अमेरिकी सरकार के नए आदेश के बाद यूनिवर्सिटी ने बंद की लॉ एक्सटर्नशिप

अमेरिका के प्रतिष्ठित हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई कर रहे और भविष्य में वहां जाने का सपना देख रहे भारतीय छात्रों के लिए एक बहुत बड़ी और निराश करने वाली खबर सामने आ रही है। अमेरिकी सरकार द्वारा अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए वर्क परमिट और ऑफ-कैंपस ट्रेनिंग से जुड़े नियमों में हाल ही में किए गए कड़े बदलावों और नए दिशानिर्देशों के बाद हार्वर्ड लॉ स्कूल (HLS) ने बड़ा कदम उठाया है। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने अंतरराष्ट्रीय जेडी (J.D.) छात्रों के लिए अपनी सभी 13 लॉ एक्सटर्नशिप क्लिनिक प्रोग्राम्स में काम करने की मंजूरी (वर्क ऑथराइजेशन) को तत्काल प्रभाव से रोक दिया है। इस फैसले का सीधा असर अमेरिका में पढ़ रहे सैकड़ों अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों पर पड़ा है, जिनमें भारतीय छात्रों की संख्या भी अच्छी-खासी है। अमेरिकी सरकार द्वारा करिकुलम प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (CPT) के नियमों को सख्त किए जाने के बाद यूनिवर्सिटी को कानूनी अड़चनों से बचने के लिए यह कदम उठाना पड़ा है, जिससे भारतीय छात्रों के लिए अमेरिकी लॉ फर्मों, सरकारी एजेंसियों और गैर-लाभकारी संगठनों में प्रैक्टिकल अनुभव हासिल करने के रास्ते बंद होते नजर आ रहे हैं।

अमेरिकी होमलैंड सिक्योरिटी और शिक्षा विभाग द्वारा जारी किए गए नए फेडरल गाइडलाइन के अनुसार, विदेशी छात्रों को ऑफ-कैंपस वर्क परमिट यानी सीपीटी (Curricular Practical Training) देने के मानकों को बेहद कड़ा कर दिया गया है। नए नियमों के तहत अंतरराष्ट्रीय छात्रों को केवल उन्हीं वर्क प्रोग्राम्स में भाग लेने की अनुमति दी जा सकती है जो उनके डिग्री पाठ्यक्रम के लिए पूरी तरह से अनिवार्य हों। हार्वर्ड लॉ स्कूल में एक्सटर्नशिप क्लिनिक एक वैकल्पिक यानी इलेक्टिव कोर्स का हिस्सा थे, जिसके कारण नए नियमों के तहत विदेशी छात्रों को इन क्लिनिक्स में काम करने के लिए ऑथराइजेशन देना नियमों का उल्लंघन माना जा सकता था। इस कड़े रुख के बाद हार्वर्ड लॉ स्कूल ने सुरक्षात्मक कदम उठाते हुए अंतरराष्ट्रीय छात्रों को 13 प्रमुख एक्सटर्नशिप प्रोग्राम्स से बाहर रखने का फैसला लिया है। हालांकि, यूनिवर्सिटी ने यह स्पष्ट किया है कि एलएलएम (LL.M.) प्रोग्राम के छात्रों पर इसका असर नहीं पड़ेगा, लेकिन जेडी (J.D.) डिग्री ले रहे भारतीय व अंतरराष्ट्रीय छात्र इससे सीधे प्रभावित हुए हैं।

अमेरिका में कानून की पढ़ाई कर रहे भारतीय छात्रों के लिए एक्सटर्नशिप केवल क्रेडिट हासिल करने का जरिया नहीं था, बल्कि इसके माध्यम से वे अमेरिकी कानूनी प्रणाली, शीर्ष अदालतों, बहुराष्ट्रीय कॉर्पोरेट कंपनियों और मानवाधिकार संगठनों में काम करने का वास्तविक अनुभव प्राप्त करते थे। हार्वर्ड के इस फैसले के बाद भारतीय छात्रों को अब केवल यूनिवर्सिटी के इन-हाउस (ऑन-कैंपस) क्लिनिकल प्रोग्राम्स तक ही सीमित रहना पड़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रैक्टिकल अनुभव के बिना अमेरिकी जॉब मार्केट में प्रवेश करना और पढ़ाई पूरी करने के बाद वहां वर्क वीजा (H-1B) हासिल करना और ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो जाएगा। जो छात्र प्रैक्टिकल अनुभव के लिए ऑप्टेशनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (OPT) का इस्तेमाल करेंगे, उनका पोस्ट-ग्रेजुएशन वर्क टाइम कोटा समय से पहले ही खत्म हो जाएगा, जिससे उनका करियर प्लान पूरी तरह से प्रभावित हो सकता है।

पिछले कुछ समय से अमेरिकी प्रशासन द्वारा छात्र वीजा (F-1 वीजा) और उससे जुड़ी रोजगार नीतियों में लगातार सख्ती बरती जा रही है। केवल हार्वर्ड ही नहीं, बल्कि अमेरिका की कई अन्य प्रमुख यूनिवर्सिटीज़ भी इन नए फेडरल नियमों की वजह से अपने इंटरनेशनल स्टूडेंट प्रोग्राम्स और वर्क परमिट पॉलिसी में बदलाव करने पर मजबूर हो रही हैं। इस स्थिति ने वैश्विक स्तर पर पढ़ाई करने वाले भारतीय छात्रों के मन में असमंजस और चिंता की स्थिति पैदा कर दी है। लाखों रुपये की फीस और भारी-भरकम एजुकेशन लोन लेकर अमेरिका पढ़ने जाने वाले छात्रों के सामने अब पढ़ाई के साथ-साथ वर्क एक्सपीरियंस हासिल करने की नई चुनौती खड़ी हो गई है। शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अमेरिकी नीतियां इसी तरह सख्त होती रहीं, तो भारतीय छात्र अमेरिका के बजाय ब्रिटेन, कनाडा या यूरोप के अन्य देशों का रुख कर सकते हैं।