जा रहे थे। इस बीच, केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने एक आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी कर यह दो टूक कह दिया है कि सरकार के पास आईडीबीआई बैंक में अपनी हिस्सेदारी घटाने या उसे पूरी तरह से बेचने का पूरा कानूनी अधिकार है। वित्त मंत्रालय ने इसके समर्थन में साल 2018 के दिल्ली हाईकोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले और संसदीय इतिहास का हवाला दिया है।

आईडीबीआई बैंक हिस्सेदारी बिक्री और CCEA की मंजूरी का पूरा मामला

हाल ही में हुए इस बड़े आर्थिक फैसले के तहत, CCEA ने आईडीबीआई बैंक की कुल 60.72% हिस्सेदारी कनाडा की कंपनी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स को लगभग 52,878.08 करोड़ रुपये में बेचने के प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगाई है। इस मेगा डील के सामने आने के बाद विभिन्न हलकों में यह चर्चा शुरू हो गई थी कि क्या सरकार के पास बैंक में अपनी बहुसंख्यक हिस्सेदारी बेचने का कानूनी अधिकार है या नहीं।

इन्हीं तमाम अटकलों और बहसों पर विराम लगाते हुए वित्त मंत्रालय ने शनिवार, 17 अक्टूबर को स्थिति पूरी तरह साफ कर दी। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि सरकार द्वारा उठाया गया यह कदम पूरी तरह से कानूनी दायरे में है और इसे विधायी तथा अदालती फैसलों का पूरा समर्थन प्राप्त है।

क्या कहता है कानून और IDBI (Repeal) Act, 2003 का इतिहास?

वित्त मंत्रालय द्वारा जारी किए गए विस्तृत स्पष्टीकरण के अनुसार, आईडीबीआई बैंक में सरकार की हिस्सेदारी कम करने के अधिकार को लेकर वर्ष 2003 के विधायी घटनाक्रमों का हवाला दिया जा रहा था। मंत्रालय ने यह स्पष्ट किया कि जब केंद्रीय बजट 2003 पर चर्चा चल रही थी और संसद में IDBI (Repeal) Act, 2003 पर बहस हो रही थी, उस दौरान सरकार की हिस्सेदारी घटाने की प्रक्रिया को सीमित करने के उद्देश्य से एक संशोधन पेश किया गया था।

हालांकि, वह संशोधन संसद में पारित नहीं हो सका और बहस के दौरान खारिज कर दिया गया। इसलिए, वह संसद द्वारा बनाए गए अंतिम कानून का हिस्सा नहीं बना। कानून की मूल भाषा और उसके इतिहास से यह साफ है कि इसमें सरकार को अपनी हिस्सेदारी बेचने से रोकने वाला कोई भी प्रतिबंधात्मक प्रावधान नहीं जोड़ा गया था।

दिल्ली हाईकोर्ट के 2018 के फैसले का दिया गया हवाला

इस पूरे मामले में कानूनी स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट करने के लिए वित्त मंत्रालय ने ‘ऑल इंडिया आईडीबीआई ऑफिसर्स एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य’ मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के 17 दिसंबर 2018 के एक महत्वपूर्ण फैसले का विशेष रूप से उल्लेख किया है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने उस फैसले में याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट रूप से यह कहा था कि संसद में विधायी प्रक्रिया के दौरान लगभग 15 वर्ष पहले दिए गए कुछ बयान केंद्र सरकार को आईडीबीआई लिमिटेड में अपनी हिस्सेदारी घटाने या विनिवेश करने से नहीं रोक सकते। अदालत ने अपने फैसले के पैराग्राफ 41 और 42 में यह टिप्पणी की थी कि संसद में हुई बहसों या बयानों को कानून का स्थान नहीं दिया जा सकता। अधिनियम (Act) की भाषा में कोई अस्पष्टता नहीं है और इसमें ऐसा कोई भी प्रावधान शामिल नहीं है जो सरकार को बैंक में अपनी हिस्सेदारी कम करने से रोके। अदालत ने यह भी साफ कर दिया था कि इस मामले में ‘वचनबद्धता के सिद्धांत’ (Promissory Estoppel) का लाभ उठाकर सरकार को विनिवेश से रोकने का दावा कानूनी रूप से टिक नहीं सकता।

पिछले केंद्रीय बजट भाषणों में भी थी रणनीतिक विनिवेश की नीति

सरकार की इस नीति का समर्थन करते हुए वित्त मंत्रालय ने पूर्व के केंद्रीय बजटों का भी जिक्र किया है। मंत्रालय ने याद दिलाया कि कैसे विभिन्न वित्त मंत्रियों ने समय-समय पर संसद में आईडीबीआई बैंक के पुनर्गठन और रणनीतिक विनिवेश की बात स्पष्ट रूप से कही थी।

  • केंद्रीय बजट 2016-17: तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने बजट भाषण में स्पष्ट किया था कि आईडीबीआई बैंक के रीस्ट्रक्चरिंग की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और सरकार आने वाले समय में बैंक में अपनी हिस्सेदारी को 50 प्रतिशत से नीचे लाने के सभी विकल्पों पर विचार करेगी।

  • केंद्रीय बजट 2021-22: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट भाषण के दौरान आईडीबीआई बैंक को उन प्रमुख रणनीतिक संस्थाओं की सूची में शामिल किया था, जिनके विनिवेश लेनदेन को पूरा करने का प्रस्ताव सरकार के एजेंडे में सबसे ऊपर था।

इन तमाम बजट भाषणों और सरकारी नीतियों से यह स्पष्ट हो जाता है कि आईडीबीआई बैंक में हिस्सेदारी बेचना कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं है, बल्कि यह पिछले कई वर्षों से चली आ रही एक सुविचारित आर्थिक नीति का हिस्सा है।

वित्त मंत्रालय का स्पष्ट निष्कर्ष

अपने आधिकारिक स्पष्टीकरण के अंत में वित्त मंत्रालय ने यह दोहराया कि IDBI (Repeal) Act, 2003 का विधायी इतिहास, दिल्ली हाईकोर्ट का स्पष्ट फैसला और केंद्र सरकार की सुसंगत नीतियां इस बात का पुख्ता प्रमाण हैं कि सरकार के पास देशहित और वित्तीय सुधारों के तहत अपने उपक्रमों में रणनीतिक विनिवेश करने का पूर्ण अधिकार है। इस बड़े स्पष्टीकरण के बाद अब यह साफ हो गया है कि फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स के साथ होने वाली यह मेगा डील पूरी तरह से कानूनी और संवैधानिक प्रावधानों के दायरे में आगे बढ़ रही है।