
सनातन धर्म में शक्ति की उपासना के महापर्व नवरात्रि का प्रारंभ घटस्थापना (कलश स्थापना) और माता के दरबार में जौ (खेतड़ी) बोने के साथ होता है। सदियों से चली आ रही इस प्राचीन परंपरा के पीछे केवल धार्मिक अनुष्ठान ही छिपा नहीं है, बल्कि यह भविष्य के संकेत देने का एक बहुत बड़ा माध्यम भी माना जाता है। जब साधक या परिवार के सदस्य पहले दिन मिट्टी के बर्तन में जौ बोते हैं, तो नौ दिनों तक माता की पूजा के साथ-साथ इन जौ के विकास और उनके रंगों पर भी विशेष नजर रखी जाती है। प्राचीन मान्यताओं और ज्योतिषीय जानकारों का ऐसा मानना है कि मां दुर्गा को अर्पित ये हरी-भरी जौ आने वाले महीनों में घर-परिवार के लिए सुख, शांति, समृद्धि, धन-दौलत या फिर किसी संभावित संकट का पूर्व संकेत दे देती हैं। नौ दिनों के भीतर जौ का तेजी से बढ़ना और उसका हरा-भरा होना इस बात का प्रतीक माना जाता है कि साक्षात मां दुर्गा का आशीर्वाद उस घर पर बरस रहा है।
यदि घटस्थापना के दूसरे या तीसरे दिन से ही जौ बहुत तेजी से अंकुरित होने लगे और उनके पौधे पूरी तरह से गहरे हरे रंग के, सीधे और स्वस्थ रूप में बाहर आ जाएं, तो इसे ज्योतिष शास्त्र में सबसे उत्तम और शुभ संकेत माना जाता है। इस प्रकार की घनी और हरी जौ का उगना यह दर्शाता है कि आने वाले समय में माता लक्ष्मी की कृपा से उस परिवार की आर्थिक स्थिति में भारी सुधार होने वाला है। घर में धन-धान्य के भंडार भरेंगे, व्यापार में तरक्की मिलेगी और परिवार के सदस्यों के बीच आपसी प्रेम व सामंजस्य मजबूत होगा। इसके अलावा, यदि जौ का रंग ऊपर से बिल्कुल चमकीला हरा और नीचे से हल्का पीला हो, तो यह इस बात का प्रमाण है कि वर्ष का शुरुआती आधा हिस्सा थोड़ा संघर्षपूर्ण हो सकता है, लेकिन साल का दूसरा भाग अत्यंत मंगलकारी और सफलता दिलाने वाला साबित होगा।
इसके विपरीत, यदि नवरात्रि के नौ दिनों के दौरान बोई गई जौ का रंग पूरी तरह से पीला पड़ जाए, पौधे कमजोर होकर सूखने लगें या फिर जौ के दाने अंकुरित ही न हों, तो इसे शास्त्रों में बहुत ही अशुभ और चिंताजनक संकेत माना जाता है। पीली या सफेद उगी हुई जौ का अर्थ यह लगाया जाता है कि आने वाले दिनों में घर के किसी सदस्य को स्वास्थ्य संबंधी गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है या फिर परिवार में किसी बड़े आर्थिक संकट या मानसिक तनाव के बादल मंडरा सकते हैं। यदि जौ केवल एक ही तरफ उगे और दूसरी तरफ बिल्कुल खाली रह जाए, तो यह इस बात का संकेत होता है कि घर के भीतर वैचारिक मतभेद बढ़ सकते हैं या किसी प्रकार की अनहोनी घटना घट सकती है। हालांकि, इन संकेतों से डरने के बजाय इन्हें मां दुर्गा की चेतावनी मानकर विशेष पूजा-पाठ और हवन करने की सलाह दी जाती है।
नवमी या दशमी के दिन जब नवरात्रि का समापन होता है, तब इन उगाई गई जौ का विधिवत तरीके से विसर्जन किया जाता है। परंपरा के अनुसार, माता की पूजा संपन्न होने के बाद इन हरी-भरी जौ (खेतड़ी) को बड़े ही आदर के साथ जड़ सहित उखाड़ा जाता है। इनमें से कुछ पवित्र जौ को चुनकर लाल रंग के रेशमी कपड़े में बांधकर घर की तिजोरी, अलमारी या उस स्थान पर रख दिया जाता है जहां धन रखा जाता है, जिसे बहुत बड़ा बरकत का उपाय माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि ऐसा करने से पूरे साल घर में बरकत बनी रहती है और कभी भी पैसों की तंगी का सामना नहीं करना पड़ता है। बाकी बची हुई जौ और मिट्टी को किसी पवित्र नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है या फिर किसी पीपल के पेड़ के नीचे रख दिया जाता है, जिससे माता का आशीर्वाद हमेशा परिवार पर बना रहता है।
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