
बिहार की सियासत में एक बार फिर चुनावी बिसात बिछ चुकी है और इस बार का मुकाबला किसी आम चुनाव से कम दिलचस्प नहीं नजर आ रहा है। बिहार विधान परिषद (MLC) की शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की 8 सीटों पर होने जा रहे उपचुनाव और चुनावों ने राज्य के राजनीतिक पारे को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। एक तरफ जहां सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के लिए यह चुनाव अपनी साख बचाने की एक बड़ी अग्निपरीक्षा साबित हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ प्रमुख विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और कांग्रेस के बीच महागठबंधन के भीतर अपना-अपना वर्चस्व साबित करने की होड़ मची हुई है। लेकिन इन सब के बीच जिस एक नए और तीसरे कोण ने बिहार के पूरे परंपरागत राजनीतिक समीकरण को हिलाकर रख दिया है, वह है चुनावी रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर (PK) और उनकी ‘जन सुराज’ पार्टी। जन सुराज की आक्रामक एंट्री, जमीनी पकड़ और सीधे शिक्षित व शिक्षक वर्ग से जुड़े मुद्दों को उठाने की वजह से इस बार का एमएलसी चुनाव त्रिकोणीय और बेहद पेचीदा मोड़ पर आ खड़ा हुआ है। आइए आज इस विशेष रिपोर्ट में विस्तार से जानते हैं कि बिहार एमएलसी चुनाव की इस जंग में एनडीए के सामने क्या चुनौतियां हैं, महागठबंधन में कैसी खींचतान चल रही है और प्रशांत किशोर को इस मुकाबले में क्यों अपनी बड़ी उम्मीदें नजर आ रही हैं।
बिहार में सत्ता चला रहे एनडीए गठबंधन के लिए यह एमएलसी चुनाव केवल सीटें जीतने का जरिया नहीं है, बल्कि यह उनकी प्रशासनिक पकड़ और घटक दलों के आपसी तालमेल की सबसे बड़ी कसौटी है। चुनाव की घोषणा होते ही जिस तरह से सत्ताधारी दल के भीतर से ही बागी सुर निकलने शुरू हुए हैं, उसने एनडीए के शीर्ष रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी है। विशेष रूप से पटना स्नातक और शिक्षक सीटों पर जनता दल यूनाइटेड (JDU) और उसके सहयोगी दलों के स्थानीय नेताओं के बीच पुरानी राजनीतिक रंजिशें खुलकर सतह पर आ गई हैं। जेडीयू के ही कुछ दबंग और प्रभाव रखने वाले पूर्व विधायक और बाहुबली नेता अपनी पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के विरोध में खुलकर जन सुराज या निर्दलीय प्रत्याशियों का झंडा बुलंद करते दिखाई दे रहे हैं। इसके अलावा उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी (राष्ट्रीय लोक मोर्चा) के भीतर भी कुछ सीटों पर अधिकृत प्रत्याशियों के खिलाफ बगावत की खबरें आई हैं। एनडीए नेतृत्व द्वारा बुलाई जा रही लगातार बैठकों और चेतावनियों के बावजूद स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं की नाराजगी और वोटों का बिखराव रुकता नहीं दिख रहा है, जिससे एनडीए के लिए अपने पुराने किलों को बचाए रखना एक बेहद मुश्किल टास्क बनता जा रहा है।
दूसरी ओर, बिहार में मुख्य विपक्षी धड़े के रूप में काबिज महागठबंधन (आरजेडी और कांग्रेस) की स्थिति भी बहुत ज्यादा सहज नहीं दिख रही है। हालांकि आरजेडी नेता तेजस्वी यादव और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राज्य में अपनी एकजुटता के दावे करते रहे हैं, लेकिन जब बात एमएलसी सीटों पर उम्मीदवारों के चयन और जमीनी स्तर पर कैडर को एक साथ लाने की आती है, तो खींचतान साफ तौर पर देखने को मिलती है। आरजेडी अपनी ओर से लगातार यह साबित करने की कोशिश कर रही है कि बिहार में गैर-भाजपा राजनीति का एकमात्र चेहरा वही है, जबकि कांग्रेस पार्टी अपने जनाधार को दोबारा हासिल करने के लिए अधिक सीटों और सम्मानजनक हिस्सेदारी पर अड़ी हुई है। इस अंदरूनी होड़ के चलते कई सीटों पर महागठबंधन का संयुक्त प्रचार अभियान उस आक्रामकता के साथ जमीन पर नहीं उतर पाया है, जैसी उम्मीद उनके समर्थक कर रहे थे। विपक्षी मतों के विभाजन का यह खतरा महागठबंधन के लिए चुनाव में बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है।
एनडीए की अंदरूनी कलह और महागठबंधन के असमंजस के बीच प्रशांत किशोर की पार्टी ‘जन सुराज’ के लिए एक बड़ा राजनीतिक अवसर पैदा हो गया है। प्रशांत किशोर ने बेहद चालाकी और दूरदर्शिता के साथ इस चुनाव को अपने एजेंडे पर केंद्रित कर दिया है। उन्होंने समान काम के बदले समान वेतन, 7वें वेतनमान का क्रियान्वयन, पुरानी पेंशन योजना और शिक्षकों के सम्मान से जुड़े संवेदनशील मुद्दों को अपने प्रचार का मुख्य हथियार बनाया है। पटना शिक्षक और स्नातक सीटों समेत अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में जन सुराज द्वारा उतारे गए मजबूत और शिक्षित उम्मीदवारों ने मुकाबले को सीधे तौर पर त्रिकोणीय बना दिया है। प्रशांत किशोर ने खुले तौर पर दावा किया है कि इस चुनाव में जनता पारंपरिक जातिगत आधार या पुराने बड़े चेहरों के बजाय बदलाव और विकास के नाम पर वोट करेगी। यदि जन सुराज इस चुनाव में एक या दो सीटों पर भी जीत हासिल करने या वोट प्रतिशत का बड़ा हिस्सा छीनने में कामयाब रहती है, तो यह आने वाले मुख्य विधानसभा चुनावों के लिए बिहार की पूरी राजनीति का खाका बदलकर रख देगा।
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