
राजधानी दिल्ली का सबसे चर्चित और संवेदनशील विरोध प्रदर्शन स्थल जंतर-मंतर एक बार फिर कानूनी और राजनीतिक घमासान का केंद्र बन गया है। सिटिजंस फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) और उनके सहयोगी कार्यकर्ताओं द्वारा जंतर-मंतर पर बिना पूर्व अनुमति के प्रवेश करने और बड़े पैमाने पर धरना-प्रदर्शन आयोजित करने की कोशिशों को लेकर दिल्ली पुलिस ने कड़ा रुख अपना लिया है। पुलिस प्रशासन ने साफ तौर पर आरोप लगाया है कि आयोजकों ने कानून-व्यवस्था और धारा 144 के नियमों की अनदेखी करते हुए जबरन बैरिकेडिंग पार करने और अति-सुरक्षा वाले क्षेत्र में घुसपैठ करने का प्रयास किया। इस घटनाक्रम के बाद दिल्ली पुलिस ने संस्था CJP और उससे जुड़े प्रमुख चेहरों पर शिकंजा कसते हुए कई गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच प्रक्रिया को तेज कर दिया है। पुलिस का कहना है कि राजधानी की शांति भंग करने और सार्वजनिक सुरक्षा को खतरे में डालने वाली किसी भी गतिविधि को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
दूसरी तरफ, इस मामले की न्यायिक सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकीलों ने दिल्ली पुलिस के दावों पर कड़ा एतराज जताते हुए अदालत के भीतर और बाहर पुलिस की थ्योरी की धज्जियां उड़ा दी हैं। वरिष्ठ याचिकाकर्ताओं—रांका और दास—का प्रतिनिधित्व कर रहे वकीलों ने जज के सामने खुलकर कहा कि दिल्ली पुलिस द्वारा अदालत में पेश किए गए हलफनामे और मौखिक दलीलें पूरी तरह से निराधार और ‘सफ़ेद झूठ’ पर आधारित हैं। बचाव पक्ष के मुख्य वकील ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल पूरी तरह से शांतिपूर्ण तरीके से अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग कर रहे थे और जंतर-मंतर पर जबरन घुसने या कानून तोड़ने का कोई इरादा नहीं था। वकीलों ने आरोप लगाया कि पुलिस प्रशासन अपनी प्रशासनिक नाकामी को छुपाने और नागरिक अधिकारों की आवाज़ उठाने वाले कार्यकर्ताओं को डराने-धमकाने के लिए झूठी कहानियां गढ़ रहा है।
यह पूरा विवाद अब सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह नागरिक अधिकारों और राज्य की पुलिस व्यवस्था के बीच एक बड़े कानूनी टकराव का रूप ले चुका है। दिल्ली पुलिस ने अदालत में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि जंतर-मंतर पर किसी भी तरह के बड़े जमावड़े के लिए पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य है ताकि वीवीआईपी आवाजाही और आम जनता की सुरक्षा में कोई खलल न पड़े। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, CJP के प्रतिनिधियों ने आवश्यक दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया और पुलिसकर्मियों के साथ उलझने की कोशिश की। इसके विपरीत, नागरिक अधिकार संगठनों का कहना है कि जंतर-मंतर लोकतंत्र में असहमति की आवाज़ उठाने की ऐतिहासिक जगह रही है, जहां सरकार द्वारा लगातार कड़े प्रतिबंध लगाकर आम लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है।
इस हाई-प्रोफाइल मामले में अदालत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है, जहां दोनों पक्षों द्वारा एक-दूसरे पर गंभीर आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं। अदालत ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए दोनों पक्षों से ठोस सबूत, सीसीटीवी फुटेज और विस्तृत दस्तावेज जमा करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि न तो किसी को शांति भंग करने का अधिकार दिया जा सकता है और न ही पुलिस को निर्दोष नागरिकों पर झूठे मुकदमे दर्ज करने की छूट दी जाएगी। आने वाले दिनों में जब इस मामले की अगली सुनवाई होगी, तब यह देखना दिलचस्प होगा कि पुलिस अपने दावों को साबित करने के लिए क्या साक्ष्य प्रस्तुत करती है और बचाव पक्ष पुलिस के आरोपों की हवा निकालने के लिए कौन से नए कानूनी तथ्य पेश करता है।
girls globe