
भारतीय घरों की रसोई में दाल पकाने वाले कुकर से लेकर चाय की केतली और बाजार में मिलने वाले सॉफ्ट ड्रिंक व बीयर के कैन तक, अब एल्युमिनियम से जुड़ी हर वस्तु पर सरकार ने सुरक्षा का सख्त पहरा लगा दिया है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (DPIIT) ने ‘कुकवेयर, यूटेंसिल्स एंड कैन्स फॉर फूड्स एंड बेवरेजेज (क्वालिटी कंट्रोल) ऑर्डर’ को औपचारिक रूप से अधिसूचित कर दिया है। भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के इस नए आदेश के तहत देश में बनने वाले और विदेशों से आयात किए जाने वाले सभी प्रकार के एल्युमिनियम के बर्तनों और बेवरेज कैन पर बीआईएस सर्टिफिकेशन यानी प्रसिद्ध ‘ISI’ मार्क होना कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया गया है। इस ऐतिहासिक नीतिगत फैसले का सीधा मतलब यह है कि अब कोई भी निर्माता, थोक व्यापारी, आयातक या स्थानीय दुकानदार घटिया, मिलावटी या बिना मानक वाले एल्युमिनियम बर्तनों और डिब्बों का निर्माण, भंडारण, वितरण या बिक्री नहीं कर सकेगा। यदि कोई व्यापारी इस आदेश का उल्लंघन करता पाया गया, तो बीआईएस अधिनियम के तहत भारी आर्थिक जुर्माना और जेल की सजा दोनों का सख्त प्रावधान किया गया है। सरकार के इस कदम ने देशभर के बर्तन बाजारों, मेटल रोलिंग मिलों और बेवरेज पैकेजिंग इंडस्ट्री में हलचल पैदा कर दी है, वहीं उपभोक्ताओं के लिए इसे एक बहुप्रतीक्षित स्वास्थ्य सुरक्षा कवच माना जा रहा है।
इस नए क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर (QCO) के केंद्र में दो सबसे प्रमुख भारतीय मानक (Indian Standards) हैं, जिनके इर्द-गिर्द पूरी गुणवत्ता प्रणाली को नए सिरे से गढ़ा गया है। पहला मानक है ‘IS 1660:2024’, जो रॉट एल्युमिनियम से बनने वाले सभी प्रकार के बर्तनों (कड़ाही, पतीला, कुकर, तवा, सॉसपैन) की धातु संरचना, मोटाई, शुद्धता और ताप सहनशीलता को निर्धारित करता है। दूसरा अहम मानक ‘IS 14407:2023’ (संशोधित 2026) है, जो सॉफ्ट ड्रिंक, बीयर, फ्रूट जूस और एनर्जी ड्रिंक्स के लिए इस्तेमाल होने वाले टू-पीस एल्युमिनियम कैन पर लागू होता है। बेवरेज कैन के मामले में केवल धातु का मजबूत होना ही काफी नहीं है, बल्कि उसके अंदर होने वाली फूड-ग्रेड लैकर (Internal Coating) की परत सबसे महत्वपूर्ण होती है। नया बीआईएस नियम यह सुनिश्चित करता है कि कैन के अंदरूनी हिस्से में चढ़ाई गई कोटिंग इतनी अभेद्य हो कि कार्बोनेटेड ड्रिंक या अम्लीय तरल पदार्थ कभी भी सीधे एल्युमिनियम धातु के संपर्क में न आएं। इसके अलावा कैन की डबल-सीम लीकेज जांच, उच्च आंतरिक दबाव सहने की क्षमता और वजन के कड़े परीक्षणों को अनिवार्य किया गया है, ताकि बोतल या कैन के फटने अथवा लीकेज की गुंजाइश पूरी तरह समाप्त हो सके।
भारत के मध्यमवर्गीय और ग्रामीण परिवारों में एल्युमिनियम के बर्तन दशकों से अपनी कम कीमत, हल्के वजन और तेज हीटिंग क्षमता के कारण पहली पसंद रहे हैं। लेकिन इसके पीछे का छिपा हुआ स्याह सच यह है कि देश के असंगठित बाजारों में बिकने वाले लगभग 40 से 50 फीसदी सस्ते बर्तन ऑटोमोबाइल स्क्रैप, पुराने बिजली के तारों और औद्योगिक कचरे को पिघलाकर बनाए जाते हैं। इस रीसाइकिल धातु में भारी मात्रा में सीसा (लेड), कैडमियम, आर्सेनिक और क्रोमियम जैसी बेहद विषैली अशुद्धियां मौजूद रहती हैं। जब इन बर्तनों में टमाटर, इमली, नींबू, छाछ या सिरके जैसे अम्लीय खाद्य पदार्थ पकाए जाते हैं, तो रासायनिक प्रतिक्रिया के कारण एल्युमिनियम और ये जहरीले तत्व घुलकर सीधे भोजन में मिल जाते हैं। मेडिकल शोधों में यह बात बार-बार साबित हो चुकी है कि शरीर में एल्युमिनियम की अधिक मात्रा जमा होने से तंत्रिका तंत्र से जुड़ी बीमारियां, अल्जाइमर, हड्डियों का खोखलापन और किडनी फेलियर जैसी जानलेवा समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। बीआईएस के नए नियमों से अब ऐसी अशुद्ध स्क्रैप धातु के इस्तेमाल पर पूरी तरह ताला लग जाएगा और फैक्ट्रियों को केवल वर्जिन या पूरी तरह शुद्ध व प्रमाणित एल्युमिनियम अलॉय का ही इस्तेमाल करना होगा।
आम जनता के नजरिए से देखें तो यह फैसला उनकी सेहत के लिए एक जीवनरक्षक ढाल की तरह काम करेगा। बाजार में खरीदारी करते समय अब ग्राहकों को बर्तनों की शुद्धता जांचने के लिए किसी भ्रामक दावे पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा; केवल बर्तन के तल पर अंकित आईएसआई (ISI) मार्क और सात अंकों का सीएम/एल लाइसेंस नंबर देखकर वे गुणवत्ता की पुष्टि कर सकेंगे। हालांकि, कई उपभोक्ताओं के मन में यह स्वाभाविक सवाल उठ रहा है कि क्या मानक लागू होने से बर्तनों के दाम आसमान छूने लगेंगे। विशेषज्ञों और उद्योग विश्लेषकों का मानना है कि ब्रांडेड और उच्च गुणवत्ता वाले बर्तनों की कीमतों में कोई खास अंतर नहीं आएगा क्योंकि वे पहले से ही सख्त मानकों का पालन करते हैं। वहीं, पटरी बाजारों या फेरीवालों से मिलने वाले बेहद सस्ते और हल्के बर्तनों की कीमतों में 10 से 15 फीसदी तक का मामूली इजाफा हो सकता है, क्योंकि निर्माताओं को अब अनिवार्य रूप से उच्च ग्रेड का रॉ मैटेरियल इस्तेमाल करना पड़ेगा। लेकिन विशेषज्ञों का साफ कहना है कि किसी घटिया बर्तन के कारण भविष्य में होने वाले लाखों रुपये के मेडिकल खर्च और बीमारियों की तुलना में यह मामूली कीमत वृद्धि उपभोक्ताओं के लिए पूरी तरह फायदेमंद है।
इस आदेश का सबसे बड़ा प्रभाव देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) पर पड़ने जा रहा है। हरियाणा के जगाधरी, उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद, मिर्जापुर, कानपुर, लखनऊ के यहियागंज व अमीनाबाद मेटल क्लस्टर और गुजरात के राजकोट जैसे इलाकों में हजारों छोटे कारखाने व ढलाई इकाइयां एल्युमिनियम बर्तनों के निर्माण से जुड़ी हैं। छोटे उद्यमियों की वित्तीय और तकनीकी सीमाओं को ध्यान में रखते हुए सरकार ने इस बार ‘फेज्ड मैनर’ यानी चरणबद्ध अनुपालन की बेहद व्यावहारिक नीति अपनाई है। बड़े उद्योगपतियों के लिए यह नियम 1 अक्टूबर 2026 से अनिवार्य हो चुका है, जबकि छोटे उद्योगों (स्मॉल एंटरप्राइजेज) को अपनी लैब तैयार करने और लाइसेंस लेने के लिए 1 जनवरी 2027 तक का वक्त दिया गया है। वहीं, सबसे छोटे और ग्रामीण स्तर के सूक्ष्म उद्यमों (माइक्रो एंटरप्राइजेज) को 1 अप्रैल 2027 तक की विशेष छूट प्रदान की गई है। इसके बावजूद छोटे कारोबारियों के लिए इन-हाउस टेस्टिंग लैब स्थापित करना, रासायनिक परीक्षण उपकरण खरीदना और बीआईएस के ऑडिट मानकों पर खरा उतरना एक बड़ी आर्थिक चुनौती बनी हुई है, जिसके लिए उद्योग संगठन सरकार से विशेष सब्सिडी और कॉमन टेस्टिंग फैसिलिटी सेंटर की मांग कर रहे हैं।
बेवरेज कैन के मामले में इस अधिसूचना ने भारतीय पेय उद्योग और बीयर निर्माताओं को भी बड़ी राहत दी है। पिछले सीजन में जब कैन की अचानक कमी हो गई थी, तब कंपनियों ने आपूर्ति संकट का हवाला देकर समयसीमा बढ़ाने की अपील की थी। नई समयसीमा लागू होने से घरेलू कैन निर्माताओं को अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने और आधुनिक कोटिंग तकनीक में निवेश करने का पर्याप्त समय मिल गया है। इसके अलावा, इस आदेश का एक सबसे बड़ा भू-राजनीतिक और आर्थिक फायदा यह होगा कि चीन, वियतनाम और अन्य देशों से भारत में डंप किए जाने वाले सस्ते, सब-स्टैंडर्ड और घटिया एल्युमिनियम बर्तनों व कैन के आयात पर तुरंत रोक लग जाएगी। विदेशी कंपनियों को भी भारत में माल बेचने के लिए बीआईएस के फॉरेन मैन्युफैक्चरर्स सर्टिफिकेशन स्कीम (FMCS) के तहत अपनी फैक्ट्रियों का भारत सरकार से ऑडिट कराना अनिवार्य होगा। कुल मिलाकर, यह नया नियम भारतीय उपभोक्ताओं की रसोई को ‘जहरमुक्त’ बनाने, घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने और देश को मिलावटमुक्त गुणवत्तापूर्ण भारत की दिशा में आगे ले जाने वाला एक मील का पत्थर साबित होने जा रहा है।
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