देश के आसमान से दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की विदाई: 15 अक्टूबर को सामान्य तारीख पर सिमटी मानसूनी रेखा

भारत के करोड़ों किसानों, जल प्रबंधकों और आम नागरिकों के लिए पिछले चार महीनों से जीवन रेखा बना दक्षिण-पश्चिम मॉनसून (Southwest Monsoon) अब आधिकारिक रूप से पूरे देश से रुखसत हो चुका है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 15 अक्टूबर को प्रेस विज्ञप्ति जारी कर यह पुष्टि कर दी है कि दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की विदाई रेखा देश के अंतिम छोर को भी पार कर चुकी है। आमतौर पर भारतीय मौसम के दीर्घकालिक औसत (LPA) के अनुसार 15 अक्टूबर को ही दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की विदाई की मानक और आदर्श तारीख माना जाता है। पिछले कुछ वर्षों में जहां मॉनसून की वापसी 19 से 25 अक्टूबर तक खिंचती रही थी, वहीं इस बार कुदरत ने अपने तय कैलेंडर का बखूबी पालन किया है। उत्तर और मध्य भारत के ऊपर शुष्क उत्तर-पश्चिमी हवाओं का प्रभुत्व स्थापित होने, वायुमंडल के निचले क्षोभमंडल से नमी में भारी कमी आने और बादलों के छंटने के साथ ही इस चार महीने लंबे मानसूनी सीजन पर औपचारिक रूप से पर्दा गिर गया है। हालांकि, यह विदाई राहत के साथ-साथ एक गहरी कसक भी छोड़ गई है, क्योंकि कई राज्यों में बारिश का वितरण असमान रहा और अंतिम आंकड़ों में लगभग 12 फीसदी तक की क्षेत्रीय कमी दर्ज की गई है।

दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के इस सीजन का समग्र रिपोर्ट कार्ड भारत की जटिल भौगोलिक जलवायु का जीता-जागता प्रमाण पेश करता है। राष्ट्रीय स्तर पर भले ही आंकड़ों को सामान्य के आसपास दिखाने की कोशिश की गई हो, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि देश के कई महत्वपूर्ण कृषि प्रधान अंचलों में सामान्य की तुलना में 12 फीसदी से अधिक कम बारिश रिकॉर्ड की गई। विशेषकर उत्तर-पश्चिम और पूर्वी भारत के कुछ उप-मंडलों में मानसूनी हवाओं की बेरुखी ने खरीफ फसलों के अंतिम दौर को प्रभावित किया है। वहीं दूसरी तरफ, मॉनसून के विदा होते-होते देश के कई इलाकों ने विनाशकारी अतिवृष्टि और बाढ़ का दंश भी झेला। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में गोमती नदी के जलस्तर में उफान के चलते फैजुल्लागंज, गऊघाट और निचले तटीय इलाकों में हजारों घर हफ्तों तक पानी में डूबे रहे, जबकि बिहार के मुंगेर, भागलपुर और गंगा के मैदानी इलाकों में बाढ़ के बाद कीचड़ और बीमारियों का संकट खड़ा हो गया। इस असंतुलित बारिश का सीधा असर देश के प्रमुख जलाशयों के जलस्तर और भूजल पुनर्भरण पर पड़ा है, जिससे आने वाले रबी सीजन के लिए सिंचाई प्रबंधन को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।

जैसे ही दक्षिण-पश्चिम मॉनसून ने देश से विदाई ली, ठीक उसी दिन प्रायद्वीपीय भारत के ऊपर उत्तर-पूर्वी मॉनसून (Northeast Monsoon) ने जोरदार दस्तक दे दी है। बंगाल की खाड़ी के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से और तमिलनाडु के तटीय इलाकों के ऊपर बने चक्रवाती परिसंचरण (Cyclonic Circulation) ने पूर्वोत्तर मानसूनी हवाओं को प्रचंड गति दे दी है। मौसम विभाग ने चेतावनी जारी की है कि 15 से 21 अक्टूबर के बीच तमिलनाडु, पुडुचेरी, कराईकल, तटीय आंध्र प्रदेश, रायलसीमा, दक्षिण आंतरिक कर्नाटक और केरल के अधिकांश हिस्सों में गरज-चमक और आकाशीय बिजली के साथ मूसलाधार बारिश का दौर जारी रहेगा। चेन्नई, चेंगलपट्टू, कांचीपुरम और तटीय आंध्र प्रदेश के जिलों के लिए ऑरेंज और यलो अलर्ट जारी किए गए हैं, जहां 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज तूफानी हवाएं चलने और निचले इलाकों में जलभराव की गंभीर आशंका है। तमिलनाडु के लिए यह उत्तर-पूर्वी मॉनसून किसी वरदान से कम नहीं है, क्योंकि राज्य को अपनी वार्षिक वर्षा का लगभग 48 प्रतिशत पानी इसी सीजन में प्राप्त होता है।

एक तरफ जहां दक्षिण भारत मानसूनी बादलों से घिर गया है, वहीं उत्तर भारत के मौसम का मिजाज पूरी तरह बदलने लगा है। जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के ऊपरी वायुमंडल में एक ताजा पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) सक्रिय हुआ है, जिसके चलते पीर पंजाल और लद्दाख को जोड़ने वाले समुद्र तल से 11,650 फीट ऊंचे जोजिला दर्रे, गुलमर्ग की अफरवात चोटी, सोनमर्ग और गुरेज घाटी में सीजन की पहली बर्फबारी दर्ज की गई है। पहाड़ों से टकराकर आ रही ठंडी और शुष्क हवाओं ने दिल्ली-एनसीआर, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों में तापमान के पारे को तेजी से नीचे गिरा दिया है। रात और भोर के समय लोगों को हल्की चादर और गर्म कपड़ों की जरूरत महसूस होने लगी है। लखनऊ, कानपुर, मेरठ और आगरा जैसे शहरों में न्यूनतम तापमान गिरकर 19 से 21 डिग्री सेल्सियस के बीच पहुंच गया है। सुबह के समय हल्की धुंध और गुलाबी ठंड की शुरुआत हो चुकी है, जो संकेत दे रही है कि इस बार सर्दियों का आगमन तय समय से पहले होने वाला है।

मौसम के इस दोहरे रुख ने देश के किसान समुदाय के सामने नई चुनौतियां और अवसर दोनों खड़े कर दिए हैं। उत्तर और मध्य भारत के किसान इस समय अपनी मुख्य खरीफ फसल—धान, मक्का, बाजरा और सोयाबीन की कटाई और मड़ाई में जुटे हुए हैं। खुले आसमान और शुष्क मौसम ने कटाई के काम को रफ्तार दी है, लेकिन कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को आगाह किया है कि पश्चिमी विक्षोभ के चलते उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में अचानक होने वाली बूंदाबांदी से कटी हुई फसलों को बचाने के लिए अनाज मंडियों और खेतों में तिरपाल के पुख्ता इंतजाम रखें। वहीं दूसरी तरफ, दक्षिण भारत में शुरू हुई उत्तर-पूर्वी मॉनसून की बारिश रबी फसलों, विशेषकर दलहन, तिलहन और शीतकालीन धान की बुवाई के लिए अमृत समान साबित होगी। मिट्टी में पर्याप्त नमी उपलब्ध होने से किसान समय पर बुवाई का काम पूरा कर सकेंगे, जिससे आगामी फसल चक्र को समय पर पूरा करने में मदद मिलेगी।

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की समय पर विदाई केवल एक मौसमी घटना नहीं है, बल्कि यह आगामी सर्दियों के स्वरूप का बड़ा संकेत है। भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में ‘ला नीना’ (La Niña) की स्थितियां सक्रिय होने के मजबूत संकेत मिल रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से जब भी ला नीना का प्रभाव बढ़ता है, तो भारतीय उपमहाद्वीप में कड़ाके की सर्दी, भीषण शीतलहर और उत्तर भारत में घने कोहरे के दिनों की संख्या में भारी इजाफा देखा जाता है। अक्टूबर के तीसरे सप्ताह तक दक्षिण भारत में उत्तर-पूर्वी मॉनसून का तांडव जारी रहेगा, जबकि उत्तर भारत में दिन के तापमान में हल्की धूप और रात के पारे में लगातार गिरावट का यह सिलसिला धीरे-धीरे एक गंभीर ठंड के दौर में तब्दील हो जाएगा। मौसम के इस बदलते मिजाज के बीच स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने भी बच्चों और बुजुर्गों को मौसमी फ्लू, एलर्जी और सर्दी-जुकाम से बचने के लिए अभी से एहतियात बरतने की सलाह दी है।