शारदीय नवरात्र 2026: 9 देवियां, 9 ग्रह और 9 दिन… जानिए किस माता की आराधना से मजबूत होगा कौन सा ग्रह

सनातन धर्म और ज्योतिष शास्त्र में शारदीय नवरात्र (Shardiya Navratri 2026) के नौ दिनों का आध्यात्मिक और तांत्रिक महत्व बहुत अधिक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूरे वर्ष में चार बार नवरात्र आते हैं, जिनमें आश्विन मास की शारदीय नवरात्र का विशेष स्थान है। इस वर्ष शारदीय नवरात्र की शुरुआत 11 अक्टूबर 2026 से हो चुकी है, जिसका समापन 20 अक्टूबर 2026 को होगा। ज्योतिषीय दृष्टि से मां दुर्गा के इन नौ स्वरूपों में संपूर्ण नवग्रहों का वास माना जाता है। ऐसे में नवरात्र के ये पावन नौ दिन न केवल मां दुर्गा की आराधना के लिए श्रेष्ठ हैं, बल्कि अपनी कुंडली में कमजोर ग्रहों को मजबूत करने का भी सबसे उत्तम अवसर प्रदान करते हैं।

मां शैलपुत्री और सूर्य ग्रह का संबंध

ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार, शारदीय नवरात्र का पहला दिन आदिशक्ति मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री को समर्पित है। ज्योतिष में सूर्य को मान-सम्मान, यश और उच्च पद का कारक माना गया है। नवरात्र के पहले दिन विधि-विधान से मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना करने से कुंडली में सूर्य की स्थिति मजबूत होती है। इससे जातक के जीवन में मान-सम्मान बढ़ता है, आत्मविश्वास में वृद्धि होती है और करियर में नई ऊंचाइयां प्राप्त होती हैं।

मां ब्रह्मचारिणी से मजबूत होता है चंद्रमा

नवरात्र का दूसरा दिन मां ब्रह्मचारिणी की उपासना का दिन है, जिनका सीधा संबंध मन और भावनाओं के कारक ग्रह चंद्रमा से माना गया है। जिन जातकों की कुंडली में चंद्रमा कमजोर होता है या जो मानसिक तनाव, अवसाद (Depression) और अनिद्रा की समस्या से जूझते हैं, उन्हें मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से विशेष लाभ मिलता है। इनकी कृपा से मन शांत होता है, मानसिक एकाग्रता बढ़ती है और निर्णय लेने की क्षमता मजबूत होती है।

मां चंद्रघंटा और ऊर्जा के कारक मंगल की उपासना

मां दुर्गा का तीसरा स्वरूप मां चंद्रघंटा का है, जिनका संबंध ऊर्जा, पराक्रम, भूमि और साहस के प्रतीक मंगल ग्रह से जोड़ा गया है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार मंगल ग्रह को संघर्ष और विजय का प्रतीक माना जाता है। नवरात्र के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की विधिवत पूजा करने से कुंडली में मंगल ग्रह से जुड़े दोष दूर होते हैं और जातक के भीतर अदम्य साहस, ऊर्जा तथा शत्रुओं पर विजय पाने की क्षमता का विकास होता है।

मां कूष्मांडा से संवरता है बुध ग्रह

चौथे दिन पूजी जाने वाली मां कूष्मांडा को पर्यावरण और सृष्टि की सृजनकर्ता माना गया है, जिनका संबंध बुद्धि, वाणी, व्यापार और संचार के कारक बुध ग्रह से है। जो लोग वाणी दोष, व्यापारिक घाटे, या त्वचा संबंधी समस्याओं से परेशान हैं, उन्हें मां कूष्मांडा की भक्ति से लाभ मिलता है। माता की कृपा से बुद्धि तीव्र होती है, व्यवसाय में तरक्की मिलती है और वित्तीय स्थिति मजबूत होती है।

देवगुरु बृहस्पति को बल देती हैं स्कंदमाता

नवरात्र का पांचवां दिन ज्ञान, शिक्षा और संतान के कारक देवगुरु बृहस्पति को समर्पित है, जिनका संबंध स्कंदमाता से माना गया है। इस दिन पीले वस्त्र धारण करके मां स्कंदमाता की सच्चे मन से उपासना करने से कुंडली में गुरु ग्रह मजबूत होता है। इससे जीवन में सुख-समृद्धि, वैवाहिक जीवन में मधुरता और ज्ञान की प्राप्ति होती है।

मां कात्यायनी और शुक्र ग्रह का प्रभाव

नवरात्र का छठा दिन प्रेम, सौंदर्य, आकर्षण और भौतिक सुख-सुविधाओं के कारक शुक्र ग्रह और मां कात्यायनी को समर्पित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मां भगवती के इस स्वरूप की पूजा महाभारत काल में भगवान श्री कृष्ण को पाने के लिए गोपियों ने भी की थी। विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करने और जीवन में मान-सम्मान व वैभव प्राप्त करने के लिए मां कात्यायनी की उपासना बेहद फलदायी मानी जाती है।

कालरात्रि देवी से शांत होता है शनि का प्रभाव

सातवें दिन महायोगिनी मां कालरात्रि की पूजा का विधान है, जिनका सीधा संबंध न्याय के देवता शनि ग्रह से है। शनि के ढैय्या, साढ़ेसाती या महादशा से पीड़ित जातकों के लिए मां कालरात्रि की साधना कवच का काम करती है। इनकी पूजा से सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा, बुरी शक्तियां और वास्तु दोष नष्ट हो जाते हैं तथा शनि की कृपा प्राप्त होती है।

महागौरी से नियंत्रित होता है राहु और सिद्धिदात्री से केतु

नवरात्र के आठवें दिन पूजी जाने वाली मां महागौरी का संबंध छाया ग्रह राहु से माना गया है, जो जीवन के भ्रम और बाधाओं को दूर कर उजाले की ओर ले जाती हैं। वहीं, नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है, जिनका संबंध मोक्ष और आध्यात्म के कारक केतु से है। इन दोनों देवियों की आराधना से जातक को अलौकिक शक्तियों, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है।